बॉयकॉट चीन तब ठीक है जब देश उसे अवसर में बदले
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इंदौर जैसे मध्यम श्रेणी के शहरों के लोग भी अपनी निजी जरूरत का घरेलू सामान चीन से खरीद कर ला रहे हैं। इसमें प्रमुख है, घर, दफ्तर, व्यावसायिक, बहुमंजिला इमारत में लगने वाला सामान। यह सामान फर्नीचर, सजावटी सामान, सेनेटरी मटेरियल, इलेक्ट्रीकल, इलेक्ट्रॉनिक, टाइल्स से लेकर तो इंटीरियर डेकोरेशन का तमाम सामान चीन से आ रहा है। यदि निर्माण कार्य बड़ा है, सामूहिक है, बहुमंजिला है तो सौदा सस्ता पड़ता है।
इसमें भारत में लगने वाली लागत से कम तो लगता ही है, दो-तीन सदस्य चीन घूमकर भी आ जाते हैं। ऊपर से ठप्पा यह कि हमारा सामान सबसे अलग है, विदेशी है। फिर जब एक बार आप चीन चले ही जाते हैं तो बहुत सारा दूसरा गैर जरूरी सामान भी उठाकर ले आते हैं, इस तर्क के साथ कि बार-बार कौन चीन जा रहा है? निजी तौर पर दो-चार लोगों का समूह भी मिलकर इस तरह की खरीदारी करने जाते रहे हैं।
अब बताइए कि सरकार इसमें कहां तो आपको प्रोत्साहित करने आ रही है और कहां रोकने आ सकती है। उसने ऐसा कोई प्रचार अभियान भी नहीं चलाया कि आप जाएं और चीन से सामान लेकर आएं। प्रचार तो वह स्वदेशी का ही कर रही है, बात तो मेक इन भारत की ही कर रही है, पहल तो आत्म निर्भरता की कर रही है।
आपके पास एक पंक्ति का जवाब हो सकता है कि सरकार चीन के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध क्यों नहीं लगा देती? तो यह इतना आसान नहीं होता। हां, असंभव तो कुछ भी नहीं है । यदि हालात बेकाबू होते हैं तो सरकार का यह दायित्व होगा कि वह इस तरह का कठोर फैसला भी ले और जनता उसे बाध्य भी करे। इस वक्त ऐसा नहीं किया जा सकता।
अभी चीन के साथ गलवान घाटी में जो झड़प हुई और हमारे 20 जवान शहीद हुए, वह असहनीय है। फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन के साथ 1962 के बाद तीन बार और झड़प हो चुकी है। 1967 में चीन के साथ दस दिन तक नाथुला दर्रे पर जंग चली, जिसमें 65 भारतीय सैनिक शहीद हुए तो हमने 400 चीनी सैनिक मार गिराए।
चीन को पीछे हटना पड़ा। 1967 में ही दूसरी बार एक अक्टूबर को लद्दाख के चाओ ला इलाके में घुसना चाहा तो भारतीय सैनिकों ने उसे खदेड़ दिया। 1987 में तीसरी बार चीनी सेना ने समदोई चू में मोर्चा लिया, जो ऊंचा पहाड़ी इलाका होने से चीन ने भारतीय सेना को शिकस्त देने के मंसूबे बनाए होंगे, लेकिन इस बार भी भारतीय सेना ने लद्दाख से सिक्किम तक ऐसी घेराबंदी की कि चीन को पीछे हटना पड़ा। और तो और इसका फायदा उठाकर भारत ने अरुणाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया। चीन के कपड़े तार-तार हो गये।
इस संदर्भ का सबब यह है कि चीन के साथ 1962 के बाद तीन झड़पों के बावजूद जब दुनिया भर में एक-दूसरे राष्ट्र के बीच व्यापारिक संबंध खुले, बढ़े तो भारत भी अपने को दूर नहीं रख सकता था। चीन के साथ भी कारोबार शुरू किया गया। यूं अगर देखें तो पाकिस्तान के साथ तो 1947 से ही कभी प्रत्यक्ष तो कभी छापामार युद्ध चल रहा है, फिर भी हमने कुछेक मौके छोडक़र उससे व्यापारिक संबंध समाप्त नहीं किये तो ऐसा क्यों सोचा जाना चाहिये कि चीन से सारे संबंध रातोरात खत्म कर लिये जाएंगे?
पाकिस्तान तो हमारी पीठ में इतने छुरे घोप चुका है कि पीठ पर खाली जगह ही नहीं बची, लेकिन हमने व्यापारिक सौजन्य बनाए रखा। पाकिस्तान तो वह राष्ट्र है, जो हमारे अस्तित्व को मिटा देना चाहता है और हम उससे संबंध जोड़े रहे। इसलिए कि 21वीं सदी या उससे आगे भी प्रत्यक्ष युद्ध बेमानी या गैर जरूरी हो जाएंगे।
अब तो दुनिया को कोरोना जैसे अनेक हमले झेलने होंगे। जब प्रयोगशालाओं में बनाए गए न दिखाई देने वाले वायरस से दुनिया को खंदकों में छुपने को बाध्य किया जा सकता है तब परमाणु बम, गोलियां या मिसाइल दागने से क्या फायदा?
बहरहाल, फिर से मूल सवाल यह है कि भारतीय जनता को क्या करना चाहिए? बेशक, पहली पहल तो चीनी सामान के बहिष्कार की करना होगी। कुछ का मत है कि ऐसे में उस सामान का क्या होगा, जो भारतीय व्यापारी पहले से खरीद चुका है? इसके लिए उसने अपनी मेहनत की कमाई खर्च की है, सरकार को आयात शुल्क दिया है।
व्यावहारिक नजरिया तो यही कहता है कि हमें वह सामान तो खरीदना चाहिये, जो देश में उपलब्ध है। तब एक पेचीदा सवाल फिर आ जाता है कि ऐसे तो व्यापारी चीनी सामान की मांग देखकर फिर से चीनी सामान का आयात कर लेगा। मुझे नहीं लगता कि मौजूदा चीन विरोधी माहौल के मद्देनजर कोई कारोबारी ऐसी गलती करेगा।
उसकी दिलचस्पी भंडारित माल को बेचने की तो रहेगी, लेकिन हाल-फिलहाल तो वह चीन से आयात नहीं करेगा। यदि कुछ समय तक आयात बंद रखा तो चीन से कारोबार की कड़ी वैसे ही खंडित हो जाएगी, जैसे कोरोना की श्रृंखला तोडऩे की बात कही जा रही है।
चीन का विरोध क्या व्यवहारिक रूप से कारगर होगा?
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मान लेते हैं कि भारतीय ग्राहक व व्यापारी ऐसा कड़ा फैसला लेकर सफलतापूर्वक अमल भी कर लेंगे। फिर भी बात यहां खत्म नहीं होती। इसकी निरंतरता जारी रहेगी, तभी दूरगामी और स्थायी हल निकल सकेगा। यह होगा घरेलू उत्पादन बढ़ाने से। यह बेहद दुष्कर है। सबसे पहली बात तो यह कि हमारे पास बड़ी तादाद में आधारभूत ढांचा ही नहीं है, जो हम चीन की तरह रोजमर्रा में लगने वाली वस्तुएं बना सकें।
चीन ने कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर कम लागत में अधिक उत्पादन की नीति अपनाते हुए जो आम चीनी नागरिक को उद्यमी बना दिया है, वह इतनी जल्दी हमारे बस का नहीं । हमने तो 70 साल में बाबुओं की फौज तैयार की है या आरक्षण से नाकाबिल लोगों को अहम स्थानों से नवाजा है। हमारे डिग्रीधारी चीन से ज्यादा हो सकते हैं, लेकिन मेहनती, उद्यमी, हूनरमंद न्यूनतम हैं। इस गहरी खाई को भावनाओं से तो नहीं पाट सकते। यह रास्ता लंबा, दुर्गम और खड़ी चढ़ाई जैसा ही है, गलवान घाटी की तरह।
दरअसल, भारत को चीन से आर्थिक मोर्चे पर जंग करने और जीतने के लिये बेहद मशक्कत करना होगा। कहने को सरकार एक आदेश से आयात प्रतिबंधित कर सकती है, लेकिन यूं तो आप किसी भी मुल्क के साथ व्यापारिक गतिविधियां संचालित कर ही नहीं पाएंगे। इससे आपकी साख पर भी बट्टा लगता है, जिसका सीधा असर निर्यातकों पर पड़ता है।
विश्व में एक बार यह संदेश गया कि भारत अपने व्यापारिक फैसले भावनात्मक रूप से लेता है तो अंधेर नगरी चौपट राजा हो जाएगा। इसके लिये आत्म निर्भरता ही पहला और कारगर कदम है। आज अमेरिका और चीन जैसे सुपर पॉवर कहलाने वाले देश भी निर्यात करते ही हैं। ऐसा सारा साजो सामान न बना पाने के अलावा परस्पर संबंध के सिद्धांत का पालन भी एक मसला होता है।
अत: हमें चीन समेत पूरी दुनिया से यदि न्यूनतम आयात करना है तो शुरुआत करना होगा शिक्षा प्रणाली के सुधार से। हमें बाबू की बजाय हूनरमंद पीढ़ी तैयार हो, ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करने होंगे। कॉलेजेस की तादाद कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ाने की बजाए आईटीआई, आईआईटी, इंजीनियरिंग कालेज और मानव कौशल संस्थान खड़े करने होंगे। ऐसा एक-दो साल में तो होने से रहा।
चीन जैसे क्रूर तानाशाही धारणा वाले देश को चालीस साल से ज्यादा समय लगा है इस स्थिति में पहुंचने में। वहां साम्यवादी सोच को विदा कर पूंजीवाद को पोषित करने की शुरुआत 1978 से की गई, तब जाकर यह स्थिति बनी। वह भी इसलिए नहीं कि योजना बनाई और आगे बढ़ गए। उसे बेहद आक्रामक तरीके से क्रियान्वित किया। शापित मानव श्रम को वरदान में बदल देने के लिये अनेक क्रूरतम फैसले लिये। क्या भारत में ऐसा संभव है? यहां तो विदेशी मानवाधिकारवादियों को भी पलकों पर बिठाकर बुला लिया जाता है।
सिर्फ इतना ही नहीं तो अलग-अलग कार्यों के लिये दक्षता कार्यक्रम चलाकर उन्हें रोजगार के काबिल बनाना और सतत काम देना भी एक बड़ी जिम्मेदारी रहती है। हम कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में तो उस्ताद हो गए, लेकिन किसी छोटी-सी मशीन की डाई बनाना हो तो विदेश पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए बेहद व्यापक पैमाने पर ऐसे कार्यक्रम प्रारंभ करने होंगे, जहां लोग स्वेच्छा से आत्म निर्भर बनने का रास्ता चुनें। साथ ही युवा पीढ़ी गैर जरूरी डिग्री के पीछे भागने की बजाय व्यावसायिक दक्षता का प्रशिक्षण ले और प्राथमिक शिक्षा के बाद काम से लग जाए।
आप गौर कीजिए कि निचले स्तर के लोग पढ़ाई की बजाय अपनी औलादों को पुश्तैनी काम में लगाना पसंद करते हैं। यही वजह रहती है कि गैरेज से लेकर तो लेथ मशीन पर और ट्रक, कार के चालक से लेकर तो भारी भरकम कारखानों में मशीन चलाने वाले कम शिक्षित या अनपढ़ रहते हैं, लेकिन पढ़े-लिखे के कान काट लेते हैं।
हमारे यहां एक जो सबसे बड़ी मुसीबत है वह है श्रमिक, निचले वर्ग की मुफ्तखोरी की आदत। ऐसा वे खुद की मर्जी से नहीं कर रहे, हमारे फोकटिये, लालची नेताओं ने उन्हें मुफ्तखोर बना दिया, ताकि वे उनके गुलाम मतदाता बने रहें। वे जब चाहें तब भोजन भंडारे, कथा, कावड़ यात्रा, शादी, मरण, गढन में शामिल होकर दीन-दुनिया भूल जाते हैं। मुफ्त में खाना मिल जाता है तो काम क्यों करें?
ये लोग हमारी उत्पादकता में बडे रोड़े हैं। फिर त्योहार इतने सारे हैं कि समूची दुनिया को मिलाकर जितने तीज-त्योहार नहीं हैं, उससे कहीं अधिक हमारे एक मुल्क में ही हैं।
इन पर श्रमिक वर्ग छुट्टियां मनाता है और कारखानेदार सिर पर हाथ रखे बैठा रहता है। मोटे तौर पर देखें तो हफ्ते की एक छुट्टी के हिसाब से साल की 52 छुट्टियों के अलावा 48 छुट्टियां आसानी से हो जाती हैं। याने 365 दिन में से 100 दिन अवकाश के निकल जाते हैं। ऐसे में किसी भी कारखाने या कुटीर उद्योग में उत्पादन क्या खाक होगा?
इसलिए चीन से असल लड़ाई न तो आसान है, न एक दिन की, न अकेले सरकार के बस की। यह तो निरंतर प्रयास से मिल-जुलकर लडऩा होगा और विपक्ष को सरकार व देश के साथ खड़े रहना होगा।
यहां तो ये हाल हैं कि शासकीय सेवा के अलावा बैंक-बीमा वालों की अच्छी खासी नौकरी, वेतन, भत्ते होने के बावजूद आये दिन हड़ताल की घोषणा कर दी जाती है। सरकार, उसकी अर्थ व्यवस्था, कारखाना, ग्राहक, उसका मालिक जाए भाड़ में।
इन दिनों तो बैंक-बीमा वाले यह देखकर हड़ताल की घोषणा करते हैं कि शनिवार या सोमवार को शासकीय अवकाश कब आता है? वे उसके आसपास हड़ताल कर व्यवस्था को चरमराने के लिए छोड़ देते हैं और खुद तफरीह पर निकल जाते हैं। संगठित/असंगठित दोनों क्षेत्र में श्रमिक संघ साम्यवादी प्रभुत्व वाली हैं।
कोई इनसे पूछे कि साम्यवाद के जनक चीन और रूस में ऐसी हड़तालों, तालाबंदी, विरोध-प्रदर्शन की इजाजत है क्या? क्या आप इन लोगों के भरोसे देश को उद्यमियों का देश बना पाएंगे? क्या 365 दिन में से 100 दिन काम बंद कर चीन से मुकाबला करेंगे? क्या भोजन-भंडारे, तीज-त्योहार, नुक्ता, पगंत कर आयात बढ़ा पाएंगे?
भावनाएं हकीकत से वास्ता नहीं रखती। वे केवल हमें भरमाती हैं। असंभव तो कुछ नहीं होता, लेकिन वास्तविकता से रूबरू होने के लिए, जो धैर्य और समर्पण लगता है, वह एवरेस्ट को फतह करने जैसा दुष्कर काम है। क्या हम भारतीय इसके लिए तैयार हैं?
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