चावल उत्पादक के लिए मशहूर छत्तीसगढ़ को इन दिनों उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर के जीई प्राप्त 'काला नमक' धान का मुरीद हो गया है। छत्तीसगढ़ को काला नमक की खूश्बू और उसकी खूबियां काफी भा रही हैं।
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहते हैं। यहां धान की कई प्रजातियां और किस्में पाई जाती हैं। बेहतर और उन्नत किस्म के धान होने से यहां की मांग पूरे देश में रहती है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति में लोगों की अजीविका का प्रमुख साधन चावल है। राज्य में करीब हर आयोजन में चावल को प्रमुखता से शामिल किया जाता है। यही वजह है कि यहां धान की नई-नई किस्मों पर शोध होता रहता है। चावल उत्पादक के लिए मशहूर छत्तीसगढ़ को इन दिनों उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर के जीई प्राप्त 'काला नमक' धान का मुरीद हो गया है। छत्तीसगढ़ को काला नमक की खूश्बू और उसकी खूबियां काफी भा रही हैं।
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काला नमक चावल की खेती
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
यही वजह है कि काला नमक धान के जितनी बीज की मांग जीआई वाले पूर्वांचल के 11 जिलों से मिली है। करीब उतनी ही मांग छत्तीसगढ़ से भी आई है। इसे लेकर प्रदेश के धान व्यापारी और बीज भंडार वाले लगातार यूपी के सिद्धार्थ नगर से संपर्क करने में लगे हुए हैं। काला नमक की बीज मंगाने के लिए लगातार फोन किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं बिहार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों के किसान भी इसकी खेती में रुचि दिखा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से के 11 जिलों में काला नमक की खेती की जाती है। सबसे ज्यादा काला नमक धान बस्ती, सिद्धार्थनगर, संत कबीर नगर, बलरामपुर, गोंडा जिलों में पैदा किया जाता है।
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छत्तीसगढ़ से काला नमक चावल के लिए भारी डिमांड
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छत्तीसगढ़ भगवान बुद्ध का प्रसाद माने जाने वाले एवं सिद्धार्थनगर के एक जिला एक उत्पाद जीआई जियोग्राफिकल इंडीकेशन (GI) प्राप्त काला नमक धान का मुरीद हो गया है। काला नमक धान पर दो दशक से काम कर रहे वैज्ञानिक डॉक्टर आरसी चौधरी के मुताबिक, मेरे पास से जितनी बीज की मांग जीआई वाले पूर्वांचल के 11 जिलों से निकली है। करीब उतनी ही मांग छत्तीसगढ़ से भी आई है। दिन में वहां से इस बाबत तमाम लोगों के फोन आते रहते हैं।
रायपुर में एक बीज भंडार के संचालक मनोहर चंद्राकर का कहना है कि प्रदेश के किसान हर साल कम लगात में बेहतर उत्पानद के लिए धान की नई-नई प्रजातियों की मांग करते रहते हैं। ऐसे में काला नमक की डिमांड भी मिली है। लोग काला नमक की मांग कर रहे हैं। इस संबंध में सिद्धार्थ नगर जिले के धान व्यापारी से फोन पर संपर्क भी किया गया है।
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किसानों को काला नमक धान की पैदावार लेने के लिए उत्साहित किया जा रहा
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इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के रिसर्च विभाग के डॉयरेक्टर डॉ. विवेक त्रिपाठी ने कहा कि विश्वविद्यालय में धान की नई-नई प्रजातियों में शोध होता रहता है। धान की नई-नई किस्मों पर बारीकी से अध्ययन किया जाता है। जल्द ही काला नमक प्रजाति को मंगाकर इस पर रिसर्च करेंगे। बेहतर उत्पादन होने की स्थिति में किसानों को काला नमक धान की पैदावार लेने के लिए उत्साहित करेंगे। किसानों को काला नमक बोने के लिए समझाइश दी जाएगी।
जानिए काला नमक की खासियत
काला नमक चावल में कॉफी और चाय की तुलना में अधिक एंटी ऑक्सीडेंट गुण होते हैं। यह स्वास्थ्य संबंधी कई बीमारियों के लिए रामबाण है। इसमें अधिक मात्रा में मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट गुण शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति को बढ़ाते हैं। एक्सपर्ट की मानें तो काला चावल कई बीमारियों से लड़ने में सहयोग करता है। काला चावल में आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन ई, विटामिन बी, कैल्शियम और जिंक मिलता है, जो हामरे शरीर के लिए फायदेमंद होता है। इसमें फाइबर, आयरन, प्रोटीन एंटीऑक्सीडेंट्स की भरपूर मात्रा पाई जाती है। ये चावल एंथोसायनिन और फ्लेवोनोइड प्लांट पिगमेंट की वजह से काला होता है।
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काला नामक चावल को महात्मा बुद्ध का 'महाप्रसाद' कहा जाता है
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जानें, क्यों कहा जाता है महात्मा बुद्ध का 'महाप्रसाद'
कहा जाता है कि जब चीनी यात्री फाह्यान भारत आया था, तब 5वीं ईसा पूर्व के बौद्ध साहित्य उसके हाथ लगे थे, जिसके बारे में उसने बाद में लिखा था। उसने अपनी यात्रा वृतांत में बताया है कि महात्मा बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के बाद जब पहली बार कपिलवस्तु पहुंचे, तो गांव वालों ने उनसे प्रसाद की मांग की थी, तब बुद्ध ने उन्हें 'काला नमक' चावल आशीर्वाद स्वरुप देकर दलदली जगह में बोने के लिए कहा। गौतम बुद्ध ने कहा, चावल में विशिष्ट सुगंध होगी, जो हमेशा लोगों को मेरी याद दिलाएगी।
विदेशों में भारी डिमांड
काला नमक चावल की देश के साथ ही विदेशों में भारी डिमांड है। अमेरिका, नेपाल, इंडोनेशिया, जापान, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड और भूटान समेत कई देशों में काला नमक चावल की बहुत ज्यादा डिमांड है। भारत के साथ ही यह चावल इन देशों में भी काफी लोकप्रिय है।
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काला नमक चावल बेहद लाभकारी होता है।
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छत्तीसगढ़ में धान की दो किस्मों को मिल चुका है GI टैग
उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में सुगंधित चावल की विशेष किस्म 'नगरी दुबराज' को जीआई टैग पहले ही मिल चुका है। विश्वविद्यालय लंबे समय से नगरी दुबराज के GI टैग के लिए कोशिश कर रहा था। हमारी मेहतन रंग लाई। दुबराज में कई तरह की खूबियां हैं। यह यहां की धरोहर जैसी है। अब राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके चावल के लिए लगातार डिमांड आ रहे हैं। इसके पहले साल 2019 में सरगुजा जिले के 'जीराफूल' चावल को जीआई टैग मिला था।
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छत्तीसगढ़ में सुगंधित चावल की 33 किस्में पाई जाती हैं।
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छत्तीसगढ़ में सुगंधित चावल की 33 किस्में
बादशाह भोग, चिरना खाई और लोक्तीमांची- बस्तर जिला
चिंदी कपूर - रायगढ़ जिला
दुबराज- रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, धमतरी, बिलासपुर, महासमुंद, जांजगीर, कोरबा, कांकेर जिला
गंगा प्रसाद-राजनांदगांव
कपूरसार- रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव
कुब्री मोहर-रायपुर, दुर्ग
मेखराभुंडा-दुर्ग
समोद चीनी-बिलासपुर, सरगुजा
शक्कर चीनी-सरगुजा
तुलसी मित्र-रायगढ़
जीराफूल-सरगुजा
छत्तीसगढ़ की मिट्टी और जलवायु को प्रकृति ने धान की खेती के लिए विशेष रूप से सौगात दी है।
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इसलिए छत्तीसगढ़ को कहते हैं धान का कटोरा
छत्तीसगढ़ न केवल एक प्रमुख चावल उत्पादक राज्य है बल्कि यहां चावल खाने वालों की तादात भी कहीं ज्यादा है। ऐसे में यहां पर धान की नई-नई किस्मों पर शोध होता रहता है। यहां क्षेत्रफल की तुलना में अत्यधिक किस्मों का धान उगाया जाता है। छत्तीसगढ़ की मिट्टी और जलवायु को प्रकृति ने धान की खेती के लिए विशेष रूप से सौगात दी है। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा बनाने में धमतरी के किसानों का अहम रोल है। धमतरी जिले में साल में दो बार धान की खेती की जाती है।
क्या होता है GI टैग
जियोग्राफिकल इंडिकेशंस टैग एक प्रकार का बौद्धिक संपदा अधिकार होता है, जिसमें किसी भी उत्पाद की गुणवत्ता एवं महत्ता उस स्थान विशेष के भौगोलिक वातावरण से निर्धारित की जाती है। इसमें उस उत्पाद के उत्पत्ति स्थान को मान्यता दी जाती है। इसके लिए आवेदन किया जाता है। जीआई टैग भारत सरकार की ओर से दिया जाता है। यह उन चीजों के लिए दिया जाता है, जो बहुत खास होती है और किसी क्षेत्र विशेष में पैदा होती है या बनाई जाती है।