मानव सभ्यता के विकास का इतिहास युद्ध और विस्तार की नीति पर आधारित रहा है। बाजार और व्यापार की प्रतिस्पर्धा मानवता से ज्यादा बाजार को तरजीह देने वाली जान पड़ती है, जिसका व्यापक विस्तार आज की सदी में देखा जा सकता है।
दुनिया भर के देशों के द्वारा बडे-बडे हथियार, गन, टैंक, मिसाइल आदि का भंडार शांति की तैयारी के लिए तो नहीं किए गए होंगे। मानव सभ्यता की विस्तार नीति लगातार जारी है। बाजार और व्यापार की इस नीति ने एक कदम आगे की राह पकड़ हथियारों की सैन्य ताकतों के साथ-साथ नवीनतम रूप जैविक हथियार के रूप में बढ़ा दिया है। जिसने दुनिया में जैविक आतंकवाद के द्वार खोल दिए हैं।
जैविक आतंकवाद जहां मानवता के लिए खतरा बन गया है, वहीं दुनिया के लिए किसी चुनौती से कम नहीं हैं। 21वीं सदी में मानव जीवन पर महासंकट जैविक आतंकवाद के रूप में उभरकर आ रहा है, जो दुनिया के लिए खतरे का संकेत है।
जैविक आतंक मानव निर्मित सर्वाधिक प्राचीन होने के साथ विनाशकारी हथियारों में से है। यह ऐसा हथियार है जिनके द्वारा कम खर्च में युद्ध की बड़ी से बड़ी सेना को भी नष्ट किया जा सकता था। यह विनाशकारी हथियार विषाणु, कीटाणु, वायरस या फफूंद जैसे संक्रमणकारी तत्वों से निर्मित किए जाते हैं। जो सदियों से युद्ध का कूटनीतिक हिस्सा रहे हैं।
युद्ध में विरोधी सेना को बीमार करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। मानव की विस्तारवादी नीति इन महामारियों का कारण बनती रही है।
ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में मेसोपोटामिया के अस्सूर साम्राज्य के लोगों ने अपने शत्रुओं को मारने के लिए उनके पानी के कुओं में जहरीला कवक डलवा दिया। जिससे सैंकड़ो लोग मारे गए। संभवतः यह इतिहास के प्राचीनतम उदाहरणों में से एक है, जब जैविक हथियार का प्रयोग किया गया था।
प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मन सैनिक द्वारा एंथ्रेक्स तथा ग्लैंडर्स के जीवाणुओं का प्रयोग विकसित जैविक हथियारों की श्रेणी में आता है। जापान-चीन युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध में प्लेग, हैजा जैसी बीमारी से लोगों में संक्रमण फैलाने का प्रयास किया जाना आदि भी इसी तरह के आतंक में शामिल थे।
जैविक हथियारों का प्रयोग भारी भरकम तकनीकि से नहीं बल्कि छोटे-मोटे जीव-जंतु, जानवरों, पक्षियों और मनुष्यों के माध्यम से हवा, पानी में आसानी से फैलाया जा सकता है। विश्व के जिन देशों में इनका हमला हुआ है, वहां दशकों तक इसका असर देखा जा सकता है।