बजट 2026
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सरकारी कर्ज 85% के पार, सस्ते कर्ज की राह अब भी दूर
भारत जैसे उभरते हुए देश के लिए राजकोषीय घाटे और उससे जुड़ी सरकारी उधारी को कम करना बेहद ज़रूरी है। ऊंचा घाटा सीधे तौर पर अधिक उधारी को जन्म देता है, जिससे कर्ज़ बाजार में निजी क्षेत्र के लिए जगह सिमट जाती है और ब्याज दरें ऊपर चली जाती हैं। यही वजह है कि भारतीय उद्योगों को अपने वैश्विक प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले कर्ज पर कम से कम 400 बेसिस पॉइंट अधिक ब्याज चुकाना पड़ता है।
इस स्थिति को सुधारने के लिए केंद्र और राज्यों, दोनों को अपनी उधारी में तेज कटौती करनी होगी। 2025-26 में केंद्र सरकार का कर्ज़ जीडीपी के 55% पर आंका गया है। यदि राज्यों की उधारी को भी जोड़ लिया जाए, तो कुल सरकारी कर्ज़ का अनुपात बढ़कर 85.23% तक पहुंच जाता है। हालांकि केंद्र ने अपने कर्ज़ को घटाने के लिए एक रोडमैप घोषित किया है, लेकिन राज्यों की स्थिति कहीं अधिक चिंताजनक है।
जब तक ब्याज दरें नीचे नहीं आतीं, तब तक घरेलू उद्योग वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं बन पाएगा, खासकर ऐसे समय में जब बाहरी आर्थिक माहौल पहले से ही अस्थिर है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या वित्त मंत्री सरकार की बढ़ती उधारी पर लगाम लगाने के लिए कोई ठोस कदम उठा पाएंगी, या यह बोझ अर्थव्यवस्था और उद्योग दोनों पर यूं ही भारी बना रहेगा।