सपा-बसपा गठबन्धन के शीर्ष नेतृत्व के साथ साथ तमाम सांसद प्रत्याशी भी इस चुनाव को स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित करने में विफल रहें।
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सपा-बसपा की रणनीति से कैसे जूझी भाजपा?
उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा के रूप में दो सबसे बड़ी सामाजिक ताकतों का एकसाथ मिलकर चुनाव लड़ना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती थी। भाजपा ने इस निपटने के लिए एक स्पष्ट रणनीति तैयार की, जिसमें भाजपा ने तय किया कि वो पूरे चुनाव अभियान के दौरान स्थानीय मुद्दों पर नहीं जाएगी और न ही अपने प्रत्याशियों को आगे करके चुनाव लड़ेगी।
भाजपा ने राष्ट्रीय मुद्दों को केंद्र में रखा और प्रत्याशियों को मोदी के नाम के पीछे रखा। भाजपा प्रत्याशियों और उनके समर्थकों में भेद करना मुश्किल था क्योंकि प्रत्याशी भी मोदी की बात करता, उनके कामों की प्रशंसा करता और मोदी को जिताने के लिए कमल के फूल पर वोट करने की अपील करता और उनके समर्थक भी यही कार्य करते। सपा-बसपा गठबन्धन के शीर्ष नेतृत्व के साथ साथ तमाम सांसद प्रत्याशी भी इस चुनाव को स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित करने में विफल रहें।
जब हर प्रत्याशी की जगह दिखने लगे केवल मोदी
भाजपा सांसदों के प्रति जनता में रोष तो था लेकिन यह सब प्रत्याशी मोदी को आगे कर उनके पीछे छिपकर चुनाव लड़ने लगे। इससे जनता का यह रोष पान की दुकान से लेकर चाय की दुकान तक तो देखने को मिला लेकिन गठबंधन प्रत्याशियों द्वारा जनता के इस रोष को मुद्दा न बना पाने के कारण पोलिंग बूथ पहुंचते- पहुंचते यह रोष मोदी को जिताने के जोश में तब्दील हो गया। जिसका फायदा अप्रत्याशित रूप से भाजपा प्रत्याशियों को मिलता दिखा। गठबंधन प्रत्याशी भाजपा के चुनावी रणनीति में उलझ गए और भाजपा प्रत्याशियों को छोड़कर मोदी को ही केंद्र में रखकर अपना चुनावी प्रचार चलाने लगे जो भाजपा के रणनीतिकार और भाजपा के प्रत्याशियों के अनुरूप था।
भाजपा को मिला इन चीजों को फायदा
भाजपा प्रत्याशियों को अर्द्ध कुंभ का भी चुनावी लाभ मिला, जिसे प्रदेश सरकार ने दिव्य कुंभ और भव्य कुम्भ कहकर प्रचारित किया था। उत्तरप्रदेश के सभी लोकसभा क्षेत्रों के बहुत से गांवों के लोग इस अर्द्ध कुंभ में गए हुए थे और वहां की व्यवस्था, आयोजन की सुरक्षा और भव्यता को लेकर उनके अंदर भाजपा के प्रति सकारात्मक रुख था। बांसगांव लोकसभा क्षेत्र में आने वाली विधानसभा चौरीचौरा के सरदारनगर ब्लॉक के 59 ग्राम प्रधानों में से एक ने भी खुलकर बसपा प्रत्याशी का प्रचार नहीं किया।
इस क्रम में बात करने पर ग्राम प्रधानों ने कहा- प्रधानी का चुनाव अगले साल होना है ऐसे में कोई भी ग्राम प्रधान लोकसभा चुनाव के चक्कर मे अपने गांव के समीकरण नहीं खराब कर सकता क्योंकि प्रधानी में हमको दलित, पिछड़ा समेत सवर्ण बिरादरी से भी वोट लेना है, ऐसे में किसी एक का बहुत बल लगाकर या मुखर होकर चुनाव प्रचार करना प्रधानी के चुनाव में दिक्कत कर सकता है। लेकिन पार्टी और प्रत्याशियों का प्रधानों पर प्रचार करने के लिए लगातार दबाव बनता देख प्रधानों ने अपने गांव को छोड़कर दूसरे के गांवों में प्रचार करने की तरकीब निकाली, जिसका कोई प्रभाव न तो उनकी प्रधानी पर और न ही उनके प्रत्याशियों की जीत पर होना था।
सपा ने गठबंधन ठीक किया लेकिन लोकसभा क्षेत्रों का चुनाव गलत किया।
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कहां मुश्किल में रहा सपा-बसपा गठबंधन
चुनावी गणित बताते हैं कि सपा- बसपा गठबंधन में जो कुछ भी मिलना है वो बसपा को ही मिलना है। समाजवादी पार्टी को गठबंधन के तहत 37 सीट पर लड़ने का अवसर मिला और इन सीटों पर अगर स्थानीय समीकरण को ध्यान में रखकर प्रत्याशी दिया जाता और स्थानीय मुद्दे पर केंद्रित होकर चुनाव लड़ा जाता तो एनडीए 25 के आंकड़े के इर्द गिर्द सिमट जाती, लेकिन सपा की रणनीति की वजह से भाजपा ने अपनी बढ़त बना ली।
सपा ने गठबंधन ठीक किया, लेकिन लोकसभा क्षेत्रों का चुनाव गलत किया। बस्ती मंडल की 3 सीटों समेत देवरिया लोकसभा को छोड़ देना सबसे गलत फैसला रहा, शहरी क्षेत्रों की अधिकता वाली लोकसभा सीटों को ले लेना भी उचित नहीं रहा क्योंकि सपा का आज भी शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में ज़्यादा असर है और रही सही कसर उनके गलत प्रत्याशियों के चयन ने पूरा कर दिया। बसपा के पास कैडर वोट है और भारत में एक मात्र ऐसा दल है जिसके पास अपना जनाधार शिफ्ट करने की अद्भुत क्षमता है।
मायावती विधानसभा चुनाव 2017 से ही कैडर और मुसलमान के कॉकटेल वाले जनाधार का प्रयोग कर रही थी, लेकिन सफल नहीं हुई। इससे पहले ब्राह्मण और कैडर का प्रयोग सत्ता की चाभी दिलवाने में सफल रहा था, लेकिन ब्राह्मणों को जब मोदी दिखे तो वो इस प्रयोगशाला को छोड़ भाजपा के पास चल दिए। सपा गठबंधन से बसपा के कॉकटेल वाला प्रयोग सफल हो सकता था इसलिए बसपा ने भी मौका लपक लिया। पूरे उ.प्र. के चुनाव में मुसलमान बसपा को लेकर कंफ्यूज नहीं दिखे। मुसलमानों का साथ और कैडर का विश्वास बसपा को सबसे ज़्यादा आर्गेनिक बना दिया। इस गठबंधन में अगर किसी के पास कुछ पाने को है तो वो सिर्फ और सिर्फ बसपा है।
बहरहाल, भाजपा में अमित शाह चुनावी राजनीति के चाणक्य माने जाते हैं। जिस तरह से उन्होंने यूपी में दो बड़े दलों की रणनीति में सेंधमारी की और भले ही पिछली बार की तुलना में कम सीटें हासिल की यह अपने आप में कमाल है।
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