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सुनिए...योगराज सिंह की जुबानी, युवराज सिंह के 'सिक्सर किंग' बनने की दिलचस्प कहानी

Mon, 23 Jul 2018 01:03 PM IST
जगदीश जोशी, अमर उजाला, मुक्तसर(पंजाब)
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युवराज सिंह
युवराज सिंह क्रिकेट के मैदान के 'युवराज' कैसे और क्यों बने, जानेंगे तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। सुनिए, पिता योगराज सिंह की जुबानी युवी के 'सिक्सर किंग' बनने की कहानी।
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युवराज सिंह - फोटो : File Photo
योगराज सिंह कहते हैं कि जब बेटा बड़ा हो जाए तो उसे अपना दोस्त बना लेना चाहिए। मैंने युवराज सिंह को बचपन की दहलीज लांघते ही अपना सबसे अच्छा दोस्त बना लिया था। मुझे युवराज सिंह खुदा की उस सौगात के रुप में मिला है, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। कहते हैं भगवान के घर देर है, पर अंधेर नहीं। सन् 1981 में जब मुझे मजबूरन क्रिकेट को अलविदा कहना पड़ा था, तब मैं भगवान से रुठ सा ही गया था। मैं भगवान से शिकायतें करने लगा था।
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युवराज सिंह
उन्हीं दिनों मेरे घर युवराज सिंह ने जन्म लिया। उसे देखकर मुझे लगा कि क्रिकेट के इतिहास में जो मुकाम मैं न पा सका, उस मुकाम पर बेटे को पहुंचाकर अपने सपने को सच करुंगा। उस दिन मैंने मन ही मन युवराज सिंह को क्रिकेटर बनाने की ठान ली। मैंने संकल्प लिया कि युवराज सिंह को क्रिकेट के मैदान का युवराज बनाऊंगा। तब मैंने खुद को चैलेंज किया कि मैं क्रिकेट में अपने बेटे के रुप में दोबारा हिस्ट्री लिखूंगा।

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युवराज सिंह
इस चैलेंज को पूरा करने के लिए मैंने उस उम्र में ही युवराज को क्रिकेट का बैट थमा दिया, जिन दिनों में बच्चे अपने मां-बाप व दादा-दादी की गोद में खेलते हैं। डेढ़ वर्ष की उम्र में मैं उसके लिए क्रिकेट बल्ला ले आया, तो परिवार के लोग व रिश्तेदार मुझे पागल कहने लगे। उस बात को लेकर मैंने रिश्तेदारों की खूब खरी-खोटी सुनी। मगर मैं तो युवराज को क्रिकेटर बनाने की ठान चुका था। मेरी मां गुरनाम कौर मुझसे खूब झगड़ती थीं कि ये उम्र युवराज के साथ उनके लाड करने के दिन हैं, मगर तू उसे कहां क्रिकेट में उलझा रहा है।
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युवराज सिंह
युवराज के पांच वर्ष का होते ही मैंने चंडीगढ़ स्थित डीएवी कॉलेज में उसके लिए क्रिकेट कोचिंग शुरु कर दी। हालांकि उन दिनों युवराज टेनिस खेलने और स्केटिंग करने का शौकीन था, मगर मैंने उसका सारा ध्यान क्रिकेट पर लगाना शुरु कर दिया। नौ वर्ष की उम्र का होते-होते मैंने उसे क्रिकेट ग्राउंड पर ले जाना शुरु कर दिया। वहां मैंने उसकी बॉलिंग प्रैक्टिस शुरु करवा दी। उम्र के उस पड़ाव पर ही वह चौके-छक्के लगाने लगा था। घर में ही स्टेडियम व जिम बना डाला। रिश्तेदारों के यहां आना-जाना छोड़ दिया।
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युवराज सिंह
अब तो सिर्फ लक्ष्य युवी को क्रिकेट मैदान का युवराज बनाना रह गया था। कड़ी मेहनत का नतीजा रहा कि युवराज का सिलेक्शन अंडर 16 टीम में हो गया। युवराज ने चंडीगढ़ के सेक्टर 16 में जम्मू-कश्मीर के साथ पंजाब की ओर से पहला मैच अंडर-16 के तहत खेला। इस मैच में उसने 170 रनों में दस छक्के लगाए। इस दौर में वह पंजाब टीम अंडर-16 के कैप्टन के रुप में उभर कर सामने आया। टीम में रहते हुए युवराज ने कई मैच खेले, जिसमें उसने लगातार 'मैन ऑफ द मैच, 'मैन ऑफ द सीरिज' अपने नाम किए।
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युवराज सिंह
इसी प्रदर्शन की बदौलत युवराज का सिलेक्शन नेशनल क्रिकेट टीम में हो गया। उसके बाद युवराज ने कई रिकार्ड बनाए। लगातार छह बॉल पर छह छक्के लगाने वाले भारतीय खिलाड़ी का खिताब  युवराज सिंह के नाम है। पर किस्मत का खेल देखिए, उसका करिअर बेहतरीन मुकाम पर पहुंच चुका था, मगर युवराज को कैंसर हो गया। इस वजह से उसे क्रिकेट से दूरी बनानी पड़ी। युवराज ने भी हिम्मत न हारते हुए कैंसर को मात दी और स्वस्थ होकर मैदान में लौट आया।

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योगराज सिंह
शैतान बच्चे टैलेंटेड भी होते हैं। युवराज बचपन में बहुत शैतान था। उसे गाड़ी सीखने व चलाने का बहुत शौक था। 17 वर्ष की उम्र में उसने मुझे बिना बताए चोरी-छिपे गाड़ी चलानी सीख ली थी। होली का दिन था और घर में मेरी जीप खड़ी थी। मगर मैं चाबी छिपाकर जाता था। उसने दोस्तों के साथ मिलकर कैंची तोड़कर उसकी नोक से जीप का लॉक खोल लिया और जीप लेकर दोस्तों के साथ होली खेलने निकल गया।शाम को आकर जीप अच्छी तरह से धो खड़ा कर दिया और सोचा कि पापा को कुछ पता नहीं चलेगा। मगर बाप तो बाप होता है।

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युवराज सिंह - फोटो : getty
जीप में कई जगह होली के रंग के छींटे पड़े रह गए थे। मैंने आते ही युवराज से पूछा कैसा रहा दिन? तो कहने लगा 'पापा बहुत प्रैक्टिस की। आज बहुत थक गया तो मैंने भी तपाक से पूछा और होली कैसी रही तो वो सकपका सा गया। तब मैंने उसे कहा कि चोरी-छिपे गाड़ी चलानी सीख ही ली, तो सब हंस पड़े। उस दिन से वो गाड़ी की मांग करने लगा, पर मैंने कहा कि पहले कुछ करके और बन के दिखाओ। तब गाड़ी भी दिला दूंगा। जब उसने वर्ल्ड कप जीता और मैन ऑफ दी सीरीज का खिताब पाया तो मैंने उसे उसको होंडा गाड़ी गिफ्ट की।

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क्रिकेटर युवराज सिंह - फोटो : file photo
उसके बाद तो युवराज का करिअर निकल पड़ा तो उसने कई गाड़ियां ले लीं। मगर मेरी दी गई उसके जीवन की पहली गाड़ी आज तक उसके पास है। ऐसा ही एक वाक्या और याद आता है। मैं शूट पर निकलने के लिए घर से निकला ही था कि जनाब क्रिकेट प्रैक्टिस छोड़कर साइकिल उठाकर घूमने निकल पड़े। मुझे शूट पर जाने से पहले कोई काम याद आ गया तो मैं रास्ते से ही वापस घर लौटा। देखा कि युवराज मजे से साइकिल चलाने में मग्न है। मुझे घर में देख उसके हाथों से साइकिल छूट गया और वो डर के मारे डीएवी कॉलेज ग्राउंड में प्रैक्टिस करने निकल पड़ा।
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युवराज सिंह
योगराज सिंह बताते हैं कि युवराज के बचपन की ऐसी बहुत सी शैतानी हरकतें आज भी मेरे जेहन में आ जाती हैं तो हंसी छूट जाती है। क्रिकेट की दुनिया में रहते हुए मैंने भारत के लिए जो सपने देखे थे वो मैं किसी कारण पूरे न कर सका। मगर मैं भगवान का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने मुझे युवराज के रुप में उन्हीं दिनों एक पुरस्कार दिया, जिसने मेरा सपना पूरा कर दिखाया। भगवान ऐसी औलाद हर किसी को दे। मेरी बस यही दुआ है।
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