टूटी चूड़ियां, फ्यूज ट्यूबलाइट्स और कंकड़-पत्थर...यह चीजें क्या जगह रखती हैं जिंदगी में? इसका जवाब है रॉक गार्डन।
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जानिए, कैसे बनी रॉक गार्डन की अनोखी कलाकृतियां?
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ज्यादातर लोग इस सवाल का जवाब देंगे कि इस कबाड़ की भला जिंदगी में क्या जगह। ...लेकिन एक शख्स ने इसी कबाड़ से खुशियां बीन लीं।
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सिर्फ अपने लिए नहीं, लाखों लोगों के लिए। बस, इसी की बदौलत यह शख्स आज शख्सियत बन चुका है। नाम है नेकचंद सैनी। वही नेकचंद सैनी, जिन्होंने रॉक गार्डन का निर्माण कर चंडीगढ़ को एक अलग पहचान दी।
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एक अलग तरह की दुनिया बसाने के लिए पद्मश्री नेकचंद अकेले ही सफर पर निकले थे। जुनून ही था कि वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने कंकड़-पत्थर, टूटी चूड़ियों आदि से एक यादगार जगह तैयार कर दी।
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आज रॉक गार्डन अहसास करवाता है कि कोई भी सामान बेकार नहीं होता, बस उसे इस्तेमाल करने की परख और नजर होनी चाहिए।
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रॉक गार्डन का नाम प्रशासन ने इसमें बड़े और अद्भुत तरह से सजाए गए पत्थरों के कारण ही रखा था। इन पत्थरों को नेकचंद शिवालिक की पहाड़ियों से लाए थे।
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रॉक गार्डन के निर्माण के दौरान नेकचंद के मन में ख्याल आया कि क्यों न कंकड़-पत्थरों का भी इस्तेमाल किया जाए। उन्होंने नदियों का रुख किया।
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छोटे-छोटे सफेद पत्थरों के अलावा अन्य तरह के कंकड़ जमा किए। नदियों से पत्थर जमा कर वे साइकिल से इन्हें ढोते थे। बाद में इन्हें सीमेंट की मदद से दीवारों पर शानदार तरीके से सजाया।
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रॉक गार्डन के कई हिस्सों में पुराने और बेकार हो चुके बल्ब के होल्डरों से दीवारें सजाई गई हैं। एक बारगी इन्हें देखने से लगता ही नहीं कि बेकार होने पर फेंक दिए जाने वाले सामान से ऐसी अद्भुत कलाकारी भी की जा सकती है।
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नेकचंद को कई जगह टूटी चूड़ियां भी मिलीं। इससे उन्हें आइडिया आया कि क्यों न वे इनका भी इस्तेमाल करें। उन्होंने चूड़ियों से स्टेच्यू बनाईं। इसे उन्होंने स्टेच्यू के रंग-बिरंगे कपड़ों के तौर पर इस्तेमाल किया। यहां मटकों को भी अनोखे अंदाज में पेश किया गया है।
यहां एक आर्टिफिशियल झरना भी है। इसके आसपास की जगह बहुत सलीके से बनाई गई है। इसमें बड़े पत्थरों की दीवारों के अलावा पानी के कुंड बनाए गए हैं। यहां पहुंचकर सुकून मिलता है।