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यकीन मानिए, ऐसे तो यहां ‘क्रैश’ हो जाएंगे रेगिस्तानी जहाज

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रेगिस्तान का जहाज कहलाने वाला ऊंट मैदानी इलाकों में ‘क्रैश’ होने के कगार पर पहुंच गया है। वहां इसके जीवन पर खतरा है। ऐसा हम नहीं, नेशनल रिसर्च सेंटर के आंकड़े बताते हैं। तस्वीरों में देखिए, पूरी रिसर्च। -रिपोर्ट: सुरजीत सत्ती।
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रेगिस्तान का जहाज कहलाते ऊंट के लिए राजस्थान और गुजरात लक्ष्मण रेखा की तरह हैं। इसे पार करते ही उनके लिए खतरा शुरू हो जाता है। शहर के पर्यटन स्थलों पर जो सजे हुए ऊंठ आपको सवारी कराते हैं, वे यहां खतरे में हैं। कारण, रेगिस्तान के अलावा अन्य इलाकों का पर्यावरण ऊंट के अनुकूल नहीं है।
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ऐसे इलाकों में एक ओर उमस के कारण ऊंट सांस की बीमारी का शिकार हो जाते हैं तो दूसरी ओर उन्हें ऐसी वनस्पति भी नहीं मिल पाती जो उनका मुख्य अहार है। इन तथ्यों के मद्देनजर इसी साल फरवरी में नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल ने हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल और ओडिशा में कैमल हसबैंडरी को घाटे का सौदा बताते हुए इसे बंद करने को कहा है।

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सेंटर का मानना है कि इन राज्यों की ओर ध्यान देने के बजाय राजस्थान और गुजरात के हिस्सों में पहले से मौजूद वनस्पति स्त्रोतों की मजबूत करने की जरूरत है। हरियाणा का पर्यावरण ऊंट के अनुकूल नहीं है, पीपल फॉर एनिमल हॉस्पिटल कम शेल्टर फॉर लार्ज एंड स्माल एनिमल्स की ओर से प्रस्तुत की गई ऊंटों की मेडिकल रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है।
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राजस्थान से उत्तर प्रदेश के लिए कथित तस्करी कर ले जाए जा रहे ऊंट हरियाणा के रेवाड़ी में पकड़े गए और आठ नवंबर 2014 को आई मेडिकल रिपोर्ट में सामने आया वह सांस की बीमारी (निमोनिया), मानसिक तनाव, कुपोषण, डायरिया और डिहाइड्रेशन से ग्रस्त थे। जिन हालात में उन्हें बांध कर लाया जा रहा था, उसके चलते ऊंटों के मुंह सेे खून निकल रहा था, जबड़े हिले हुए थे और पैरों में घाव थे।
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उधर, कर्नाटक वेटरनरी एनिमल्स एंड फिशरी साइंसेज़ यूनिवर्सिटी घोषित कर चुकी है कि ऊंट केवल रेगिस्तान पर्यावरण में रह सकता है। उनके पांव पक्की सड़कों के लिए नहीं है। पक्की सड़कों पर चलने के कारण पैरों में घाव तो आते ही हैं, बल्कि जिन दूसरे क्षेत्रों में मौसम अस्थिर रहता है, वहां ऊंट उमस और तापमान से निमोनिया जैसी कई बीमारियों का शिकार होकर मर भी सकता है।
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यूनिवर्सिटी ने सिफारिश की कि ऐसे में ऊंट को उनके अनुकूल पर्यावरण वाले क्षेत्रों में ही आजादी से घूमने देना चाहिए, जो कि राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्से हैं। झाड़ियां और खास पौधे ऊंट का आहार हैं, जो केवल राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों में होते हैं। ऊंट रेगिस्तान यानी नरम धरती पर ही आसानी से चल सकता है।

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ऊंटों की तस्करी और गैरकानूनी हत्या की रोकथाम और तस्करी के दौरान पकड़े गए ऊंटों को वापस राजस्थान व गुजरात पहुंचाने की मांग को लेकर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। यह याचिका देहरादून की गौरी मौलेखी ने की। गौरी ने हरियाणा में ऊंट तस्करी पकड़वाई थी। हाईकोर्ट ने सरकार व एनिमल वेलफेयर बोर्ड को नोटिस जारी करके जवाब मांग रखा है। मामला विचाराधीन है।

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याचिका में हवाला दिया गया है कि हरियाणा के विभिन्न हिस्सों में ऊंटों की गैरकानूनी ढुलाई पकड़ी जा चुकी है। तस्करी कर लाए गए ऊंटों की हालत खस्ता थी और कुछेक की मौत भी हो गई। आरोप है कि ऊंटों को बागपत के बूचडखानों में पहुंचाया जाता है और पश्चिमी बंगाल को भी ऊंटों की तस्करी की जाती है। यहां से ऊंटों का मांस खाड़ी देशों में भेजा जाता है और खाल जूता फैक्ट्रियों को सप्लाई होती है।

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याचिका में यह भी जिक्र है कि फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया मानती है कि ऊंट मानवीय खपत लायक मीट वर्ग में नहीं आते और भारत में किसी भी लाइसेंसशुदा बूचड़खाने में ऊंट को नहीं काटा जा सकता। यह हवाला भी दिया कि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिमी बंगाल और उड़ीसा में ऊंटों के रहने के अनुकूल वातावरण नहीं है।

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ऊंटों की तस्करी रोकने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट में दायर एक याचिका पर छह जनवरी 2009 को आए एक फैसले में कर्नाटक में ऊंट की एंट्री पर पाबंदी लगाई गई थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि ऊंट राजस्थान में रहने का आदी है और कर्नाटक का पर्यावरण उसके अनुकूल नहीं है। डिप्टी डायरेक्टर एनिमल हसबैंडरी ने 31 मई 2006 को सभी राज्यों को सुर्कलर जारी किया था कि ऊंट राजस्थान, गुजरात के हिस्सों में ही चल सकता है, कर्नाटक में ऊंटों को लाना सर्कुलर का उल्लंघन है।

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पिछले पांच सालों में मेवाड़ी ऊंटों की संख्या 18221 थी जो कि पिछली गणना से 28 प्रतिशत कम है। वहीं जैसलमेरी ऊंटों की संख्या 1,18,083 रह गई है। इनमें पिछले पांच सालों में 31 प्रतिशत की कमी हुई है। उधर, राजस्थान में लोकहित पशुपालक संस्था की वेबसाइट पर मौजूद डाटा के मुताबिक वर्तमान में राजस्थान में दो लाख से भी कम ऊंट हैं जबकि 1990 में भारत में यह संख्या 10 लाख थी।
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उधर, गुरुवार सुबह सिधौली क्षेत्र के देवीपुर के पास नहर में एक लाश उतराती मिली तो हड़कंप मच गया। मनीष के घरवाले भी पहुंच गए। परिवारीजनों ने शव की शिनाख्त मनीष के रूप में की।
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