23 साल की एयरहोस्टेस जिसके कई सपने थे, लेकिन सैकड़ों लोगों के लिए वो मौत से भी नहीं भागी। न सपनों को जीने के लिए उसकी किस्मत ने साथ नहीं दिया। नीरजा की ज़िंदगी का अनकहा सच ये भी है।
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नीरजा के पिता हरीश भनोट के मुताबिक, मार्च 1985 में नीरजा ने एक बिजनेसमैन से अरेंज मैरिज की। शादी के पहले बात हो गई थी कि इसमें दहेज नहीं दिया जाएगा। लेकिन बाद में उन्हें इसके लिए ताने मिलने लगे। ससुराल वाले कहते थे कि एक गरीब आदमी भी अपनी बेटी के लिए कुछ देता है।
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शादी के बाद नीरजा पति के साथ गल्फ चली गईं। लेकिन दो महीने में ही रिश्ते में खटास आ गई। वहां उन्हें खाने और पैसों की तंगी से जूझना पड़ा, जिस वजह से दो महीने में उनका 5 किलो वजन कम हो गया। इतना ही नहीं, नीरजा को फोन करने के लिए भी पति से पैसे मांगने पड़ते थे।
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नीरजा भनोट ने 1968 में हाई जैक हुए प्लेन से 360 यात्रियों की जान बचाई थी। इस साहसी कार्य के बाद वे दुनिया में 'द हिरोईन ऑफ द हाई जैक' के नाम से जानी जाने लगीं। उनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वह फ्लाइट अटेंडेंट से पहले एक सक्सेसफुल मॉडल थीं। उन्हाेंने कई TV और प्रिंट ऐड भी किए थे।
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1985 में नीरजा की शादी हुई, लेकिन दहेज के दबाव के कारण उनके रिश्तों में खटास आ गई। वे शादी के दो महीने बाद ही मुम्बई लौट आई थीं।
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1986 में मॉडल के रूप में उन्होंने कई TV और प्रिंट ऐड करना शुरू कर दिए थे। उन्होंने बिनाका टूथपेस्ट, गोदरेज आदि के लिए एड किए।
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विज्ञापन में काम करने के बाद नीरजा ने Pan American World Airways में Flight Attendant की जॉब के लिए आवेदन किया और उनका चयन हो गया ।
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Pan Am एयरलाइंस ज्वाइन करने के बाद नीरजा इस बात की ट्रेनिंग कर रही थी कि हाई जैक के दौरान क्या करना चाहिए? तब उनकी मां ने कहा था अगर ऐसा कुछ हो तो तुम भाग जाना। नीरजा ने जवाब दिया- मम्मी तुम्हारी जैसी मां होगी तो देश का क्या होगा? मर जाऊंगी लेकिन भागुंगी नहीं।
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नीरजा को बचपन से ही प्लेन में बैठने और आकाश में उड़ने की इच्छा थी। नीरजा का जन्म 7 सितंबर 1964 को चंडीगढ़ में हुआ था। नीरजा के जन्मदिन से ठीक पहले 5 सितंबर 1986 को मुंबई से न्यूयॉर्क जा रही पैन एम फ्लाइट 73 को पाकिस्तान में हाइजैक कर लिया गया। विमान हाइजैक फलस्तीन के अबू निदाल सगंठन के चार आतंकवादियों ने किया था। इस हाइजैक का मकसद विमान को इजरायल डिफेंस मिनिस्ट्री के ऑफिस पर गिराना था। विमान में वक्त 380 यात्री सवार थे।
घटना के 17 घंटे बाद भी जब पाकिस्तानी सरकार से कोई जवाब नहीं मिला तो आतंकियों ने यात्रियों को मारना शुरू कर दिया। उन्होंने एक-एक कर कुल 20 लोगों को मार डाला। तीन मासूम बच्चों की मदद करते समय आतंकवादियों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी। जो उनके पेट, कंधे, गले और हाथ में जाकर लगी। जिससे उनकी मौत हो गई। 5 सितंबर 1986 का दिन उनके लिए इस दुनिया का आखिरी दिन था।