थर्मल स्क्रीनिंग फुलप्रूफ व्यवस्था नहीं है
अब आप देखिए 4 मार्च में जब आधी से ज्यादा दुनिया कोरोना की चपेट में थी। दुनिया में लाखों लोग संक्रमित थे। तब हमारे यहां विदेश से आने वाले सभी यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू होती है। 11 मार्च को जब डब्लूएचओ कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित करता है तो हमारे देश में अतंराराष्ट्रीय एयरपोर्ट खुले रहते हैं।
अतंराराष्ट्रीय उड़ानें 18 मार्च तक विदेश से कोरोना संक्रमित सवारियां भारत ला रही थीं और उन्हें केवल थर्मल स्क्रीनिंग करके देश में आजाद घूमने के लिए जश्न और पार्टियों में शामिल रहने के लिए छोड़ा जा रहा था।
(याद कीजिए लखनऊ की सैलीब्रेटी कनिका कपूर को या याद कीजिए तब्लीगी जमात के उन 2000 मौलानाओं को जो पर्यटन वीजा पर भारत आते रहे और कोरोना फैलाते रहे।)
हां, क्वारंटीन में रहने की एडवाइजरी थी पर उसे मानता कौन है जनाब? बता दूं थर्मल स्क्रीनिंग से सिर्फ शरीर का तापमान नामा जाता है। जिस्म का तापमान सामान्य से जरा भी ज्यादा हुआ तो वह संदिग्ध करार दिया जाता है। तब तक सब जानते थे कि कोरोना के लक्षण दिखने में 14 दिन लग जाते हैं, इसलिए थर्मल स्क्रीनिंग फुलप्रूफ व्यवस्था नहीं है। इस दौरान मेरे जानने वाले ही आठ लोग विदेश से आए और सबने कहा 'एयरपोर्ट पर उनकी कोई थर्मल स्क्रीनिंग तक नहीं हुई।'
दरअसल, होना ये चाहिए था कि नमस्ते ट्रंप के बाद ही यानी फरवरी में ही सारी अंतराष्ट्रीय उड़ानेंं और विदेश से आने वाले सभी रास्ते बंद कर देने चाहिए थे। कोरोना वायरस कोई आसमान से उड़कर भारत में न आ जाता। इस वायरस का करियर इंसान ही है।
21 दिन के लॉकडाउन में हम आर्थिक रूप से हम आज दस साल पीछे चले गए हैं
- फोटो : PTI
फरवरी में ही विदेशियों के भारत आने पर सौ फीसदी रोक लगनी चाहिए थी। जैसा अन्य देशों ने कर भी दिया था। जो विदेश में स्वदेशी फंसे रह जाते और वापस आना चाहते तो उन्हें इस शर्त पर ही लाया जाता कि वे 14 दिन तक सरकार के कोरनटाइन सेंटर में रहने के बाद ही अपने घर जा सकेंगे।
बस इतना करना था। अगर ऐसा हो जाता तो देश आज ये मुसीबत नहीं झेल रहा होता, जो आज झेल रहा है। इस 21 दिन के लॉकडाउन में हम आर्थिक रूप से हम आज दस साल पीछे चले गए हैं। अगले 19 दिन में और कई साल और पीछे चले जाएंगे। इसलिए ईश्वर के लिए कोई ये न कहे कि हमने तो कमाल कर दिया और वक्त रहते ठोस कदम उठाए। मैंने देश के अफसरों को दोष इसलिए दिया कि सारी ठीकरा हम किसी एक आदमी पर नहीं फोड़ सकते। लोकतंत्र में एक टीम काम करती है। वह कथित करिश्माई टीम कहां है?
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