रमजान में मस्जिदें नमाजियों से अधिक भरी होती हैं
- फोटो : फाइल फोटो
इसलिए हम सभी को और खास तौर पर मुसलमान भाइयों को यह समझना होगा कि महामारी को रोकने के लिए एकांतवास में रहना, किसी भी सूरत में गैर-इस्लामी नहीं है। बल्कि इन हालत में इससे बड़ा पुण्य का कोई दूसरा कार्य हो ही नहीं सकता।
लॉकडाउन के दौरान भी चोरी-छिपे मस्जिदों में जाकर बजमात नमाज अदा करने वाले अगर बेवकूफ नहीं भी हैं तो सच्चे इस्लाम से अनभिज्ञ अवश्य हैं - दीवाने गर नहीं है तो होशियार भी नहीं ।
किसी भी विशेष परिस्थिति में, जमात से नमाज न पढ़ने के धार्मिक गुरुओं ने जो कारण बताए हैं (जैसे तेज बारिश का होना, बीमार पड़ जाना, सफर में होना, किसी रिसर्च वर्क में लगे होना, कोई ऐसी चीज जैसे की लहसुन/ प्याज खाकर मस्जिद जाना जिसकी बदबू से दूसरे नमाजियों को दिक्कत हो, इत्यादि) इन सब वजहों में, ‘कोरोना वायरस’ कम से कम हजार गुना अधिक गंभीर है।
हाल ही में, किसी एक छोटी सी जमात की लापरवाही और अज्ञानता ने भारत में पूरे एक वर्ग विशेष को आलोचना का शिकार बना दिया। जिससे हम सब हैरान और आहत हैं, इसलिए यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही की पुनराव्रत्ति किसी भी धार्मिक संगठन द्वारा न हो।
कुछ ही दिनों बाद पवित्र महीना रमजान शुरू होने वाला है। सामान्य हालात में, किसी भी मुस्लिम परिवार के लिए रमजान का महीना बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। अन्य महीनों की तुलना रमजान में मस्जिदें नमाजियों से अधिक भरी होती हैं।
इफ्तार पार्टियों में सैकड़ों लोग जमा होते हैं
- फोटो : फाइल फोटो
घरों की महिलाएं और बच्चे ईद की खरीदारी के लिए अक्सर बाजारों में बहुतायत से देखे जा सकते हैं। एक दूूसरे के यहां इफ्तार पार्टियों, रमजान विशेष ‘तरावीह तथा अलविदा की नमाज’ में सैकड़ों लोग जमा होते हैं।
लेकिन आज, जब सारी दुनिया कोविड -19 महामारी से लड़ रही है, इन हालात में हमारा, अपनी सरकार तथा लोकल एडमिनिस्ट्रेशन द्वारा जारी की गई निर्देशिका पर अमल करना और अधिक अनिवार्य हो जाता है।
यहां पर मुझे एम्स-दिल्ली के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया द्वारा हाल ही में एक साक्षात्कार के दौरान उनकी कही हुई बहुत ही आवश्यक बात याद आ रही है कि, “कोविड -19 के खिलाफ यह सामूहिक जंग हम सिर्फ अस्पतालों के भरोसे नहीं लड़ सकते, संपूर्ण विजय प्राप्त करने के लिए हमको विभिन्न सामुदायिक स्तर पर भी यह जंग जीतनी होगी।
“इस्लाम में भी लॉक-डाउन तथा सोशल डिस्टैन्सिंग पर विशेष जोर दिया गया है। इस बारे में एक बहुत मशहूर हदीस भी है कि ‘अगर तुम किसी शहर में हो और वहां महामारी फैल जाए तो उस शहर से बाहर मत जाओ और अगर बाहर हो, तो उस शहर में न जाओ।‘
मुझे इब्ने उमर रजि. की एक और हदीस याद आ रही है कि, “मैंने पैगंबर मुहम्मद साहब को काबे का तवाफ करते समय (चक्कर लगाते) यह कहते सुना कि ऐ काबा! तू कितना अच्छा है, और तेरी खुशबू कितनी बेहतरीन है, तू कितना अज़ीम (महान) है, और तू कितना पवित्र है।
पर कसम उस जात की, जिसके कब्जे में मुहम्मद की जान है कि अल्लाह के नजदीक, एक इंसान की जान और माल से ज्यादा तेरी इज्जत नहीं है।“ अन्य धार्मिक गुरूओं (उलेमा) का भी यही मानना है कि असली मुसलमान वह है, जिसके हाथ से दूसरे इंसान महफूज (सुरक्षित) रहें।
सोशल- डिस्टैन्सिंग को अपनाते हुए अपनी दूरदर्शिता का परिचय दें
- फोटो : self
इस्लामिक फिकह (विधिशास्त्र) के मूल सिद्धांतों के अनुसार भी, मुख्य रूप से- अकीदे, जान, माल, इज़्ज़त और नस्ल की हिफाजत आवश्यक है। उपर्युक्त पांच में से कम से कम तीन का तकाजा यह है कि हम सब फिलहाल मौजूदा मुश्किल समय में सोशल- डिस्टैन्सिंग अख़्तियार करें, जब तक कि हम इस लाइलाज बीमारी पर विजय न प्राप्त कर लें।
उम्मीद करता हूं कि हमारे देश के तमाम शहर-काजी, मस्जिदों के इमाम तथा मुस्लिम परिवारों के बुज़ुर्ग, अपने घर के सभी लोगों को और विशेष कर युवकों को घर के भीतर ही रमजान के अधिकतर अरकान पूरे करने पर आमादा करेंगे।
मजहब भी हमको ऐसी गंभीर परिस्थिति में ऐसा ही करने का हुक्म देता है, इसलिए मजहब की आड़ लेकर, घर से अनावश्यक बाहर निकलकर, किसी भी प्रकार की धार्मिक मजलिसों का कतई आयोजन न करें और न ही उनमें शामिल हों।
सोशल- डिस्टैन्सिंग को अपनाते हुए अपनी दूरदर्शिता का परिचय दें, क्योंकि हमारी एक गलती कई लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है, इनमें आपके अपने परिवार वाले, प्रियजन भी हो सकते हैं।
साथ ही हमको यह भी समझना होगा कि पूरा विश्व इस समय आपातकाल जैसी जटिल परिस्थिति से जूझ रहा है। शायद जिन चीजो की अभी सबसे अधिक जरूरत है, वह है - राष्ट्रीय एकता, अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता तथा आपसी सहयोग।
हमको, सब के साथ मिलकर यह जंग जीतनी है, किसी का दिल दुखा कर नहीं। इन हालत में किसी भी सामाजिक अथवा धार्मिक जलसे में शामिल होना खुदकशी (आत्महत्या) से कम नहीं है और यह आपको मालूम है कि खुदकशी हराम है, फिर चाहे वह मस्जिद ही में क्यों न हो।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।