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बर्फीला कब्रिस्तान: दुनिया के सबसे सर्द इलाके में दफ्न लाशों की हैरान करने वाली कहानी

Wed, 01 Jul 2020 03:34 PM IST
नवनीत राठौर फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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antarctica ice - फोटो : फाइल फोटो
अंटार्कटिका महाद्वीप दुनिया का सबसे सर्द इलाका है। यहां कई बार तापमान माइनस 90 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। बहुत से लोग इसे बर्फीला कब्रिस्तान कहते हैं। आबादी वाली दुनिया के दूसरे छोर पर स्थित ये महाद्वीप कई ऐसे लोगों की कब्र अपने आगोश में समेटे है, जिनके आखिरी दीदार भी उनके परिजनों को नसीब नहीं हुए।

इंसान ने भले ही तकनीक के क्षेत्र में जबरदस्त तरक्की कर ली हो, मगर अंटार्कटिका में कुदरत की भयंकर चुनौतियों के आगे ये प्रगति बौनी साबित होती है। अंटार्कटिका की खोज में निकले अन्वेषक हों या प्रयोग करने गए वैज्ञानिक, यहां आने वाले कई लोग हमेशा के लिए यहीं दफन हो गए। न उनकी लाश मिली, न हड्डियां। वो या तो बर्फ की मोटी परत में दब गए या फिर ऐसी सर्द दरारों में फंस गए, जहां से वो फिर नहीं निकल सके।
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अंटार्कटिका - फोटो : फाइल फोटो
उन्नीसवीं सदी: चिली की हड्डियों का राज
अंटार्कटिका के लिविंग्सटन आइलैंड पर एक इंसानी खोपड़ी और जांघ की हड्डी पिछले 175 वर्षों से समुद्र के किनारे पड़ी है। अंटार्कटिका में मिले ये सबसे पुराने इंसानी कंकाल हैं। चिली के रिसर्चरों ने पाया कि ये एक महिला की हड्डियां हैं जिसकी मौत 21 साल की उम्र में हुई थी। ये युवती चिली की आदिवासी जनजाति से संबंध रखती थी। जहां उसकी हड्डियां मिलीं, वो जगह चिली से करीब एक हजार किलोमीटर दूर है।

हड्डियों के विश्लेषण से पता चलता है कि उसकी मौत वर्ष 1819 से 1825 के बीच हुई होगी। अगर हम ये मानें कि उसकी मौत 1819 में हुई थी, तो वो अंटार्कटिका पहुंचने वाली मानव जाति की पहली सदस्य थी। मगर, ये रहस्य अब भी बना हुआ है कि चिली की वो आदिवासी युवती, एक हजार किलोमीटर लंबा भयंकर समुद्री सफर तय करके वहां कैसे पहुंची? चिली के आदिम निवासियों की पारंपरिक नौकाएं इतनी मजबूत नहीं होती थीं कि भयंकर समुद्री इलाके में इतना लंबा सफर तय कर सकें।
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अंटार्कटिका - फोटो : फाइल फोटो
अंटार्कटिका मामलों के विशेषज्ञ माइकल पियर्सन कहते हैं, "इस बात के कोई सबूत नहीं मिलते कि अंटार्कटिका के दक्षिणी शेटलैंड इलाके तक अमेरिकन इंडियन लोग जाते थे। आप पेड़ की छाल से बनी नाव से इतनी दूर नहीं जा सकते।" चिली के रिसर्चरों ने शुरुआती आकलन ये किया था कि ये महिला उत्तरी गोलार्ध से सील का शिकार करने आने वाले जहाज के नाविकों को रास्ता दिखाने वाली रही होगी क्योंकि अंटार्कटिका के उन द्वीपों की खोज 1819 में बर्तानवी नाविक विलियम स्मिथ ने की थी। लेकिन, उस दौर में महिलाओं के इतना लंबा समुद्री सफर करने की मिसाल नहीं मिलती,अंटार्कटिका के अनजान सफर की तो कतई नहीं।

सील का शिकार करने वाले यूरोपीय नाविकों के चिली के आदिम निवासियों से करीबी संबंध थे। कभी कभार वो एक दूसरे से सील की खाल का लेन देन करते थे। मगर दोनों सभ्यताओं के बीच का ये लेन देन हमेशा दोस्ताना नहीं होता था। अर्जेंटीना की विशेषज्ञ मेलिसा सालेर्नो कहती हैं कि, "कई बार दोनों समुदायों के बीच हिंसक भिड़ंत हो जाती थी। क्योंकि सील के शिकारी किसी एक तट से आदिवासी महिला को अगवा कर लेते थे और फिर उसका बलात्कार करके दूसरे तट पर छोड़ कर भाग जाते थे।"

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अंटार्टिका - फोटो : फाइल फोटो
उस दौर के समुद्री अन्वेषकों की डायरी के अभाव में चिली की इस आदिवासी महिला का अंटार्कटिका पहुंचने का रहस्य अब तक बेपर्दा नहीं हो सका है। लेकिन, इस महिला की हड्डियां अंटार्कटिका के बर्फीले महाद्वीप में इंसानी गतिविधियों की शुरुआत का सबूत हैं। वो इस बात का भी सबूत हैं कि अंटार्कटिका जैसे बेहद दुर्गम इलाके तक पहुंचना कभी भी जानलेवा साबित हो सकता है। अंटार्कटिका पहुंचने वाले कई अन्वेषक और वैज्ञानिक अकाल मौत के शिकार हुए।
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अंटार्कटिका - फोटो : Pixabay
29 मार्च 1912: रॉबर्ट स्कॉट का दक्षिणी ध्रुव पहुंचने का सफर
ब्रिटिश अन्वेषक रॉबर्ट स्कॉट की टीम 17 जनवरी 1912 को दक्षिणी ध्रुव पहुंची थी। वो दक्षिणी ध्रुव पहुंचने वाले पहले इंसान बनने की नीयत से रवाना हुए थे। मगर स्कॉट से पहले नॉर्वे के रोआल्ड एमंडसेन ने दक्षिणी ध्रुव पर विजय पताका फहरा दी थी। वहां से लौटते समय स्कॉट का जहाज एक बर्फीले तूफान में फंस गया। टीम के सभी सदस्यों की अंटार्कटिका के बेहद बुरे मौसम में मौत हो गई।
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अंटार्कटिका - फोटो : Twitter
14 अक्टूबर 1965: जेरेमी बेले. डेविड वाइल्ड और जॉन विल्सन
ये तीनों अमेरिकी वैज्ञानिक पूर्वी अंटार्कटिका में एक रिसर्च स्टेशन से रिसर्च के लिए रवाना हुए थे, मगर उनकी स्लेज एक गहरी खाई में गिर गई। पीछे आ रहे इन तीनों के साथी उन्हें नहीं बचा सके और वो अंटार्कटिका की बर्फिली कब्र में हमेशा के लिए दफ्न हो गए।
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अंटार्कटिका - फोटो : सोशल मीडिया
अगस्त 1982: एम्ब्रोस मोर्गन, केविन ओकलटन, जॉन कोल
ये तीनों व्यक्ति अंटार्कटिका के अपने बेस से पीटरमन द्वीप पर रिसर्च के लिए गए थे। जब वो द्वीप पर पहुंचे, तो समुद्र जमा हुआ था और उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। मगर, उनके द्वीप पर पहुंचते ही तेज तूफान से द्वीप तक आने के रास्ते में जमी बर्फ बह गई। ये तीनों रिसर्चर उसी द्वीप में फंस गए। कुछ दिनों तक तो उनका खाना पीना और वायरलेस चलता रहा। फिर बैटरी चार्ज न होने से वायरलेस ने काम करना बंद कर दिया। खाना खत्म होने के बाद उन्होंने पेंग्विनों को मार कर खाना शुरू कर दिया।

मगर इन्हीं पेंग्विन की बदबू ने इन लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया। अंत में एक दिन समुद्र की सतह पर बर्फ देख कर ये तीनों वहां से अपने बेस कैंप की ओर निकले। मगर, कभी मंजिल तक नहीं पहुंचे। न ही उनकी लाशें मिलीं। माना जाता है कि द्वीप से बेस कैंप तक आने के दौरान ही वो या तो समुद्र में डूब गए। या फिर बर्फीले तूफान में दब गए।
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अंटार्कटिका - फोटो : फाइल फोटो
अंटार्कटिका में अपने साथियों या परिजनों को गंवाने वालों उनके कोई अवशेष नहीं मिलते। ऐसे लोगों की याद में केम्ब्रिज स्थित स्कॉट पोलर रिसर्च इंस्टीट्यूट में एक स्मारक बनाया गया है। ये अधूरा स्मारक है क्योंकि इसका एक हिस्सा अर्जेंटीना के पास स्थित फाकलैंड द्वीप पर बनाया गया है। अंटार्कटिका जाने वाले कई रिसर्चर फाकलैंड से ही अपने पड़ाव की ओर रवाना होते हैं।
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