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प्रजनन अधिकार: अपने ही शरीर पर अधिकार का संघर्ष

सार

संविधान से मिले समानता और स्वतंत्रता के अधिकारों के बावजूद, गर्भ से जुड़े फैसलों के लिए महिलाओं को परिवार, समाज और अदालतों पर निर्भर रहना पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रजनन स्वायत्तता को मान्यता मिलने के बावजूद, असली सवाल महिला के अपने शरीर और भविष्य पर वास्तविक नियंत्रण का है।
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उच्च न्यायालय ने संबंधित महिला को गर्भपात की अनुमति तो दी, लेकिन मामले को नजीर नहीं मानने की टिप्पणी - फोटो : AI Generated (प्रतीकात्मक तस्वीर)
बंबई उच्च न्यायालय ने हाल में गर्भ के चिकित्सकीय समापन से संबंधित सरकारी प्रपत्र में अविवाहित महिलाओं को भी शामिल करने का निर्देश देकर महिलाओं के प्रजनन अधिकारों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण विसंगति उजागर की है। यह देखने में मामूली प्रशासनिक सुधार लग सकता है, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न छिपा है।

जब सर्वोच्च न्यायालय सितंबर 2022 में ही स्पष्ट कर चुका था कि विवाहित और अविवाहित महिलाओं के प्रजनन अधिकारों में केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता, तब चार वर्ष बाद भी सरकारी प्रपत्रों में ऐसी खामी क्यों बनी रही?

उच्च न्यायालय ने संबंधित महिला को गर्भपात की अनुमति तो दी, लेकिन मामले को नजीर नहीं मानने की टिप्पणी ने एक और बहस पैदा कर दी। आखिर महिलाओं की प्रजनन स्वायत्तता का समर्थन करने वाला निर्णय भविष्य के समान मामलों के लिए मार्गदर्शक क्यों नहीं होना चाहिए?

संविधान से मिले समानता और स्वतंत्रता के अधिकारों के बावजूद, गर्भ से जुड़े फैसलों के लिए महिलाओं को परिवार, समाज और अदालतों पर निर्भर रहना पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रजनन स्वायत्तता को मान्यता मिलने के बावजूद, असली सवाल महिला के अपने शरीर और भविष्य पर वास्तविक नियंत्रण का है।

इस प्रश्न का संवैधानिक आधार 29 सितंबर 2022 के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय में मिलता है। न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया था कि गर्भ के चिकित्सकीय समापन अधिनियम की व्याख्या करते समय अविवाहित महिलाओं के साथ केवल उनकी वैवाहिक स्थिति के कारण भेदभाव नहीं किया जा सकता। 

संविधान का अनुच्छेद 14 समानता और अनुच्छेद 21 जीवन, गरिमा, निजता तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण करता है। इन अधिकारों का वास्तविक अर्थ तभी है जब महिलाओं को मातृत्व स्वीकार करने अथवा न करने के निर्णय में कानून के अंतर्गत उचित स्वायत्तता मिले।

भारत में गर्भपात संबंधी कानून का इतिहास भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 1971 में बना गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम अपने समय का प्रगतिशील कदम था। इसका उद्देश्य असुरक्षित गर्भपात से होने वाली मौतों और स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं को कम करना था। वर्ष 2021 के संशोधन ने निर्धारित परिस्थितियों में गर्भपात की अधिकतम अवधि 20 से बढ़ाकर 24 सप्ताह कर दी।

सामान्यतः 20 सप्ताह तक एक पंजीकृत चिकित्सक की राय पर्याप्त है, जबकि 20 से 24 सप्ताह के बीच निर्धारित श्रेणियों के लिए दो चिकित्सकों की राय आवश्यक होती है। गंभीर भ्रूण असामान्यताओं के विशेष मामलों में चिकित्सा बोर्ड की व्यवस्था भी है।

लेकिन कानून का विस्तार और उसकी वास्तविक उपलब्धता दो अलग प्रश्न हैं। महानगर में रहने वाली शिक्षित तथा आर्थिक रूप से सक्षम महिला के लिए चिकित्सकीय सलाह और न्यायिक सहायता प्राप्त करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। इसके विपरीत ग्रामीण, निर्धन, प्रवासी अथवा सामाजिक रूप से वंचित महिला को अस्पताल पहुंचने, गोपनीयता बनाए रखने और समय पर चिकित्सा सुविधा प्राप्त करने में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

हिमालयी और दूरस्थ क्षेत्रों में यह समस्या अधिक गंभीर है, जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी तथा बड़े अस्पतालों तक पहुंच स्वयं चुनौती है। कई बार इलाज में देरी गर्भावस्था को उस सीमा तक पहुंचा देती है, जहां कानूनी प्रक्रिया और जटिल हो जाती है।

इस विषय का सबसे चिंताजनक पक्ष असुरक्षित गर्भपात है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के उपलब्ध अनुमानों के अनुसार दुनिया में प्रतिवर्ष लगभग 7.3 करोड़ प्रेरित गर्भपात होते हैं। इनमें लगभग 45 प्रतिशत असुरक्षित परिस्थितियों में किए जाते हैं। विश्व स्तर पर अनचाहे गर्भधारण के लगभग 61 प्रतिशत मामलों का अंत प्रेरित गर्भपात में होता है।

ये आंकड़े बताते हैं कि गर्भपात केवल व्यक्तिगत पसंद या नैतिक बहस का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती भी है। सुरक्षित चिकित्सा सुविधाओं की अनुपलब्धता महिलाओं को खतरनाक विकल्पों की ओर धकेल सकती है।

यहां एक बुनियादी सामाजिक प्रश्न है। अनचाहे गर्भ की जिम्मेदारी अक्सर केवल महिला पर डाली जाती है, जबकि पुरुष की भी भूमिका होती है। अविवाहित महिला के गर्भवती होने पर समाज की नैतिकता सक्रिय हो जाती है, पर पुरुष की जिम्मेदारी पर गंभीर चर्चा नहीं होती।

विवाह में भी परिवार नियोजन और मातृत्व के निर्णयों में महिलाओं की स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं रहती। घरेलू हिंसा, आर्थिक निर्भरता और सामाजिक दबाव उनकी निर्णय क्षमता को प्रभावित करते हैं। इस असमानता को बदले बिना केवल कानूनी सुधार पर्याप्त नहीं होंगे।

महिला के मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। अवांछित गर्भधारण आर्थिक असुरक्षा, संबंध-विच्छेद, घरेलू हिंसा, सामाजिक बहिष्कार या गंभीर मानसिक तनाव से जुड़ा हो सकता है। प्रत्येक महिला की परिस्थितियां भिन्न होती हैं, इसलिए गर्भपात का निर्णय केवल वैवाहिक स्थिति या पूर्वनिर्धारित सामाजिक धारणाओं पर आधारित नहीं होना चाहिए।

चिकित्सकीय जोखिम, कानूनी शर्तों और उसकी वास्तविक परिस्थितियों का संवेदनशील मूल्यांकन आवश्यक है। विवाह-विच्छेद जैसी स्थितियों को समझे बिना कानूनी श्रेणियों की संकीर्ण व्याख्या न्याय के उद्देश्य को कमजोर कर सकती है।

भ्रूण विकास और चिकित्सकीय सुरक्षा के प्रश्नों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। गर्भावधि बढ़ने पर जटिलताएं व नैतिक मुद्दे गंभीर हो जाते हैं, इसलिए कानून ने विभिन्न अवस्थाओं के लिए अलग व्यवस्थाएं बनाई हैं। इनका उद्देश्य महिलाओं को परेशान करना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य रक्षा के साथ कानूनसम्मत निर्णय सुनिश्चित करना होना चाहिए। चिकित्सकीय निगरानी और महिला की स्वायत्तता को विरोधी नहीं माना जाना चाहिए।

इस समस्या का समाधान कई स्तरों पर खोजना होगा। केंद्र व राज्य सरकारों को सुनिश्चित करना चाहिए कि अस्पतालों के प्रपत्र, चिकित्सकीय दिशानिर्देश और प्रशासनिक प्रक्रियाएं सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक व्याख्या के अनुरूप हों। सरकारी अस्पतालों में प्रशिक्षित चिकित्सक, परामर्श और गोपनीय सेवाएं बढ़ानी होंगी।

महिलाओं को कानूनी अधिकारों व सुरक्षित विकल्पों की सही जानकारी मिलनी चाहिए। किशोरों के लिए आयु-अनुकूल प्रजनन स्वास्थ्य शिक्षा तथा पुरुषों की जिम्मेदारी व गर्भनिरोधक उपलब्धता परिवार नियोजन नीति में जगह पाए। न्यायिक प्रक्रिया में समय अत्यंत महत्वपूर्ण है।

गर्भावस्था के प्रत्येक सप्ताह के साथ परिस्थितियां बदलती हैं; विलंब वैधानिक विकल्प सीमित कर देता है। त्वरित सुनवाई, स्पष्ट चिकित्सकीय राय और संवेदनशील निर्णय जरूरी हैं। महिला की पहचान व निजता की रक्षा भी आवश्यक है, ताकि सामाजिक बदनामी का भय कानूनी सहायता न रोके।

भारत ने महिला शिक्षा, प्रतिनिधित्व और अधिकारों में प्रगति की है, पर वास्तविक समानता उन निजी निर्णयों में सिद्ध होती है जो उसके शरीर, स्वास्थ्य और जीवन को प्रभावित करते हैं। मातृत्व का सम्मान उतना ही जरूरी है जितना मातृत्व संबंधी स्वतंत्र निर्णय का।

असली प्रश्न यह नहीं कि अदालतें कितनी बार अनुमति देती हैं, बल्कि यह कि महिलाओं को अपने वैधानिक अधिकारों के लिए बार-बार अदालत क्यों जाना पड़ता है। समानता अस्पतालों के व्यवहार, सरकारी प्रक्रियाओं और सामाजिक सोच में भी दिखनी चाहिए। प्रजनन स्वायत्तता रियायत नहीं, बल्कि गरिमा और स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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