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सेना के दो अफसरों की अनोखी लव स्टोरी, कैसे मिले वैलेंटाइन?

Sun, 14 Feb 2016 09:28 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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आज प्यार करने वालों का दिन है, वैलेंटाइन डे। आइए आपको सुनाते हैं, सेना के दो अफसरों की अजब प्रेम की गजब कहानी। इन्हें अपने वैलेंटाइन मिले, पर अनोखे अंदाज में।
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सेना के दो अफसरों की अनोखी लव स्टोरी, कैसे मिले वैलेंटाइन?

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पहली कहानी है रिटायर्ड विंग कमांडर वीके साहनी के प्यार की। वी के साहनी 1977 में असम से अमृतसर छुट्टी बिताने जा रहे थे। एक दिन के लिए चंडीगढ़ अपने भाई के पास रुके। शाम को सेक्टर 19 में वह शॉपिंग के लिए गए। वहां दुकान पर उनकी नजर सामान खरीद रही निशी पर पड़ी। बस दिल धड़क उठा और बोला कि यही है, जो जिंदगी के सफर पर हमसफर बनेगी।
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बस फिर क्या था, वीके साहनी ने अपने बड़े भाई से कहा इस लड़की से मैं शादी करना चाहता हूं। बड़े भाई ने कहा पक्का। कर्नल ने कहा अब शादी करूंगा तो इस लड़की से ही करूंगा। क्योंकि यह लड़की नजरों से दिल में उतर गई है। संयोग से निशी के घर वाले कर्नल के बड़े भाई के पहचान वाले निकले। और दस दिन के भीतर दोनों की शादी कर ली।

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अब सुनिए, रिटायर्ड कर्नल एस के दत्ता की कहानी, जिनका प्यार 1980 में परवान चढ़ा। उन दिनों कर्नल की पोस्टिंग सेना में बतौर कैप्टन चंडीमंदिर में थी। वह बताते हैं कि अनुपम शर्मा से उनकी मुलाकात पहली बार जन्मदिन पार्टी में हुई थी। वहीं से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। वह कहते हैं- उन दिनों हमारे पास मोबाइल फोन नहीं थे। सेना से छुट्टी भी कम मिलती थी।
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बड़ी मुश्किल से अनुपम के जीजा के दुकान पर फोन कर कभी कभी बात हो पाती थी। दोनों एक दूसरे को पसंद करते थे। कर्नल ने बताया कि उन्हें एक बार एक साल के लिए चंडीमंदिर से दूर जाना पड़ा। अब तो फोन भी बंद हो गया। फिर एक दूसरे का हाल जानने का माध्यम फौजी लेटर बना। उससे एक दूसरे की सलामती की सूचना मिल जाती थी। लेकिन अभी प्यार का इजहार नहीं हुआ था।
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जब कर्नल की चंडीमंदिर वापसी हुई तो उन्होंने अनुपम शर्मा को मिलने के लिए रोज गार्डन बुलाया। वहीं से दोस्ती प्यार में तबदील हो गईं। इसके बाद 1982 में दोनों ने परिवार की सहमति से शादी कर ली। वहीं, कर्नल की बेटी नीतिका ने भी अपने प्यार के लिए अपने पति के रीति-रिवाजों को अपनाया और शाकाहारी से मांसाहारी बन गईं।
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प्रेम बड़ी उलझी हुई भावना है। इस भावना को लौकिक और अलौकिक खेमे में बांटकर देखने से सामाजिक दबाव कम होता हुआ अनुभव होता है। इसीलिए कबीर सहजता से कह पाते हैं कि ‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।। कबीर का यह दोहा सेना से रिटायर दो परिवारों पर सटीक बैठता है।
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