कई देशों में बच्चों से स्कूलों में काम करवा लिया जाए, तो शिक्षकों की आफत आ जाएगी, लेकिन जापान में छह साल के बच्चे मिलकर अपनी कक्षा को साफ करते हैं और कचरा कूड़ेदान में ही डालते हैं। खाना खुद मिल-बांटकर परोसते हैं और बेंच पर बैठकर भोजन से पहले प्रार्थना करते हैं।
प्रत्येक देश, समाज और समुदाय की अपनी-अपनी विशेषताएं होती हैं, जो उनकी पहचान बन जाती हैं। लेकिन जापान की बात ही अलग है। आप जब भी जापान जाएं या फिर दुनिया के किसी भी कोने में जापानियों से मिलें, तो उनके व्यवहार में ऐसा कुछ पाएंगे, जो आप पर गहरा असर छोड़ेगा। पर सवाल यह है कि जापानी लोगों में ऐसी क्या खासियत है, जो उन्हें ऐसा बनाती है। कहते हैं कि कोई बच्चा भविष्य में कैसा इन्सान बनेगा, यह उसकी शुरुआती शिक्षा पर निर्भर करता है। इसी मामले में जापान बाकी दुनिया से अलग है। जापान के स्कूलों में बच्चे जब करीब छह वर्ष के होते हैं, तभी से उन्हें अपनी कक्षा को साफ रखने की जिम्मेदारी दी जाती है और एक-दूसरे के साथ भोजन साझा करने की सीख दी जाती है। स्कूलों की संरचना लघु समाजों की तरह होती है, जहां हर किसी की भूमिका तय है और उनसे समुदाय के लिए कुछ न कुछ योगदान करने की अपेक्षा की जाती है। वहां सामूहिक कार्य, काम में नैतिकता और निपुणता की भावना से निहित गैर-शैक्षणिक प्रशिक्षण पर सबसे ज्यादा जोर दिया जाता है।
ट्रेनें हमेशा समय पर क्यों
मैं जापान में जापानी मां और ब्रिटिश पिता की संतान के रूप में बड़ी हुई, लेकिन मुझे अपनी पहचान के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। मुझे जापान में हफू कहते हैं, यानी आधा जापानी (माता-पिता में से कोई एक मूलत: जापान का हो)। मुझे जापानी स्कूलों की शिक्षा की अहमियत तब पता चली, जब मैं 19 वर्ष की हुई और न्यूयॉर्क में रहने लगी। प्राथमिक स्कूली शिक्षा के माध्यम से सीखे गए मूल्यों और कार्य सिद्धांतों की वजह से वहां मेरी काफी सराहना हुई, जबकि जापान में इन स्कूली संस्कारों को इतना सामान्य बना दिया गया है कि उनके महत्व को कम आंका जाता है। ये विशिष्टताएं ही जापानी समाज को खास बनाती हैं। हमारी ट्रेनें समय पर चलती हैं, क्योंकि हमें बचपन से ही दूसरों के लिए सुविधा और सद्भाव को प्राथमिकता देना सिखाया जाता है। हमारे ऊपर अपने समुदाय के नियमों के अनुसार चलने और उसे शर्मिंदा न करने का सामूहिक दबाव भी रहता है।
दबाव और जादू
मैंने टोक्यो पब्लिक स्कूल में ‘इंस्ट्रूमेंट्स ऑफ ए बीटिंग हार्ट’ नामक डॉक्यूमेंटरी का फिल्मांकन पहली कक्षा के बच्चों के ऊपर किया। यह डॉक्यूमेंटरी बताती है कि फाइनल परीक्षा के दबाव के बावजूद विद्यार्थी तल्लीनता से ऑर्केस्ट्रा की तैयारी कर उसका स्कूल के समारोह में शानदार प्रदर्शन करते हैं। दरअसल, स्कूल में बच्चों को अभ्यास के जरिये ‘अपने हृदय को एक बनाना’ सिखाया जाता है। हम समूह के प्रति जिम्मेदारी लेने के दबाव और जादू, दोनों एकसाथ देखते हैं।
लड़ें, लेकिन विनम्रता से
जापानी शिक्षा में चरित्र निर्माण परंपराओं का अनुभव ‘अयामे’ के माध्यम से होता है। ‘अयामे’ की उत्पत्ति जापानी भाषा और संस्कृति से हुई है, जिसका अर्थ होता है आईरिस। आईरिस फूल का जापानी संस्कृति में काफी महत्व है, जो भक्ति, प्रेम और अच्छे संस्कार का प्रतिनिधित्व करता है। विद्यार्थियों को बताया जाता है कि नई-नई चुनौतियों से कैसे लड़ें और विपरीत परिस्थितियों में खुद को कैसे विनम्र रखें। कठिनाइयों या बाधाओं पर काबू पाने का अनुभव, जैसा कि अयामे करता है, शिक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
लड़ें, लेकिन विनम्रता से
जापानी शिक्षा में चरित्र निर्माण परंपराओं का अनुभव ‘अयामे’ के माध्यम से होता है। ‘अयामे’ की उत्पत्ति जापानी भाषा और संस्कृति से हुई है, जिसका अर्थ होता है आईरिस। आईरिस फूल का जापानी संस्कृति में काफी महत्व है, जो भक्ति, प्रेम और अच्छे संस्कार का प्रतिनिधित्व करता है। विद्यार्थियों को बताया जाता है कि नई-नई चुनौतियों से कैसे लड़ें और विपरीत परिस्थितियों में खुद को कैसे विनम्र रखें। कठिनाइयों या बाधाओं पर काबू पाने का अनुभव, जैसा कि अयामे करता है, शिक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
सहयोग की अद्भुत भावना
जापानी व्यवस्था की अपनी ताकत और कमजोरियां हैं, फिर भी जापान के स्कूलों में बच्चों को जो संस्कार दिए जाते हैं, वे एक बेहतर समाज और राष्ट्र के लिए बहुत ही आवश्यक हैं। आखिर जापानी लोग क्यों समय के पाबंद, काम के प्रति समर्पित और एक-दूसरे के प्रति सहयोगी होते हैं? मैं यहां सिर्फ पहली कक्षा के बच्चों की बात कर रही हूं। बच्चे स्कूल में चिड़ियों की तरह चहकते हुए जाते हैं, यथास्थान अपने जूते रखते हैं, गलती से यदि किसी बच्चे ने अपने जूते को अव्यवस्थित तरीके से रख दिया है, तो बाद में आने वाला बच्चा उन्हें ठीक कर देगा। सभी बच्चे चेहरे पर मास्क लगाकर आते हैं। बच्चे कपड़े भले ही अलग-अलग तरह के पहन लें, लेकिन उनके बस्ते एक-जैसे होते हैं। बच्चों के सिर पर गोल टोपी भी होती है, विशेषकर पीली, हालांकि टोपी का रंग अलग भी हो सकता है। कक्षा में सिखाया जाता है कि कैसे एक-दूसरे का सहयोग करें। यदि कोई बच्चा दुखी है, तो उसके दुख में शामिल होने के लिए दुख जताने की भावना विकसित की जाती है। यहां तक कि कोई रो रहा है, तो ढाढ़स बंधाने वाला बच्चा भी आंसू बहाकर संवेदना व्यक्त करता है।
अपना काम खुद करने की सीख
कई देशों में यदि छोटे बच्चों से स्कूलों में काम करवा लिया जाए, तो शिक्षकों की आफत आ जाएगी, लेकिन जापान में ऐसा नहीं है। छह साल के बच्चे मिलकर अपनी कक्षा को साफ करते हुए कचरा कूड़ेदान में ही डालते हैं। वे बेंच पर बैठकर भोजन से पहले प्रार्थना करते हैं। भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं से बचने और दूसरों को बचाने के लिए उन्हें बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है। एक सायरन बजते ही सभी बच्चे कुछ ही सेकंड में तत्काल अपनी टेबल के नीचे घुस जाते हैं। बच्चों को सार्वजनिक वाहनों और साइकिल से चलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
छोटी बातें, बड़ा असर
डॉक्यूमेंटरी निर्माण के दौरान मैंने पाया कि शिक्षकों की निगरानी में बच्चों ने एक-दूसरे के सहयोग से शानदार ड्रम बजाना सीख लिया। एक बच्ची ठीक से वाद्ययंत्र नहीं बजा पा रही थी। वह रोने लगी, तो शिक्षक ने कहा, ‘रो क्यों रही हो, मैं सिखाऊंगा, तुम बजा लोगी।’ वह बच्ची जो शुरू में वाद्ययंत्र नहीं बजा पा रही थी, मुख्य समारोह में उसका प्रदर्शन काफी शानदार था। शिक्षक और बच्चों का संबंध एक अभिभावक की तरह हो जाता है। बच्चे शिक्षकों के साथ अपनी खुशी और दुख, दोनों साझा करते हैं। उनसे लिपट जाते हैं। देखने में ये बातें छोटी-छोटी लग सकती हैं, लेकिन दीर्घकाल में इनका बड़ा असर होता है।