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Locust Attack: नेपाल सीमा की ओर से उत्तराखंड पहुंचा टिड्डी दल, किसान ऐसे करें फसल का बचाव

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंपावत Published by: अलका त्यागी Updated Fri, 17 Jul 2020 11:09 PM IST
Locust attack in Uttarakhand: Locust swarm comes in uttarakhand from nepal border, know How save Crops 1 of 6
- फोटो : अमर उजाला
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देश के कई राज्यों में फसलों का तबाह कर चुका टिड्डी दल अब उत्तराखंड के कुमाऊं में पहुंच गया है। शुक्रवार दोपहर को टिड्डियों का झुंड चंपावत के टनकपुर में मंडराता नजर आया। बताया जा रहा है कि टिड्डियों का यह दल नेपाल सीमा की ओर से टनकपुर पहुंचा है। शुक्रवार दोपहर करीब साढ़़े तीन बजे नेपाल सीमा की ओर से आसमान में जैसे ही टिड्डियों का झुंड मंडराता नजर आया। देखते ही देखते समूचे क्षेत्र में टिड्डियों के आतंक का खौफ छा गया। हालांकि फसलों में हमले की सूचना नहीं है। 
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टिड्डी दल के अलर्ट से चंपावत जिले के मैदानी क्षेत्र में हड़कंप मचा है। टिड्डियों के प्रकोप का उत्तर प्रदेश से लगे उत्तराखंड के जिलों में भी खतरे के अंदेशे का ऊधमसिंह नगर जिले से शुक्रवार को अलर्ट मिला। इसमें यूपी से लगे प्रदेश के तीन जिलों (चंपावत, यूएस नगर और नैनीताल) में टिड्डियों के खतरे को लेकर आगाह किया गया है। इसकी भनक लगते ही आननफानन में चंपावत के मुख्य कृषि अधिकारी राजेंद्र उप्रेती ने टनकपुर पहुंच खेतों का मुआयना करने के साथ किसानों को आगाह किया। 

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ऐसे करें बचाव
- खेतों का नियमित निरीक्षण करें। 
- अंड समूह के जगहों का पता लगा उस क्षेत्र में गड्ढें खोदकर टिड्डियों के दल को नष्ट करें। 
- प्रभावित क्षेत्रों में चिड़ियों के बैठने का स्थान बनाकर चिड़ियों को आकर्षित किया जाए। 
- खेतों के आसपास टिड्डी दल दिखाई देने पर ड्रम, टिन के डिब्बों को बजाकर जोर से आवाज निकालने से टिड्डी दल को दूर भागने में मदद मिलती है। 
- जिन क्षेत्रों में फसल न हो, वहां रात में टिड्डियों को आग की लौ जला कर नष्ट कर दें। 
- टिड्डी दल के रास्ते में विषाक्त चारा (कीटनाशी युक्त गेहूं या चावल का चोकर) का प्रयोग करें। 
- टिड्डी दल के नियंत्रण हेतु गाडिय़ों में लगे स्प्रेयर का प्रयोग किया जा सकता है। 
- संश्लेषित कीटनाशियों के छिड़काव के समय किसानों को खुद की सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा। 
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सामान्य रूप से एकांत में रहने वाली टिड्डियां अनुकूल वातावरणीय दशाओं व भोजन की प्रचुरता पर समूह में रहने लगते हैं। समूह में होने पर ये टिड्डी दल बहुभक्षी हो जाता है। साथ ही तमाम वनस्पतियों को खा जाती है। एक मादा टिड्डी अंडों को अंड समूह में मुख्य रूप से बलुई भूमि की सतह से 15 सेंटीमीटर नीचे देती है। दो-तीन अंड समूहों में 100 अंडे प्रति समूह देती है। 

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फसल लगने से पूर्व मेढ़ों की कटाई-छटाई द्वारा टिड्डियों के अंडों को धूप व परभक्षियों के लिए खोलना एवं स्थानिक क्षेत्रों में गर्मी की जुताई द्वारा टिड्डियों के अंडों का प्रबंधन करना वैज्ञानिक प्रबंधन का प्रमुख उद्देश्य है।

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मृदा भृंग, फफोला भृंग गिडार, चीटियों और झिगुरां द्वारा अंडों का भक्षण किया जाता है। अंडे से निकल कर शिशु समूह बनाते हैं एवं हरे वनस्पतियों पर आक्रमण करते हैं। टिड्डियां सर्वप्रथम छोटे-छोटे घासों को खाती है। इसके बाद फसलों में स्थानांतरित हो जाती है।
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