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अनोखा रिवाजः इस गांव में एक दिन बाद मनाई जाती है दीवाली, तस्वीरें

Sat, 29 Oct 2016 09:23 PM IST
अमित शर्मा/अमर उजाला, मोहाली(पंजाब)
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मोहाली का अनोखा गांव, जहां अगले दिन मनाई जाती है दीवाली
क्या आप जानते हैं कि देश में एक गांव ऐसा है, जहां सदियों पुराने एक रिवाज को निभाते हुए एक दिन बाद दीवाली मनाई जाती है। देखिए तस्वीरें।
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मोहाली का अनोखा गांव, जहां अगले दिन मनाई जाती है दीवाली
चंडीगढ़ इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बिल्कुल नजदीक बसा है गांव चिल्ला। गांव की जनसंख्या करीब पांच हजार है और यहां आज भी दीपावली को लेकर जो सदियों पुरानी मान्यताएं हैं। उसके तहत गांव में दीवाली का त्योहार एक दिन बाद मनाया जाता है। जबकि दीपावली वाले दिन गांव के लोग अपने रिश्तेदारों के यहां जाकर खुशियां मनाते हैं।
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मोहाली का अनोखा गांव, जहां अगले दिन मनाई जाती है दीवाली
गांव की दहलीज पर ही इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च जैसा देश का नामी संस्थान है। यहां पर साइंस में रोज नई-नई खोज होती हैं और लोगों के अंध विश्वास तोड़े जाते हैं। गांव के लोग भी पढ़े लिखे हैं। हर क्षेत्र में गांव वालों की धाक है। वहीं, इस गांव में सदियों पुरानी मान्यता का पालन किया जाता है।

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मोहाली का अनोखा गांव, जहां अगले दिन मनाई जाती है दीवाली
गांव के मास्टर अमरजीत सिंह, जो 70 साल के हैं। उनका कहना है कि गांव में एक दिन बाद दीपावली मनाई जाती है। उनके बुजुर्ग बताते थे कि कई साल पहले दीपावली की पूजा होने वाली थी। उस दिन शाम में गांव के पशु जो चरने के लिए छोड़े हुए थे, वह घर नहीं आए। जैसे ही खबर लोगों तक पहुंची। इसके बाद पूरा गांव पशुओं की तलाश में जुट गया।
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मोहाली का अनोखा गांव, जहां अगले दिन मनाई जाती है दीवाली
मास्टर ने बताया कि देर रात पशु जाकर पशु मिले, लेकिन तब तक दीपावली मनाई जा चुकी थी। इसके बाद गांव के लोगों ने पशु मिलने की खुशी में त्योहार के अगले दिन दीपावली का जश्न मनाया। तब से गांव में आजतक इसी तरीके से यह पर्व मनाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि दीपावली के अगले दिन गांव में भव्य मेला लगता है। इसके बाद पूरे गांव में जश्न मनाया जाता है।
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मोहाली का अनोखा गांव, जहां अगले दिन मनाई जाती है दीवाली
अजायब सिंह की उम्र करीब 80 साल है। वह कई बार गांव के सरपंच रह चुके हैं। अजायब सिंह ने बताया कि उन्होंने बुजुर्गों से सुना था कि कई साल पहले दीपावली के दिन बच्चे की बलि दी जाती थी, लेकिन इस बात का एक बार शोर मच गया था। जिसके बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया। साथ ही दीपावली के दिन यह त्योहार नहीं मनाया गया। माहौल शांत होने पर अगले दिन लोगों ने दीपावली मनाई।
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इसके अलावा अजायब सिंह ने बताया कि इसके बाद गांव में त्योहार वाले दिन भेड़ की बलि देने की मान्यता आई। एक बार वह बलि देने के लिए भेड़ ले आए, जब उसकी बलि दी जाने लगी तो वह कटा नहीं। इसके बाद वह अगले दिन उस भेड़ को जिस गांव से लाए थे, वहां छोड़ आए। वहीं, दीपावली अगले दिन मनाई गई।
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