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राष्ट्रपति अवार्ड विजेता शिव सिंह नहीं रहे, एक नजर उपलब्धियों पर

Fri, 26 Jun 2015 01:43 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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होशियारपुर में एक छोटे से गांव में जन्मे और वहां की मिट्टी से खेलने वाले शिव सिंह को आज पूरी दुनिया में कौन नहीं जानता। आज वो हमारे बीच नहीं रहे। पंचकूला में उनका निधन हो गया। देखिए, उनके जीवन सफर पर एक नजर।
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शिव सिंह में बचपन से ही चिकनी मिट्टी और सरकंडों के साथ खेलते हुए कुछ नया करने की सोच थी जिसे स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने पर मिट्टी से खिलौने बनाने का काम शुरू कर दिया था। स्कूल की पढ़ाई होशियारपुर में करने पर जब पिता उसे मार्किट में काम करने के लिए भेजते थे तो वे वहां लकड़ी और लोहे  का काम करने वाले लोगों को बड़े ध्यान से देखते थे और उन्हीं के अनुसार घर मे आकर काम करने का प्रयास करते थे।
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स्कूल की पढ़ाई के करने के बाद कालेज में सबसे पीछे लाइन मे बैठते थे और सोचते थे कि पढ़ाई करने का क्या लाभ  होगा क्यों  न कुछ अलग किया जाए। इस  पर शिमला में स्कूल आफ आर्ट में चले गये और वहां पांच साल मूर्तिकला के बारे में प्रशिक्षण लिया। शिमला आज भी उक्त संस्थान के बाहर उनके द्वारा वर्ष 1958 में पेड़ के नीचे बनाए महात्मा बुद्ध का बुत है। चंडीगढ़ के कालेज आफ आर्ट में शिवालिक की खड्ड से लाए पत्थरों को तराश कर वहां लगाया गया था।

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शिव सिंह कहते थे कि वह मूर्तिकला के साथ पेंटिंग भी करते हैं।  उन्होंने जो सोचा उसे साकार भी किया। कबाड़ की चीजों से भी कई जानकारों की आकृतियां बनाई। मिट्टी, क्ले, कापर ब्रास, पत्थर, लकड़ी आदि पर कलाकृतियां बनाई, जिसे देशविदेश में आज संग्रहालयों के साथ बड़े बड़े संस्थानों के प्रवेश द्वार पर लगाया गया है। चंडीगढ़ में कई प्रकार की कृतियां बनाई हैं जिन्हें आज भी देखा जा सकता है।
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शिव सिंह को पंजाब सरकार ने 4 बार उनकी कलाकृतियों के लिए सम्मानित किया। 1984 में राष्ट्रपति अवार्ड व 1979 में नेशनल अवार्ड से सम्मानित हुए। शिव सिंह को 1968 में पश्चिमी जर्मनी में स्कॉलरशिप मिली। 1965 से वह देश-विदेश में लगातार अनेक एकल प्रदर्शनियां लगा चुके हैं। विदेशों में भी यूएसए, जर्मनी, फ्रांस, सिवजटरजरलैंड, डेनमार्क, कनाडा, श्रीलंका, सिंगापुर, स्काटलेंड, इंग्लेंड हालैंड आदि में इनकी बनाई पेंटिंग प्रदर्शित हैं।
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शिव सिंह कहते थे कि छात्रों को कला के हर क्षेत्र को गंभीरता से समझने की जरूरत है। कला के माध्यम से कोई भी कलाकार अपनी बात को बयां कर सकता है। कलाकार वह होता है जो प्रकृति, जीवन के पहलुओं एवं जानवरों के भावों को देखकर उसे मूर्ति के रूप में ऐसे उकेरे की देखना वाला उसमें डूब जाए।
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