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सूर्यग्रहण मेलाः पवित्र ब्रह्मसरोवर में हजारों श्रद्धालुओं ने लगाई मोक्ष की डुबकी, देखिए तस्वीरें

Thu, 26 Dec 2019 07:04 PM IST
खुशबू गोयल राजेश शांडिल्य, अमर उजाला, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)
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सूर्यग्रहण मेला - फोटो : अमर उजाला
इधर सूर्यग्रहण चल रहा है, उधर धर्मनगरी कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण मेला, जहां पवित्र ब्रह्मसरोवर में मोक्ष की डुबकी लगाने को हजारों श्रद्धालु पहुंचे। देखिए तस्वीरें...
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सूर्यग्रहण मेला - फोटो : अमर उजाला
विज्ञान की दृष्टि से सूर्यग्रहण भले खगोलीय घटना हो मगर प्रचंड ठंड में श्रद्धालुओं ने साबित कर दिया कि युगों पुरानी परंपरा से उन्हें किसी भी दौर में नहीं हटना। यही कारण है कि कड़कड़ाती ठंड के बीच लाखों श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई। दरअसल सूर्यग्रहण का संयोग 8 बजकर 15 मिनट पर स्पर्श और 10 बजकर 55 मिनट पर मोक्ष की अवधि थी। ठंड पिछले 19 साल के रिकॉर्ड पर थी तो पुरातन संस्कृति में आस्था रखने वाले श्रद्धालु धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के सन्निहित सरोवर और ब्रह्मसरोवर के बर्फ जैसे ठंडे पानी में मोक्ष की डुबकियां लगाने से नहीं चूके। भारी पुलिस प्रशासनिक अमले के बीच नागा साधुओं का शाही स्नान भी हुआ।
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सूर्यग्रहण मेला - फोटो : अमर उजाला
पिहोवा रोड श्री पंचदशनामी अखाड़े और थानेसर के श्री पंचायती उदासीन बड़ा अखाड़ा से दो शाही यात्राएं परंपरागत ढंग से निकलीं और सन्निहित एवं ब्रह्मसरोवर तक पारंपरिक तरीके से पहुंची, जहां मोक्ष की अवधि में इन्होंने स्नान किया। यही नहीं गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज, स्वामी मुक्तानंद महाराज, नागा साधुओं, संत सन्यासियों, श्रीमहंत, महामंडलेश्वर व दूसरी परंपराओं के महंतों संतों के अलावा सांसद नायब सैनी, न्यायाधीश डॉ. निलिमा शांगला, पूर्व विधायक डा.पवन सैनी सहित कई गणमान्य लोगों ने भी मोक्ष की डुबकी लगाई। मेले की भीड़ में एक खास चेहरा पड़ोसी देश नेपाल से आई 110 वर्षीया देबादेवी का भी रहा, जिन्होंने परिवार संग मोक्ष की डुबकी लगाई।

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सूर्यग्रहण मेला - फोटो : अमर उजाला
प्रशासन के दावे के अनुसार भले संख्या 15 लाख ना रही हो, मगर बगैर ब्रांडिंग के जितनी संख्या श्रद्धालुओं की यहां दिखी वो मौसम की मार के आगे काफी ज्यादा थी। तड़के पांच बजे से ही ब्रह्मसरोवर पर चहल-पहल दिखने लगी थी। एक ओर ड्यूटी पर तैनात स्टाफ तो दूसरी ओर आस्था के समंदर में डुबकी लगाने वालों का रेला सरोवरों की ओर कूच करते दिखा। उत्सवों और मेलों की नगरी कुरुक्षेत्र में इस बार 10 साल बाद सूर्यग्रहण मेले का संयोग बना है। स्थानीय पंडा समाज की माने तो पहले के दौर और वर्तमान में काफी अंतर आ चुका है। पहले देश-दुनिया में कहीं भी बसने वाले लोग अपने कुल पुरोहितों और ब्राह्मणों के अलावा पंचांग में सूर्यग्रहण जैसे ऐसे संयोग के बारे में जानकारी रखते थे, मगर वर्तमान दौर में लोग अपनी संस्कृति से थोड़ा दूर हुए हैं।
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सूर्यग्रहण मेला - फोटो : अमर उजाला
भागदौड़ की जीवन शैली में लोगों का अपने पुराने रीति-रिवाजों और मान्यताओं से ध्यान घटा है। ऐसे में पुरानी परंपराओं और युगों-युगों से चल रहे ऐसे मेलों की जागृत रखने के लिये नये दौर के माध्यमों से इसका प्रचार प्रसार होना चाहिये। सूर्यग्रहण पर सन्निहित और ब्रह्मसरोवर के पवित्र जल में नागा साधुओं और अन्य संत जनों ने आस्था की डुबकी लगाई। इस मौके पर नागा साधुओं ने भागवान दत्तात्रेय और चांदी की चरण पादुका और शाही छड़ी को परंपरा अनुसार सरोवर में स्नान कराया। पिहोवा रोड स्थित श्रीपंच दशनामी अखाड़ा और श्री पंचायत उदासीन बड़ा अखाड़ा से शाही यात्राएं बैंड बाजों के साथ परंपरागत ढंग से रवाना हुई। 
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- फोटो : अमर उजाला
नागा साधुओं के पांव तले की धूल, चावल, फूल उठाने उमड़े श्रद्धालु
नागा साधुओं की यात्रा के दौरान फूल और चावल से उनका न सिर्फ स्वागत किया गया बल्कि उनके पांव तले की धूल उठाने के लिए श्रद्धालुओं का तांता लग गया। इस शाही स्नान के लिए प्रशासन की तरफ से सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। नागा साधुओं का शाही स्नान ब्रह्मसरोवर के युधिष्ठिर घाट पर हुआ, जबकि सन्निहित सरोवर पर शाही स्नान श्रीकृष्ण संग्रहालय के पिछले गेट की ओर सन्निहित सरोवर घाट पर हुआ। सूर्यग्रहण मेले की पूर्व संध्या पर ही पंजाब, हरियाणा व आसपास के राज्यों से करीब 300 नागा साधु व अन्य संत समाज के लोग पिहोवा रोड पर स्थित श्री पंच दशनाम साधु संस्था पिहोवा के आश्रम में पहुंच गए थे, इस आश्रम के चारों तरफ सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
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- फोटो : अमर उजाला
भगवान श्रीकृष्ण भी सूर्यग्रहण के अवसर पर पहुंचे थे कुरुक्षेत्र 
महाभारत की एक कथा के मुताबिक भगवान श्री कृष्ण के मथुरा छोड़ने के बाद अपने माता-पिता (यशोदा और नंद बाबा) व देवी राधा से आखिरी मुलाकात हुई थी। यही नहीं सभी गोपियों संग भगवान श्रीकृष्ण ने पवित्र ब्रह्मसरोवर में स्नान किया था। गोपियों से मिलने के बाद भगवान श्रीकृष्ण की कुंती व द्रौपदी सहित पांचों पांडवों से भेंट हुई। सूर्यग्रहण का पुराणों में जिक्र है कि राहु द्वारा भगवान सूर्य के ग्रस्त होने पर सभी प्रकार का जल गंगा के समान, सभी ब्राह्मण ब्रह्मा के समान हो जाते हैं। इसके साथ ही इस दौरान दान की गई सभी वस्तुएं भी स्वर्ण के समान होती हैं।
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- फोटो : अमर उजाला
तुला दान हुआ, राजशाही के साथ रानीदान की परंपरा भी खत्म
शरीर के रोगों से मुक्ति पाने के लिये तुला दान की परंपरा सदियों पुरानी है। सूर्यग्रहण जैसे अवसरों पर शरीर के रोगों से मुक्ति पाने के लिये यजमान पुरोहितों को अपने वजन के बराबर, अन्न, वस्त्र, सोना चांदी और अन्य आवश्यक वस्तुओं को तोल कर दान करता है। हालांकि एक समय में कुरुक्षेत्र में राजा महाराजा रानी दान भी करते थे लेकिन वो परंपरा बाद में बंद हो गई, दरअसल राजा महाराजा पहले अपनी रानी को ऐसे अवसरों पर अपने पुरोहितों को दान कर देते थे और उसके बाद रानी महारानी के वजन के बराबर सोने, चांदी, हीरे और जेवरात देकर उसे वापस लेते थे, मगर रानीदान की परंपरा यहां राजशाही का दौर खत्म होने से पहले ही खत्म हो गई थी।
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