आज भारत में क्रिकेट धर्म का रूप ले चुका है। देश का हर युवा क्रिकेट स्टार बनने की चाहत रखता है क्योंकि एक तरफ क्रिकेटरों को भगवान का दर्जा हासिल है तो दूसरी तरफ उनके पास शोहरत के साथ-साथ अथाह दौलत भी है। जिसे हासिल कर पाना किसी भी आम आदमी के लिए आसान नहीं है। लेकिन आज से 30-40 साल पहले भारतीय क्रिकेट की तस्वीर ऐसी नहीं थी। उस दौर के कई क्रिकेट खिलाड़ी आज भी आर्थिक तंगी में जीवन जी रहे हैं। लेकिन भारतीय क्रिकेट की आज की सफलता की जड़े उसी दौर में छिपी हैं। उन्हीं खिलाड़ियों ने 1983 में टीम इंडिया को पहली बार विश्व विजेता बनाकर हमेशा के लिए भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदल दी।
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जब दुनिया में बजा भारतीय क्रिकेट का डंका और बदल गई टीम इंडिया की तस्वीर
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कपिल देव (लॉर्ड्स)
- फोटो : ESPN
1947 में देश की आजादी के बाद भी भारतीय क्रिकेट राजवाड़ों के शौक के साथ मंद गति से आगे बढ़ता रहा। लेकिन वनडे क्रिकेट के पदार्पण ने भारतीय क्रिकेट का कायाकल्प कर दिया। विश्वकप जीत ने भारत में हमेशा के लिए क्रिकेट के मायने बदल दिए।
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कपिल देव (लॉर्ड्स)
- फोटो : ESPN
1972 में वनडे क्रिकेट की शुरुआत होने के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की तस्वीर बदलनी शुरू हुई। 1975 में पहली बार क्रिकेट विश्वकप का आयोजन हुआ। 1975 और 1979 के विश्वकप में एस वेंकटराघवन की कप्तानी में टीम इंडिया केवल एक जीत हासिल कर सकी थी। वह भी ईस्ट अफ्रीका जैसी टीम के खिलाफ। यहां तक कि 1979 में श्रीलंका ने भी टीम इंडिया को धूल चटा दी थी। ऐसे में जब कपिल की अगुवाई वाली टीम इंडिया 1983 में तीसरी बार विश्वकप में भाग लेने इंग्लैंड पहुंची तो कोई भी उसे फेवरेट नहीं मान रहा था। लेकिन तकदीर को कुछ और ही मंजूर था।
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कपिल देव
भारतीय टीम ने दो बार की विश्व चैंपियन वेस्टइंडीज को मात देकर अपने विश्वकप अभियान की शुरुआत की। पिछले दो विश्वकप में अपराजेय रही कैरेबियाई टीम के लिए भी यह एक बड़ा झटका था। नॉक आउट राउंड में पहुंचने से पहले भारत की परीक्षा जिंबाब्वे के खिलाफ हुई जब टीम इंडिया मे 17 रन पर पांच विकेट गंवा दिए थे। ऐसे में टीम के कप्तान कपिल देव ने नाबाद 175 रन की पारी खेलकर भारतीय टीम को न केवल परेशानी से उबारा बल्कि विकेट कीपर सैयद किरवानी के साथ नवें विकेट के लिए अविजित 126 रन की साझेदारी कर टीम को 8 विकेट पर 266 रन तक पहुंचाया। कपिल ने अपनी इस आतिशी पारी में 16 चौके और 6 छक्के जड़े। जो लंबे समय तक वनडे में सर्वाधिक छक्कों का रिकॉर्ड रहा।
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कपिल देव
- फोटो : getty
जिबांब्वे के खिलाफ मैच भारतीय टीम के आत्मविश्वास को बढ़ाने में सबसे अहम साबित हुआ। अंत में भारत को महज 31 रन से जीत हासिल हुई लेकिन इस के बाद टीम इंडिया के खिलाड़ियों के अंदर यह आत्मविश्वास जागा कि हम मैच में किसी भी परिस्थिति में वापसी करने में सक्षम हैं। इसके बाद कपिल की सेना कोई मैच नहीं हारी और विश्व फतह कर स्वदेश वापस लौटी। ं
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विव रिचर्ड्स
फाइनल में भारत का मुकाबला एक बार फिर दो बार की विश्वचैंपियन वेस्टइंडीज से था। फाइनल में भारतीय टीम महज 183 रन बना सकी। ऐसे में सबको यकीन था कि वेस्टइंडीज आसानी से इस लक्ष्य को हासिल कर लेगी। लेकिन मोहिंदर अमरनाथ की घातक गेंदबाजी के आगे कैरेबियाई बल्लेबाज नतमस्तक हो गए। जब तक विवियन रिचर्ड्स मैदान पर मौजूद थे। तब तक ऐसा लग रहा था कि वो जल्दी ही मैच खत्म कर देंगे। लेकिन जैसे ही मोहिंदर अमरनाथ की गेंद पर कपिल ने विव रिचर्ड्स का कैच पकड़ा मैच का पांसा ही पलट गया। वेस्टइंडीज की पूरी टीम 140 रन पर ढेर हो गई।