पद्मश्री नेकचंद भले आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वे एक ऐसे कलाकार थे, जिनकी बनाई दुनिया को देखने वाला बस देखता रह गया। जानिए इसे बनाने का सच।
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'रॉक लेजेंड' नेकचंद
कौन कहता है आसमां में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों। लगभग 40 साल पहले ऐसा ही प्रयास किया था नेक चंद सैनी ने। उनका यह प्रयास आज चंडीगढ़ की एक विशिष्ट पहचान बन चुका है और दुनिया इसे रॉक गार्डन के नाम से जानती है। नेक चंद वो शख्स हैं, जिन्होंने मन में एक काम करने की ठानी, तो उसे पूरा करने के लिए अपनी सारी ताकत झोक दी।
उनकी इच्छा शक्ति साकार हुई तो सरकार ने इसे नाम दिया रॉक गार्डन। वहीं नेकचंद ने खुदा बताया कि उन्होंने रॉक गार्डन क्यों बनाया। नौकरी के दौरान ही नेकचंद को इस काम का आइडिया आया। वे अक्सर ऐसी जगह जाते थे, जहां बेकार सामान को फेंक दिया जाता था। उस सामान को देखकर ही उन्हें बेकार चीजों से कुछ बनाने का विचार आया और वे उसे पूरा करने में जुट गए।
शुरुआत थोड़ी कठिन थी, लेकिन एक बार काम शुरू किया, तो फिर रुके नहीं। वे साइकिल से जगह-जगह जाते और बेकार सामान जुटाते। दिन में कई-कई घंटे वे सामान ही ढोते रहते थे, लेकिन जुनून इतना था कि कभी भी थकान को अपने पर हावी नहीं होने दिया। आज भी यहां आकर उनके मन को सुकून मिलता है। नेकचंद की बेटी परिवार के साथ इंग्लैंड में रहती है। वहीं बेटा अनुज चंडीगढ़ में है।
रॉक गार्डन के निर्माण के लिए 1984 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। नेकचंद ने रॉक गार्डन का निर्माण एक छोटी-सी कुटिया से किया था। गार्डन के फेज-2 में 40 साल पुराना वो ट्रक भी खड़ा है, जिसमें नेकचंद कबाड़ ढूढंने के लिए जाते थे। रॉक गार्डन का निर्माण तीन चरणों में हुआ। पहले चरण में वह काम पूरा हुआ, जो सैनी ने दुनिया की नजरों से बचकर किया था।
दूसरे चरण का काम 1983 में समाप्त हुआ, जिसमें इस गार्डन में एक झरना, एक चैक, एक छोटा सा थियेटर, बगीचा, पथ व प्रांगण बनाये गए। इसके अलावा, वहां लगभग 5,000 छोटी-बड़ी कलाकृतियां रखी गईं जो कंक्रीट पर मिट्टी का लेप चढ़ाकर बनाई गईं थीं। तीसरे चरण में वहां कई बड़े निर्माण हुए, जिनमें मेहराबों की एक श्रृंखला शामिल थी। इन मेहराबों से झूले लटकाए गए।
इसके अलावा, मूर्तियों के प्रदर्शन के लिए एक मंडप, एक मछलीघर और खुले आसमान के नीचे एक थियेटर भी बनाया गया। सैनी ने 1993 और 1995 के बीच केरल के पलक्कड़ जिले में डेढ़ एकड़ का एक छोटा रॉक गार्डन भी बनाया। 1956 में शहर से कबाड़ लाकर नेक चंद ने जंगल में अकेले ही निर्माण शुरू कर दिया। अधिकारियों को इसके बारे में 1975 में भनक लगी।
रॉक गार्डन का सफर एक नजरः 1956- रॉक गार्डन का निर्माण शुरू। 24.01.1976- पब्लिक के लिए खोला। 1965 : पहला फेज बना। 1983 : दूसरा फेज बना। 1997 में नेकचंद फाउंडेशन की स्थापना। 2003 : तीसरा फेज बना, 40 एकड़ में फैला है रॉक गार्डन, 5000 सैलानी रोज आते हैं घूमने, 1 करोड़ 20 लाख सैलानी देख चुके हैं, इसके लिए 1984 में नेकचंद को मिला था पद्मश्री