सिर पर गठरी, गोद में मासूम। न सिर पर छत न खाने को दाना। चिलचिलाती धूप, तवे की तरह तपती सड़कें... पर जख्मों को भूलकर घर लौटने को मजबूर हैं प्रवासी मजदूर। तस्वीरों में देखिए सिसकती जिंदगी, बेबसी का सफर और दुश्वारियों की डगर, आपकी आंखें भर आएंगी देखकर।
विज्ञापन
2 of 10
जेब में पैसे नहीं, इसलिए रस्सी से बांधा मास्क
- फोटो : अमर उजाला
कोरोना महामारी से तो क्या निपटेंगे, देश पहले पलायन और भूखमरी से निपट ले तो भला हो। पंजाब और हरियाणा से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में अपने घरों के लिए निकले मजदूरों के दुख दर्द को साझा किया अमर उजाला ने।
विज्ञापन
3 of 10
तपती गर्मी, पैदल चलना...भूख-प्यास तो लगेगी ही
- फोटो : अमर उजाला
42 डिग्री सेल्सियस का तापमान, कभी खाने को मिल जाता तो कभी नहीं। न मौत का डर न पुलिस की लाठियों की फिक्र, चिंता है तो सिर्फ घर पहुंचने की। क्योंकि आर्थिक रूप से खोने को कुछ बचा नहीं। जो था, वो लॉकडाउन के दौरान बिक गया।
4 of 10
जहां जगह मिली वहीं सो गए बच्चे...
- फोटो : अमर उजाला
बच्चों की भूख ने हिम्मत तोड़ दी, इसलिए घर जाने के लिए निकले। जैसे भी हो बस घर पहुंचना है। कोरोना के रूप में आई महामारी ने ऐसे जख्म दे दिए, जिन्हें भरने में बरसों लग जाएंगे। जिन सड़कों पर कभी गाड़ियां दौड़ती थीं, उन पर जिंदगी नंगे पांव चल रही है।
विज्ञापन
5 of 10
चल-चलकर थक गए तो सामान के ढेर पर ही सो गया
- फोटो : अमर उजाला
अब लोग लौट रहे हैं उसी डगर की ओर, जिसे वे रोजी रोटी के चक्कर में छोड़ आए थे। बेबसी के किस्से ऐसे हैं, सुनकर कलेजा कांप जाए। घर जाने को निकल तो गए हैं, लेकिन सुरक्षित अपनों तक पहुंचने की चिंता अलग से है। किसी की मां इंतजार कर रही तो किसी की पत्नी।
विज्ञापन
6 of 10
बच्चे थक गए हैं...ये सोचकर मां सड़क किनारे बैठ गई
- फोटो : अमर उजाला
हालात ऐसे हो गए है कि अब सरकारी तंत्र से भी इनका भरोसा उठ गया है। दावे चाहे कितने किए जाएं, लेकिन हकीकत यही है कि देश में मजदूरों की जिंदगी सिसक रही है। लोगों को अब थोड़े में गुजारा करना मंजूर है, लेकिन परदेस में मरना नहीं।
विज्ञापन
7 of 10
क्या करती मुझे नींद ही इतनी आ रही थी...
- फोटो : अमर उजाला
हे ईश्वर! हमारा हौसला बनाए रखना। हमको हर हाल में घर पहुंचना है। जैसे-तैसे दूसरों लोगों की मदद से कुछ दिन तो कट गए, लेकिन जब मदद मिलनी भी बंद हो गई तो पैदल ही घर के लिए चलने का निर्णय कर लिया। सफर अच्छा रहे, ईश्वर से बस यही कामना है।
8 of 10
जानते हैं कि जोखिम है, पर क्या करें जल्दी घर तो पहुंच जाएंगे
- फोटो : अमर उजाला
रास्ते में लोग मदद करेंगे, उम्मीद नहीं थी, लेकिन लोग अच्छे निकले। रास्ते में कई लोगों ने खाना-पानी और ग्लूकोज आदि मजदूरों को दिया। इसके सहारे वह अब आगे का सफर तय करेंगे। खाना-पानी देने वालों से मजदूर बस यही कहते दिखे कि दुआ करना, हमारा सफर सुरक्षित हो।
9 of 10
चप्पल टूट गई है, उसमें पैर थक जाते हैं...नंगे पांव ही चलना पड़ेगा
- फोटो : अमर उजाला
मजदूर कहते हैं कि कोरोना ने हमें यह तो बता दिया कि घर के दो रुपये ही अच्छे। अब घर पर रहकर ही मेहनत मजदूरी करके अपना परिवार चलाएंगे। यहां लौटकर कभी नहीं आएंगे। लोगों को भी यह समझाएंगे कि घर में ही रहकर काम धंधा ढूंढो, बाहर जाने की कोई जरूरत नहीं है।
घर को निकला तो हूं, कब तक पहुंच पाऊंगा, देखते हैं
- फोटो : अमर उजाला
बस घर सुरक्षित पहुंच जाएं। इसके लिए ईश्वर से लगातार दुआ कर रहे हैं, सब कुछ अच्छा ही होगा। इस आपातकाल में हम बेसहारा बेरोजगारों की मदद के लिए सरकारों को आगे आना चाहिए था, लेकिन सरकारों के बजाय लोग नि:स्वार्थ भाव से मदद कर रहे हैं।