सुखना लेक पर बतखों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा। 5वें दिन भी एक बतख ने दम तोड़ा, लेकिन साथ में एक कौवे की भी मौत हो गई।
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देखिए, सुखना पर डबल ट्रेजडी, रूह कांप जाएगी
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दो बतखों को बीमार हालात में झील से बाहर निकाला गया है। बाद में उन्हें पीपुल्स फॉर एनिमल को सौंप दिया गया।
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फिलहाल एनिमल हसबेंडरी बतख और कौवे की मौत के बीच किसी तरह के संबंध से इनकार कर रहा है। उनका कहना है कि यदि कुछ और पक्षियों या माइग्रेंट बर्ड्स की मौत होती है, तभी कुछ कहा जा सकता है। अब तक कुल 17 बतखों की मौत हो चुकी है।
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एनिमल हसबेंडरी विभाग के कर्मचारियों ने शनिवार को सुखना लेक का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने यह जांचने की कोशिश की कि कहीं और बतखें तो नहीं मरीं।
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उन्हें डर है कि बतखों के साथ हो रही ट्रेजडी कहीं माइग्रेंट बर्ड्स के साथ न हो जाए। हालांकि, अभी तक माइग्रेंट बतखों के साथ किसी अनहोनी की खबर नहीं आई है।
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वाइल्ड लाइफ के कर्मचारी भी शनिवार को अपने अभियान में जुटे रहे। वे बारिश के बीच बतखों की हालात पर लगातार नजर रख रहे हैं।
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एनिमल हसबेंडरी के अधिकारियों ने बताया कि वे हर 15 दिन में बतखों का ब्लड सैंपल लेते हैं, ताकि उनमें होने वाले किसी संक्रमण का समय से पता चल जाए।
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मरी बतखों में भी फिलहाल किसी तरह का वायरस नहीं मिला है। इससे विभाग ने राहत की सांस ली है। उन्होंने बताया कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया की गाइडलाइंस हैं कि सभी बतखों का हर 15 दिन में ब्लड सैंपल लेने है और उसकी जांच भी करनी है।
पर्यावरणविद् विक्रमजीत ने कहना है कि सुखना लेक पर लोग आते रहेंगे और बतखों को कुछ न कुछ खिलाते रहेंगे। पिछले कुछ सालों में मरी बतखों की मौत की वजह अनहेल्दी फूड ही सामने आई थी। प्रशासन को चाहिए कि वे लेक पर खाने-पीने के स्टॉल की तरह बतखों के फूड का भी एक स्टॉल लगाए। जो लोग बतखों को खिलाना चाहते हैं, वे वहां से खरीद कर खिला सकें।