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कोरोना से जंग: इस छोटी सी एक चूक ने देश को ढकेला लॉकडाउन के अंधे कुंए में, यह कदम उठा लेता भारत तो नहीं फैलता कोविड-19

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एक मामूली सी चूक ने देश को लॉकडाउन के अंधे कुंए में ढकेल दिया - फोटो : amar ujala
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सिर्फ एक मामूली सी चूक ने देश को लॉकडाउन के अंधे कुंए में ढकेल दिया। दिल्ली के लुटियन जोन में बैठे बड़े-बड़े काबिल अफसर वक्त रहते हालात का ठीक-ठीक आकलन नहीं कर पाए। सही वक्त पर सही निर्णय नहीं ले पाए। अगर वक्त रहते फरवरी मध्य में सारी अन्तराष्ट्रीय उड़ानें रोक दी जाती तो देश कोरोना वायरस के हमले से बच सकता था।

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केवल कुछ तथ्यों पर गौर कीजिए। मोदी जी ने अपने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा 'भारत ने एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग तब से शुरू कर दी थी जब भारत में कोरोना का एक भी संक्रमित मामला नहीं था।' यह बात तथ्यात्मक रूप से एकदम सही है। 17 जनवरी को स्वास्थ्य मंत्रालय ने चीन से आने वाले सभी यात्रियों की दिल्ली, मुंबई और कोलकाता एयरपोर्ट पर थर्मल स्क्रीनिंग शुरू कर दी थी।

21 जनवरी को देश के 20 एयरपोर्टस पर थर्मल स्क्रीनिंग शुरू हो गई, लेकिन सिर्फ चीनी यात्रियों के लिए। अब आप सोचिए चीन से कितने लोग अन्य देशों में गए होंगे। तब तक दुनिया भर में संक्रमण फैल चुका था। ऐसे में विदेश से आने वाले सभी यात्रियों की स्क्रीनिंग की जानी चाहिए थी। लेकिन हैरत की बात है कि स्क्रीनिंग सिर्फ चीनी यात्रियों तक महदूद रखी गई। 30 जनवरी को केरल में कोरोना का पहला केस दर्ज हुआ। लेकिन वक्त रहते ये केस पकड़ में आया और गनीमत है, वहां से संक्रमण फैला नहीं। फरवरी भर गुजरात से लेकर आगरा तक नमस्ते ट्रंप होता रहा।
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मध्य प्रदेश में विधायकों की लुकाछुपी का खेल चलता रहा। खतरे की घंटी तब बजी जब 4 मार्च को दिल्ली में इटली के 15 पर्यटक पॉजिटिव पाए गए और इसके बाद विदेश से आने वाले सभी लोगों की स्क्रीनिंग अनिवार्य करने के आदेश जारी हुए। जबकि इस वक्त ही अंतराष्ट्रीय उड़ानेंं रोक देनी चाहिए थीं।

कोरोना वायरस कोई आसमान से उड़कर भारत में न आ जाता...

थर्मल स्क्रीनिंग फुलप्रूफ व्यवस्था नहीं है
अब आप देखिए 4 मार्च में जब आधी से ज्यादा दुनिया कोरोना की चपेट में थी। दुनिया में लाखों लोग संक्रमित थे। तब हमारे यहां विदेश से आने वाले सभी यात्रियों की स्क्रीनिंग शुरू होती है। 11 मार्च को जब डब्लूएचओ कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित करता है तो हमारे देश में अतंराराष्ट्रीय एयरपोर्ट खुले रहते हैं।

अतंराराष्ट्रीय उड़ानें 18 मार्च तक विदेश से कोरोना संक्रमित सवारियां भारत ला रही थीं और उन्हें केवल थर्मल स्क्रीनिंग करके देश में आजाद घूमने के लिए जश्न और पार्टियों में शामिल रहने के लिए छोड़ा जा रहा था।

(याद कीजिए लखनऊ की सैलीब्रेटी कनिका कपूर को या याद कीजिए तब्लीगी जमात के उन 2000 मौलानाओं को जो पर्यटन वीजा पर भारत आते रहे और कोरोना फैलाते रहे।)

हां, क्वारंटीन में रहने की एडवाइजरी थी पर उसे मानता कौन है जनाब? बता दूं थर्मल स्क्रीनिंग से सिर्फ शरीर का तापमान नामा जाता है। जिस्म का तापमान सामान्य से जरा भी ज्यादा हुआ तो वह संदिग्ध करार दिया जाता है। तब तक सब जानते थे कि कोरोना के लक्षण दिखने में 14 दिन लग जाते हैं, इसलिए थर्मल स्क्रीनिंग फुलप्रूफ व्यवस्था नहीं है। इस दौरान मेरे जानने वाले ही आठ लोग विदेश से आए और सबने कहा 'एयरपोर्ट पर उनकी कोई थर्मल स्क्रीनिंग तक नहीं हुई।'

दरअसल, होना ये चाहिए था कि नमस्ते ट्रंप के बाद ही यानी फरवरी में ही सारी अंतराष्ट्रीय उड़ानेंं और विदेश से आने वाले सभी रास्ते बंद कर देने चाहिए थे। कोरोना वायरस कोई आसमान से उड़कर भारत में न आ जाता। इस वायरस का करियर इंसान ही है।
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अगर ऐसा हो जाता तो देश आज ये मुसीबत नहीं झेल रहा होता...

21 दिन के लॉकडाउन में हम आर्थिक रूप से हम आज दस साल पीछे चले गए हैं - फोटो : PTI
फरवरी में ही विदेशियों के भारत आने पर सौ फीसदी रोक लगनी चाहिए थी। जैसा अन्य देशों ने कर भी दिया था। जो विदेश में स्वदेशी फंसे रह जाते और वापस आना चाहते तो उन्हें इस शर्त पर ही लाया जाता कि वे 14 दिन तक सरकार के कोरनटाइन सेंटर में रहने के बाद ही अपने घर जा सकेंगे।

बस इतना करना था। अगर ऐसा हो जाता तो देश आज ये मुसीबत नहीं झेल रहा होता, जो आज झेल रहा है। इस 21 दिन के लॉकडाउन में हम आर्थिक रूप से हम आज दस साल पीछे चले गए हैं। अगले 19 दिन में और कई साल और पीछे चले जाएंगे। इसलिए ईश्वर के लिए कोई ये न कहे कि हमने तो कमाल कर दिया और वक्त रहते ठोस कदम उठाए। मैंने देश के अफसरों को दोष इसलिए दिया कि सारी ठीकरा हम किसी एक आदमी पर नहीं फोड़ सकते।  लोकतंत्र में एक टीम काम करती है। वह कथित करिश्माई टीम कहां है?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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