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हरियाणा में राहुल-प्रियंका की आंधी ध्वस्त, कांग्रेस का 'सूर्यास्त', करारी हार के पीछे 5 बड़े कारण

Fri, 24 May 2019 04:01 PM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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Rahul gandhi, Priyanka gandhi
हरियाणा में राहुल और प्रियंका कोई कमाल नहीं कर पाए। कांग्रेस का सूपड़ा ऐसे साफ हुआ मानो सूर्यास्त हो गया है। जानिए प्रदेश में पार्टी की करारी शिकस्त के पीछे के बड़े कारण।
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Bhupinder Hooda - फोटो : pti
परिवारवाद, अंतर्कलह और संगठन की कमजोरी हरियाणा में एक बार फिर कांग्रेस को ले डूबी। भाजपा की ओर से उतारे गए एक भी प्रत्याशी को कांग्रेस परास्त नहीं कर सकी। यहां तक की जिन प्रत्याशियों पर भाजपा खुद पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी, वे भी इस चुनावी समर में कांग्रेस से आगे निकल गए। अंबाला संसदीय क्षेत्र से रतनलाल कटारिया का लाख विरोध होने के बावजूद कुमारी सैलजा अंबाला से सीट नहीं निकाल सकीं। हुड्डा पिता- पुत्र अपनी सीटें नहीं निकाल सके।

 
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अशोक तंवर - फोटो : अमर उजाला
भिवानी से श्रुति चौधरी अपनी सीट नहीं निकाल सकीं। यहां से भाजपा सांसद धर्मबीर को जनता ने दोबारा चुना। वह भी तब जब धर्मबीर यह बयान दे चुके थे कि उनकी लोकसभा चुनाव लड़ने की मंशा नहीं है। वे अब विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। कांग्रेस की इस कमजोरी की सबसे बड़ी वजह पार्टी की आंतरिक कलह रही। हरियाणा में पूरे पांच साल कांग्रेस दो धड़ों में बंटी रही। हुड्डा खेमा अपने समर्थक विधायकों को लेकर तंवर का विरोध करता रहा और डॉ. अशोक तंवर हुड्डा का विरोध करते रहे। आलाकमान के लाख हस्तक्षेप के बाद भी हालात नहीं सुधरे। केंद्रीय नेताओं ने दखल किया लेकिन अंदरूनी जंग बरकरार रही।

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भूपिंदर सिंह हुड्डा - फोटो : अमर उजाला
बूथ स्तर पर पार्टी संगठन कमजोर रहा
नतीजा यह निकला कि हरियाणा में कांग्रेस का संगठन नहीं खड़ा हो पाया। पार्टी ने राजनीतिक रैलियों में भीड़ तो इकट्ठा कर ली, लेकिन बूथ स्तर पर मतदाताओं को लेकर जाने वाला संगठन कमजोर रहा। पांच साल में पार्टी हरियाणा में जिला अध्यक्ष और ब्लॉक प्रधान नहीं बना सकी।

वंशवाद को भाजपा ने बताया कारण
वंशवाद के आरोप झेल रही कांग्रेस पर सीएम मनोहर लाल ने करारी चोट की है। उन्होंने कहा कि इस चुनाव में हमने वंशवाद का खात्मा कर दिया। यहां वंशवाद से उनका मतलब उन नेताओं से था जिन्हें परिवार के चलते टिकट मिलती आ रही है। कांग्रेस के श्रुति चौधरी और दीपेंद्र हुडडा जैसे नेताओं पर सीएम ने सीधा निशाना साधा।
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भूपिंदर सिंह हुड्डा
अब आंतरिक कलह तेज होने के आसार
हुड्डा को पूरा भरोसा था कि वे हरियाणा में अधिक से अधिक सीटें जीत कर आलाकमान के सामने विधानसभा चुनाव की कमान हासिल करने के लिए ताल ठोकेंगे, लेकिन इस शिकस्त के बाद हरियाणा के राजनतिक हालात पर उन्हें चिंतन करने के लिए विवश होना पड़ेगा। हार के तुरंत बाद चिंतन के बजाए कांग्रेस में आंतरिक कलह तेज होने के आसार हैं। प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर ने टिकटों के बंटवारे को लेकर फिर सवाल खड़ा कर दिया है। अब यह मामला आलाकमान के दरबार में पहुंचेगा। विधानसभा चुनाव में पहले कांग्रेस ने हरियाणा में अपनी पार्टी के भीतर की आंतरिक कलह को शांत नहीं किया तो विधानसभा में हालात और खराब हो सकते हैं। विधानसभा चुनाव तक सूबे में संगठन को खड़ा करना भी कांग्रेस के लिए चुनौती है।
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भूपिंदर सिंह हुड्डा
20 साल बाद फिर कांग्रेस का सूपड़ा साफ
हरियाणा कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव किसी सबक से कम नहीं हैं। 20 साल बाद फिर इतिहास ने खुद को दोहराया है। 1999 में भी कांग्रेस प्रदेश में एक सीट नहीं जीत पाई थी। भाजपा-इनेलो ने मिलकर यह चुनाव लड़ा था और कांग्रेस चारों खाने चित हो गई थी। इस बार भाजपा ने अपने बूते ही कांग्रेस को हरियाणा में जमीन सुंघा दी। 1999 के चुनाव में पांच सीटों पर भाजपा व पांच पर इनेलो लड़ी थी।
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भूपिंदर सिंह हुड्डा - फोटो : अमर उजाला
अंबाला सुरक्षित सीट से भाजपा के रतन लाल कटारिया, कुरुक्षेत्र से इनेलो की कैलाशो सैनी, करनाल से भाजपा के आईडी स्वामी, सोनीपत से भाजपा के किशन सिंह सांगवान, रोहतक से इनेलो के इंद्र सिंह, फरीदाबाद से भाजपा के रामचंद्र बैंदा, महेंद्रगढ़ से भाजपा की सुधा यादव, भिवानी से इनेलो के अजय चौटाला, हिसार से इनेलो के सुरेंद्र बरवाला और सिरसा सुरक्षित से इनेलो के डॉ. सुशील इंदौरा जीते थे। इस बार भाजपा ने अकेले चुनाव लड़कर कांग्रेस दिग्गजों को मात दी और दो दशक बाद पूरी तरह सूपड़ा साफ कर दिया। 1984 में हरियाणा में भाजपा ने पहला लोकसभा चुनाव कमल निशान पर लड़ा था। उसके बाद यह पहला मौका जब भाजपा ने अकेले दस की दस लोकसभा सीटें जीती हैं।
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भूपिंदर सिंह हुड्डा - फोटो : Amar ujala
प्रदेश में भाजपा ने कांग्रेस की जमीन बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में ही हिला दी थी। कांग्रेस 2014 में मात्र रोहतक सीट ही जीत पाई थी, जबकि विधानसभा चुनाव ठीक इसके बाद हुए, जिनमें कांग्रेस को मात्र 15 सीटें मिली थीं। दस साल सत्ता में रही कांग्रेस से मुख्य विपक्षी दल का तमगा भी छिन गया था और पार्टी तीसरे स्थान पर खिसक गई थी। बावजूद हरियाणा कांग्रेस के नेताओं ने कोई सबक नहीं सीखा और गुटबाजी में उलझे रहे। गुटबाजी के चलते ही जींद उपचुनाव हारा और अब लोकसभा में चारों खाने चित हो गए। प्रदेश में इसी साल अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। अगर कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश कांग्रेस के नेताओं पर लगाम नहीं कसी तो फिर निराशा हाथ लग सकती है।
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