कई साइन बोर्ड तो ऐसे हैं, जो कई दशकों से लगे हैं। इसके अलावा अक्सर नए बोर्ड भी लगा दिए जाते हैं। पुणे के ये बोर्ड इतने मशहूर हैं कि सोशल मीडिया पर अक्सर सुर्खियां बटोरते हैं। कुछ मजेदार होते हैं, तो कुछ में लंबा-चौड़ा ज्ञान और तंज देखने को मिल जाता है। कई बार तो इन पर बहुत कड़वी बातें भी लिखी दिख जाती हैं। पुणे की पुरानी गलियों में घूमते हुए ऐसे जिन बोर्ड पर मेरी निगाह पड़ी है, उनमे से कुछ तो मुझे बहुत पसंद आए।
जैसे, 'अगर एक बार घंटी बजाने के बाद भी जवाब नहीं मिलता, तो समझिए कि हम आप से नहीं मिलना चाहते। तो निकल लीजिए।' 'घंटी बजाने के बाद इंतजार कीजिए। यहां रहने वाले इंसान हैं, स्पाइडरमैन नहीं।' 'अगर कोई यहां गाड़ी पार्क करता है, तो गाड़ी के टायर पंक्चर कर दिए जाएंगे।' 'हमारे बेटे की शादी की तारीख तय हो गई है, तो अब शादी का कोई नया प्रस्ताव न ले कर आएं।'
सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके डॉक्टर श्रीधर मधुकर दीक्षित कहते हैं कि, 'ये बात शायद 1960 या 1970 के दशक की होगी, जब पत्या लिखे जाने लगे। पुणे के लोग सीधे-सपाट होते हैं। वो पत्या के जरिए ये बताने से नहीं हिचकते कि कैसा बर्ताव करना चाहिए।'