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पहले कप्तान फिर कोच, बेहद खास है क्रिकेटरों का यह 'अनोखा क्लब'

Wed, 29 Jun 2016 04:08 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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पिछले दिनों अनिल कुंबले को टीम इंडिया का नया कोच बनाया गया है। कुंबले के मुख्य कोच बनने के साथ ही वह उस खास क्लब में शामिल हो गए हैं जो अपनी राष्ट्रीय टीम का कप्तान बनने के बाद उसी टीम के कोच भी बने।
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पहले टीम के कप्तान फिर उसी टीम के कोच बनने की लिस्ट में अनिल कुंबले सबसे नया नाम है। 45 साल के भारत के इस सबसे सफल गेंदबाज ने 2007-08 के बीच टीम इंडिया के लिए 14 टेस्ट मैचों में कप्तानी की जिसमें 3 मैच जीते और 6 ड्रॉ पर खत्म हुए। इसमें पर्थ में मिली ऐतिहासिक जीत भी शामिल है। कुंबले से पहले 7 और ऐसे धुरंधर क्रिकेटर हुए हैं।
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जॉन राइट, 80 के दशक में न्यूजीलैंड के सलामी बल्लेबाज रहे हैं और टीम के लिए 4000 टेस्ट रन भी बनाए। उन्होंने भी 1987 से लेकर 1990 तक 14 मैचों में कप्तानी की। क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद वह कोचिंग में आ गए। पहले वह 2000-05 तक टीम इंडिया के कोच रहे।

भारतीय टीम के साथ सफल पारी खेलने वाले राइट को बाद में न्यूजीलैंड ने अपनी टीम का भी कोच बनाया। वह 2010 में ब्लैक कैप्स के कोच बने। उनकी कोचिंग में टीम 2011 के वनडे वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में पहुंची, साथ ही 26 साल बाद ऑस्ट्रेलिया में पहली बार टेस्ट मैच में जीत का स्वाद चखा।

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जावेद मियांदाद, पाकिस्तान क्रिकेट टीम के बेजोड़ बल्लेबाजों में से एक बल्लेबाज। मियांदाद शुरुआती 6 वर्ल्ड कप खेलने वाले क्रिकेटर हैं। वह 1980 से 1993 के बीच पाक टीम के कप्तान रहे जिसमें टीम को 26 वनडे और 14 टेस्ट मैचों में जीत मिली। 1996 में क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद वह टीम के कोच बने। उन्हें 3 बार टीम का कोच बनने का मौका मिला। पहला 1998 में, फिर 2000 में और 2003 में वह टीम कोच बने। 2012 में वह टीम के बल्लेबाजी सलाहकार बने।
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पाकिस्तान टीम में ही वकार युनुस भी ऐसे क्रिकेटर रहे जो पहले टीम के कप्तान थे बाद में कोच बने।  
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अजित वाडेकर, टीम इंडिया के सफल कप्तानों में से एक जिन्होंने इंग्लैंड और वेस्टइंडीज में टीम को पहली टेस्ट सीरीज जीतवाई थी। उन्होंने 16 मैचों में टीम की अगुवाई की जिसमें 4 जीते और 4 हारे भी। बाद में वह कोच बने। उन्हें 1992 में टीम का कोच बनाया गया। उनकी ही कोचिंग में टीम ने इंग्लैंड पर 3-0 से टेस्ट सीरीज जीती थी और 1992 से 94 के बीच लगातार 14 टेस्ट मैच में एक भी हार नहीं मिली।
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कपिल देव जिन्होंने अपनी कप्तानी में टीम इंडिया को पहली बार वर्ल्ड चैंपियन (1983) बनवाया, बाद में वह भी टीम के कोच बने। 1999-2000 के बीच वह टीम के साथ बतौर कोच जुड़े रहे लेकिन उनका कार्यकाल काफी खराब रहा।

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श्रीलंका के बेहतरीन बल्लेबाजों में से मर्वन अट्टापट्टू ने टीम के लिए 18 टेस्ट मैचों में कप्तानी की जिसमें 8 में जीत मिली, साथ ही 63 वनडे मैचों में टीम को 37 में जीत दिलवाई। कनाडा और सिंगापुर की टीम के साथ कोचिंग शुरू करने के बाद वह 2014 में 15 साल बाद टीम के पहले स्थानीय कोच बने। लेकिन टीम के लगातार खराब प्रदर्शन के कारण अगले साल ही उन्हें यह पद छोड़ना पड़ा।
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ऑस्ट्रेलिया के बॉब सिंपसन बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे हैं। 63 टेस्ट में 10 शतक लगाने वाले इस क्रिकेटर ने कंगारू टीम के लिए 39 टेस्ट मैचों में कप्तानी की और 12 मैचों में जीत दिलाई। बाद में वह 1986 में टीम के कोच भी चुने गए और इस पद पर वह 10 साल तक रहे। उनकी कोचिंग में ऑस्ट्रेलिया ने पहली बार 1987 में वर्ल्ड कप जीता था।
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