चमोली जिले के पर्यटन गांव सलूड़-डुंग्रा में प्रतिवर्ष होने वाला रम्माण आज भी प्राचीन लोक परंपरा को समेटे हुए है। रम्माण उत्सव में रामायण की कथा को जागर और मुखौटा नृत्य के माध्यम से आयोजित किया जाता है। लोक संस्कृति और प्राचीन धार्मिक परंपराओं का संरक्षण करने पर रम्माण को वर्ष 2009 में यूनेस्को ने विश्व सांस्कृतिक धरोहर में शामिल किया था।
मान्यता है कि आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए चार मठों की स्थापना की थी। इसके साथ ही शंकराचार्य ने बदरीकाश्रम क्षेत्र में कई धार्मिक आयोजन भी करवाए। इन्हीं धार्मिक आयोजनों में शामिल एक रम्माण का आयोजन आज भी प्राचीन जागर शैली में किया जाता है।
रम्माण शब्द रामायण का अपभ्रंस है। इसमें भोजपत्र के मुखौटे पहनकर ग्रामीण रम्माण (रामायण) का मंचन करते हैं। ढोल की थाप पर 18 तालों में राम की लीलाओं का प्रदर्शन किया जाता है। इस आयोजन में राम के जन्म से लेकर राम-रावण युद्ध और राम के राज्याभिषेक तक के मंचन को नृत्य और जागर के माध्यम से दिखाया जाता है। मुखौटे पहनकर सूर्य भगवान, कालिंका शक्ति, गणेश आदि देवों का आह्वान भी किया जाता है।