मूर्तिशिल्प में भी बहुत काम हो रहा है। निवेदिता मिश्रा की ताजा संरचनाएं इसका सबूत हैं। पत्थर खासकर ग्रेनाइट और लकड़ी जैसे माध्यमों में उनका काम उन्हें एक परिपक्व मूर्तिशल्पियों की कतार में ला खड़ा करता है। जाहिर है उन्होंने अपने माध्यम को समझा है, और नई दृष्टि विकसित की है।
इन 5 कलाकारों के बारे में कला समीक्षक रवीन्द्र त्रिपाठी कहते हैं कि उनमें वैचारिक स्तर पर समकालीन भारतीय कला में महिलाओं के लिए विशिष्ट जगह बनाने की आकांक्षा है। उनके मुताबिक माधुरी शर्मा की कलाकृतियों में मुख्य रूप से स्त्री और पुरुष की मिली जुली छवियां हैं। लेकिन ये छवियां एक दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक लगती हैं।
माधुरी को आकृतिमूलक कलाकार बताते हुए रवीन्द्र त्रिपाठी कहते हैं कि आकृतियां चेहरों के डिटेल की बनिस्बत भंगिमाओं को अधिक पेश करती हैं। वे वैचारिक और सैद्धांतिक स्तर पर प्रस्तावित करती हैं कि पुरुष और स्त्री में किसी तरह टकराव नहीं है।
सोनी खन्ना के चित्र भी कहीं न कहीं आकृतियों पर ही केन्द्रित हैं, इनमें स्त्री की वैयक्तिक आकांक्षा की झलक दिखती है। उनकी कलाकृतियों में नारी आकृतियों को प्रकृति से जोड़ा गया है। इनमें अलग-अलग रंग के पत्ते भी हैं और प्रकृति की हरियाली भी। नारी आकृति को भी वह प्रकृति की खूबसूरती का एक अहम हिस्सा मानती हैं। उनका मानना है कि महिलाओं को भी खुले आसमान में उड़ने का हक है और उनपर लगाई जाने वाली बंदिशों से उनकी तमाम प्रतिभाएं और आकांक्षाएं कैद हो जाती हैं, उभर नहीं पातीं।
लेकिन विम्मी इंद्रा की कलाकृतियों में काफी कुछ सांकेतिक है, अमूर्त है। रवीन्द्र त्रिपाठी उनकी कला को कुछ इस तरह देखते हैं – ‘उनकी कलाकृतियों में दो तत्वों का मेल नज़र आता है। एक तो शहरी जिंदगी यानी सिटी स्केप्स और दूसरा उन पर उभरे आज़ाद चेहरे। विम्मी की पेटिंग्स में एक तरह का कंट्रास्ट है, जिसकी वजह से वे दो विरोधी दृश्यों को एक साथ मौजूद दिखाती हैं।’
ललित कला अकादमी में आम तौर पर लगातार ही कोई न कोई प्रदर्शनी आपको देखने को मिलती है। लेकिन कई बार कुछ कोशिशें इन्हें खास बना देती हैं। इन पांचों महिला कलाकारों की इस पहल ने भी कला दीर्घा को नया रूप तो दिया ही है। संभावनाओं से भरी इन कलाकारों ने ज्यादातर समूह प्रदर्शनियों में अपनी कला का प्रदर्शन किया है, लेकिन हरेक कलाकार की ख्वाहिश होती है कि उसकी एकल प्रदर्शनी लगे और उनकी कला को करीब से समझा जाए।
जाहिर है इन तीनों कलाकारों की भी यह कोशिश तो है ही। लेकिन कला जगत में बढ़ती भीड़ और प्रतिस्पर्धा में और खासकर खेमेबाज़ी में खुद को अलग से स्थापित कर पाना खासा मुश्किल काम है। इसीलिए इन कलाकारों ने मिलकर अपनी संस्था ‘स्तब्धिका’ बनाई। उनका मानना है कि आने वाले दिनों में उनकी कोशिश है कि नाम के मुताबिक उनकी संस्था अपने अलग काम से कला प्रेमियों को स्तब्ध कर सके।
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