व्यक्ति शरीर से नहीं मस्तिष्क से होता है। अगर उसका दिमाग उसके पास नहीं होता तो उसका अपने ऊपर नियंत्रण भी नहीं रहता। मस्तिष्क ही इंसान की पहचान होता है। यही दिखाया गया नाटक ट्रांस्पोज्ड हेड्स में जिसका मंचन पंजाब कला भवन के ओपन एयर थिएटर में बुधवार को हुआ। नाटक चंडीगढ़ के मास्क थिएटर ग्रुप के चार कलाकारों ने दिल्ली की संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से पेश किया। वहीं नाटक का निर्देशन रविंदर कुमार ने किया।
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नाटक का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
नाटक में एक ओर यहां दोस्ती के खूबसूरत रिश्ते को दिखाया गया वहीं एक नारी की इच्छाओं का भी चित्रण किया गया। इसके अलावा नारी की पूर्णता की मांग को भी जायज ठहराया गया। नाटक की कहानी दो दोस्तों नंद पहलवान और एक ब्राह्मण के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों दोस्त सीता नाम की खूबसूरत लड़की से प्यार करने लग जाते हैं। दोनों ही उस लड़की की खुशी के लिए खुद के प्राणों से गवां देते हैं। सीता की इच्छा होती है कि उसे दिमागी और शारीरिक रूप में एक सुंदर वर मिले।
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नाटक का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
उसकी शादी ब्राह्मण लड़के से हो जाती है, लेकिन नंद का शरीर उसे हर समय आकर्षित करता रहता है। जब उसके पति को इस बारे में पता चलता है तो वो काली मां के मंदिर में जाकर सीता की खुशी के लिए अपना शीश धड़ से अलग कर लेता है। जैसे ही नंद पहलवान को इस बारे में पता चलता है तो वो भी वहां आकर अपने प्राण त्याग देता है। तब सीता वहां आती है और मां के आगे उन्हें जीवित करने की गुहार लगाती है।
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- फोटो : अमर उजाला
तब मां उसे कहती है कि अगर तुम दोनों के शीश उनके धड़ से जोड़ दोगी तो वो जिंदा हो जाएंगे। सीता गलती से नंद का शीश ब्राह्मण के धड़ से और ब्राह्मण का शीश नंद के धड़ से जोड़ देती है। दोनों जीवित हो जाते है तो नाटक की कहानी नया मोड़ लेती है। नाटक में सीता का रोल अश्मिता कालरा ने निभाया, वहीं नंद की भूमिका में दीपक रोहिला, ब्राह्मण की भूमिका में विशाल वशिष्ट थे। सूत्रधार के रूप में कुबैर हुड्डा ने दर्शकों को नाटक के साथ जोड़े रखा।
जर्मन लेखक थॉमस मान की कहानी है ट्रांस्पोज्ड हेड्स : यह नाटक जर्मनी के नाटक व कहानीकार थॉमस मान की कहानी पर आधारित था। हिंदी में इस कहानी का नाटकीय रूपांतरण जाने माने लेखक गिरीश करनाड़ ने किया था, जिसका नाम है वदन था।