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नेपाल का आंदोलन महज सोशल मीडिया पर पाबंदी का परिणाम नहीं, भ्रष्ट नेताओं के विरुद्ध सामूहिक गुस्से का इजहार

सार

काठमांडू स्थित चीनी दूतावास से भी नेपाल में हो रही हिंसक घटनाओं के बाबत अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। इस लिए यह कहना फिलहाल थोड़ी जल्दबाजी होगी कि किसी विदेशी एजेंसी की मदद से नेपाल में  इतना उग्र और हिंसक प्रदर्शन हो रहा है।
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नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के खिलाफ प्रदर्शन। - फोटो : एएनआई
नेपाल की मौजूदा हिंसक घटनाओं को देखते हुए पंजाबी के मशहूर कवि अवतार सिंह पाश की एक कविता याद आ रही है...

                    सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना;
                    तड़प का न होना 
                    सब कुछ सहन कर जाना ...
                    सबसे ख़तरनाक होता है 
                    हमारे सपनों का मर जाना.....

पड़ोसी देश नेपाल में दो सौ चालीस साल के राजतंत्र, सत्तर साल के लोकतंत्र और पिछले सत्रह साल के गणतंत्र की व्यवस्था के लागू होने के बाद एक बार फिर वहां का लोकतंत्र बुरी तरह से आग में झुलस रहा है। यह महज सोशल मीडिया पर पाबंदी का परिणाम नहीं हो सकता है।

सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के भ्रष्ट नेताओं के विरुद्ध सामूहिक गुस्से का इजहार है यह हिंसक आन्दोलन। बढ़ती बेरोज़गारी, तानाशाही और सत्ता  के शिखर पर बैठे नेतृत्व की लूट-खसोट और परिवारवाद की छाया में पल-बढ़ रहे 'क्रोनी कैपिटलिज्म' के विरुद्ध  हिंसक विद्रोह यह  नेपाल के लिए कोई नई घटनाएं नहीं हैं।

नेपाल में एक अरसे तक चले माओवादी हिंसा के बाद ही राजशाही का अन्त हुआ और नेपाल में गणतंत्र की स्थापना हुई। इस बार हिसंक आन्दोलन में एक फर्क यह नजर आ रहा है कि सबसे ज्यादा गुस्सा, सबसे  ज्यादा दिनों तक चार बार प्रधानमंत्री रहे के. पी. शर्मा ओली खिलाफ है। उस ओली  खिलाफ जिन्हें चीन का बेहद करीबी माना जाता है।

काठमांडू स्थित चीनी दूतावास से भी नेपाल में हो रही हिंसक घटनाओं के बाबत अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। इस लिए यह कहना फिलहाल थोड़ी जल्दबाजी होगी कि किसी विदेशी एजेंसी की मदद से नेपाल में  इतना उग्र और हिंसक प्रदर्शन हो रहा है। 

सिविल सोसाइटी और एन जी ओ का व्यापक नेटवर्क पूरे नेपाल में एक अरसे से सक्रिय हैं। उनको विदेशी फण्डिंग भी विदेशों से प्राप्त होती है। नेपाली कांग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टीयों को भी कई दात्ता देशों से बड़े पैमाने पर धन प्राप्त होते रहे हैं। नेपाल में आन्दोलन चलाने के लिए और किसी चल रहे आन्दोलन का विरोध के लिए भी। नेपाल की पूरी अर्थव्यवस्था भी विदेशों से प्राप्त 'रेमिटेंस' पर ही आधारित है।

राजशाही के अन्त होने और माओवादी हिंसक आन्दोलन से निकले पुष्प कमल दहल ' प्रचण्ड' के नेतृत्व बनीं  सरकार के चार-पांच महीने बाद से ही यह स्पष्ट दिखायी  देने लगा था कि एक तो इस सरकार की आयु बहुत कम होने वाली है। दूसरा जिस शानोशौकत और पड़ोसी मुल्कों के सत्तासीनों की नकल कर नेपाल में सत्ता  संचालन का  तरीकाअपनाया गया, उतनी  फिजूल खर्ची बर्दाश्त करने की क्षमता नेपाल नहीं है।

तीसरा यह कि माओवादी आन्दोलन से निकला हर नेता और अपने समर्थकों  की नज़र में कार्ल मार्क्स, स्टालिन , लेनिन और माओत्से तुंग से कम आंकने को तैयार नहीं थे.उस वक्त  लेनिन की उपाधि धारण किये और नेपाल के प्रधानमंत्री रहे बाबू राम भट्टराई का अब कहीं अता-पता नहीं चल रहा है।

माओवादियों के सत्ता में आने के बाद पूरे काठमांडू में किताब की सारी दुकानें दुनिया के वामपंथी साहित्य पट गयी थी। हर  नौजवान की की शर्ट पर क्रान्तिकारी  चेग्वारा का फोटो नज़र आता था।कुछ मधेसी इलाके को छोड़कर पूरे नेपाल में भारत विरोधी अपने चरमोत्कर्ष  नजर आ रही थी।

एक  झटके में नेपाल जैसा परम्परावादी देश क्रांतिकारी आन्दोलन से पैदा हुई ऊर्जा और मुक्त हवा में सांस लेता नज़र आने लगा. कई वामपंथी चिंतकों को नेपाल में माओवादियों के नेतृत्व में बनी सरकार और आन्दोलन से  पूरे दक्षिण पूर्व एशिया में लोकतंत्र के चेहरे में व्यापक बदलाव की संभावनाएं नज़र आ रही  थी। 

पर नेपाल में पिछले सत्रह साल में चौदह बार  सत्ता के बदलाव से यह स्पष्ट  हो गया कि पूरब से  सूर्योदय के साथ नये लोकतांत्रिक समाज बनने का सपना शीघ्र ही साकार होने वाला है।पर सूर्यास्त इतना जल्दी हो जायेगा, इसका लक्षण तब भी  कुछ - कुछ दिखायी देने लगा था।

नेपाल में विकसित हो रहे  लोकतंत्र से जिस शान्ति और उन्नति की उम्मीदें नेपाली जनता को थी , उसकी भ्रूण हत्या हो गयी अथवा असमय ही काल कवलित हो गया। पता नहीं माओवादी नेतृत्व और उनके समर्थकों की मार्क्स, लेनिन और माओत्से तुंग बनने की तमन्ना का क्या हश्र हुआ?

नेपाल में व्याप्त व्यापक हिंसा से एक बात बिल्कुल स्पष्ट नज़र आ रही है कि जिन आदर्शों का सब्जबाग दिखाकर कम्युनिस्ट पार्टियां सत्ता में आती रही हैं, सबसे पहले उन वादों और आदर्शों को  ही भूलती हैं। सत्ता में रहते हुए उनका इस क़दर चारित्रिक पतन होता है कि जनता का गुस्सा उन्हें सत्ता से बेदखल कर ही शान्त नहीं होता बल्कि अन्ततः  जनता उनके खून की प्यासी हो जाती हैं।

सन् 1990 में नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना के बाद से  ही नेपाली जनता हताशा - निराशा  के दौर से गुजरना पड़ा था। फिर जनता की ताकत के बदौलत  ही नेपाल में माओवादी आन्दोलन भी अपने अंजाम तक पहुंच था।

इस बार नेपाली जनता संसदीय लोकतंत्र के समर्थक सभी दलों और नेताओं समेत संसद भवन को भी आग के हवाले करने में  कोई कोर कसर नहीं छोड़ी हैं।जनता में अपने भ्रष्ट नेताओं के प्रति इस तरह बेखौफ गुस्सा नज़र  आ रहा है कि उन घरों -दफतरों को भी , जहां बैठकर उनके कमीशन तय होते थे,उसे  जमींदोज कर दफना देने में भी  उन्हें कोई संकोच नहीं है।

'नेक्स्ट जेड' नाम से  स्वत: स्फूर्त इस आन्दोलन से नेपाल में हो रहे आर्थिक नुकसान की तस्वीरें चीख -चीख बता रही हैं कि भ्रष्टाचार, किसी किस्म की तानाशाही और बेरोज़गारी के सवाल को नजरंदाज कर कोई सत्ता बन्दूक के पहरे तले भी बहुत सुरक्षित नहीं रह सकती है।

भारत के पड़ोसी देशों, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में घट रही घटनाओं  से हर ऐसे देशों को सबक लेने की जरूरत हैं जहां ऐसी परिस्थितियों का निर्माण हो रहा हों अथवा निर्माण होने की थोड़ी भी संभावना मौजूद हों।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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