प्रख्यात कलाकार शिव सिंह का जाना, कला की देह से प्राण का जाना है। बेजान पत्थर से लेकर फौलाद तक, जिस पर उनका हाथ लगता, उनकी ही भाषा बोलता। सृष्टि की तरह ही उन्होंने कला का एक अद्भुत संसार रचा। देखिए। रिपोर्टः दीपक शाही
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देखिए, राष्ट्रपति अवार्ड विजेता का खूबसूरत 'वर्ल्ड ऑफ आर्ट'
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अपनी बोल्ड पेंटिंग और बेमिसाल कला कौशल के जरिए पत्थरों में जान फूंकने वाले, शिव द्वारा के शिव सिंह नहीं रहे, लेकिन सिटी ब्यूटीफुल की सुंदरता में चार चांद लगाने के में उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।
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शिव सिंह ने अपने स्कल्पचर व पेंटिंग कला कौशल से चंडीगढ़ की शान बढ़ाई। इसका नमूना चंडीगढ़ के कला ग्राम, लेजर वैली, म्यूजियम, आर्ट गैलरी, होमसाइंस कॉलेज, होटल माउंट व्यू समेत शहर की प्रसिद्ध जगहों पर पहुंचकर लगाया जा सकता है।
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अपनी कलाकृतियों की विषय वस्तु को लेकर शिव सिंह कई विवादों में भी रहे। 1994 में चंडीगढ़ में लगी प्रदर्शनी में शिव सिंह ने अपनी कृतियों से नारी प्रताड़ना के खिलाफ आवाज मुखर की। इसकी बोल्डनेस पर काफी विवाद हुआ। इस पर शिव सिंह ने आलोचकों को जवाब दिया था कि एक महिला का समाज में सम्मान जरूरी है। यदि उसे एक साधन समझा लिया जाएगा तो अत्याचार से तंग आकर वह दुर्गा का भी रूप ले सकती है।
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कुछ महीने से फेफड़े के कैंसर से जूझ रहे मशहूर शिल्पकार, पेंटर प्रो.शिव सिंह का हार्ट अटैक के बाद सेक्टर-21 स्थित एलकेमिस्ट हॉस्पिटल में निधन हो गया। जर्मन मूल की उनकी पत्नी गिजेला सिंह ने बताया कि आखिरी दिनों में वह बार-बार ‘लेट मी गो’ कह रहे थे। चंडीगढ़ के अधिकतर हिस्सों में उनकी कलाकृतियां लगी हैं।
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दस वर्ष तक ललित कला अकादमी दिल्ली के सदस्य रहने के साथ पंजाब ललित कला अकादमी, चंडीगढ़ के संस्थापक सदस्य शिव सिंह को भारत और जर्मनी सहित अन्य कई देशों में सम्मानित किया जा चुका है। प्रतिभा देखते हुए जर्मन सरकार ने 1968 में आर्ट्स के क्षेत्र में एडवांस स्टडी के लिए स्कॉलरशिप पर उन्हें जर्मनी आमंत्रित किया था।
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जर्मनी में ही उनकी मुलाकात गिजेल से हुई। पत्नी गिजेल ने बताया कि पहले वह जर्मन एंबेसी में थीं, जहां उनकी मुलाकात शिव सिंह से हुई। गवर्नमेंट होमसाइंस कॉलेज में आर्ट्स के प्रोफेसर रहे प्रो.शिव सिंह की कलाकृतियां अलग पहचान रखती हैं। शिव सिंह के निधन पर पंजाब के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री सोहन सिंह ठंडल ने शोक जताया है।
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प्रसिद्ध मूर्तिकार शिव सिंह (77) ने दशकों पहले अपने पैतृक गांव बस्सी गुलाम हुसैन को छोड़ दिया था, लेकिन गांव के लिए लगाव अंत तक बना रहा। वे कहते थे कि मैं अपनी मूर्तियों में अपने गांव को जी लेता हूं। गांव से कोई भी, किसी भी उम्र का हो, उनसे मिलता तो वे उसका दिल से स्वागत करते थे। गांव के लोग उनके निधन की सूचना से सदमे में हैं। शिव सिंह के पिता गांव बस्सी गुलाम हुसैन में खेती करते थे और करीब 35 एकड़ जमीन के स्वामी थे।
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गांव के बुजुर्ग बलदेव सिंह बताते हैं कि शिव सिंह ने गांव के स्कूल में चौथी कक्षा तक पढ़ाई की और फिर वह होशियारपुर में डीएवी हायर सेकेंडरी स्कूल में दाखिल हो गए जहां से उन्होंने मैट्रिक की। शिव फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे, लेकिन बाद में उन्होंने अपना ध्यान चित्रकला और मूर्तिकला की तरफ लगाया। उन्होंने गांव के चो के तट की रेत को मूर्तियां और चित्र बनाने के लिए इस्तेमाल किया।
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गांव का युवक समीर सैनी कुछ साल पहले पंचकूला में उनसे मिलने गया तो उन्होंने लंबे समय तक गांव के लोगों के बारे में बातें की। समीर ने बताया कि शिव सिंह ने कहा कि वह अपनों को कभी नहीं भूल सकते। पंजाबी विश्वविद्यालय में बनाई गई मूर्तिकला गांव के स्कूल के पास खड़े पुराने बरगद के पेड़ का ही अवतार है।
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शिव सिंह की कलाकृतियों में उनकी खास विशेषता वुमन आर्गन को लेकर मिलती है। चाहे वो पेंटिंग हो या फिर पत्थर की प्रतिमाएं। शिव सिंह की करीबियों में एक पोएट मंजीत इंद्रा का कहना है कि शिव सिंह की प्रतिमा को न केवल भारत में बल्कि विश्व के बाकी हिस्सों में भी सराहना मिली। खासकर जर्मनी में उन्हें स्नेह मिला। उनकी जिंदगी का सबसे अहम पहलू वहां जुड़ा है क्योंकि एग्जीबिशन के सिलसिले में जर्मनी जाने के बाद उन्हें जीवन साथी भी मिला।
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जर्मन सरकार ने शिव सिंह की प्रतिभा से खुश होकर आर्ट एडवांस स्टडी के लिए थ्री ईयर के स्कालरशीप की घोषणा की। इसी बीच उन्होंने जर्मन युवती से प्रेम हुआ। घर की रजामंदी से शादी भी की। उन्होंने बताया कि कला के क्षेत्र में प्रचलित करने में उनकी पत्नी का भी अहम योगदान है।
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शिव सिंह ने अपने कला कौशल के माध्यम से सामाजिक बुराइयों पर भी कटाक्ष किया है। उन्होंने परिवार नियोजन के उपायों को बढ़ावा देने से लेकर एड्स जैसी बीमारी से बचाव का भी संदेश दिया। कलाग्राम में सुशोभित उनकी बनाई स्कल्पचर परिवार नियोजन के प्रचलित स्लोगन हम दो हमारे दो को दर्शाते हैं।