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भारत के इस शहर के लोगों में इतना टशन क्यों, हैरान करने वाला सच नहीं जानते होंगे

Sun, 04 Nov 2018 12:39 PM IST
बीबीसी हिन्दी
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- फोटो : RATHINA SANKARI/BBC
सितंबर का महीना था। बारिशों का मौसम। मैं पुणे के सदाशिव पेठ इलाके की गलियों में घूम रही थी। जब मैं एक मंदिर के पास से गुजरी, तो मेरी नजर एक बोर्ड पर पड़ी। इस पर मराठी में लिखा था, 'ये रहालकर की निजी पार्किंग है। मंदिर आने वाला कोई और शख्स यहां गाड़ी नहीं पार्क कर सकता है।

अगर किसी ने अपनी गाड़ी यहां खड़ी की तो गाड़ी के टायरों की हवा निकाल दी जाएगी और उस पर ताला लगा दिया जाएगा। ताला तभी खुलेगा, जब वो इंसान 500 रुपये जुर्माना भरेगा।' पार्किंग न करने की चेतावनी देने वाला ये मजेदार बोर्ड देख कर मुझे हंसी आ गई। 

असल में एक घंटे पहले ही मैं पुणे के मशहूर रेस्टोरेंट एसपी बिरयानी हाउस गई थी। वहां की स्वादिष्ट बिरयानी खाते हुए मैंने वहां लगा एक बोर्ड देखा था। उस पर लिखा था, 'हमारी बिरयानी कभी भी खत्म हो सकती है। कृपया कोई नाराज होकर मैनेजमेंट से बहस न करे।' पुणे शहर के पुराने हिस्से में आप को ऐसे ही तमाम साइन बोर्ड मिल जाएंगे। ऐसे बोर्ड 'पुनेरी पात्या' के नाम से जाने जाते हैं। इन्हें आप कार पार्किंग, रेस्टोरेंट, दुकानों और मकानों पर लगे देख सकते हैं।
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साइन बोर्ड की सोशल मीडिया पर धूम

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- फोटो : RATHINA SANKARI/BBC
कई साइन बोर्ड तो ऐसे हैं, जो कई दशकों से लगे हैं। इसके अलावा अक्सर नए बोर्ड भी लगा दिए जाते हैं। पुणे के ये बोर्ड इतने मशहूर हैं कि सोशल मीडिया पर अक्सर सुर्खियां बटोरते हैं। कुछ मजेदार होते हैं, तो कुछ में लंबा-चौड़ा ज्ञान और तंज देखने को मिल जाता है। कई बार तो इन पर बहुत कड़वी बातें भी लिखी दिख जाती हैं। पुणे की पुरानी गलियों में घूमते हुए ऐसे जिन बोर्ड पर मेरी निगाह पड़ी है, उनमे से कुछ तो मुझे बहुत पसंद आए।

जैसे, 'अगर एक बार घंटी बजाने के बाद भी जवाब नहीं मिलता, तो समझिए कि हम आप से नहीं मिलना चाहते। तो निकल लीजिए।' 'घंटी बजाने के बाद इंतजार कीजिए। यहां रहने वाले इंसान हैं, स्पाइडरमैन नहीं।' 'अगर कोई यहां गाड़ी पार्क करता है, तो गाड़ी के टायर पंक्चर कर दिए जाएंगे।' 'हमारे बेटे की शादी की तारीख तय हो गई है, तो अब शादी का कोई नया प्रस्ताव न ले कर आएं।'

सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके डॉक्टर श्रीधर मधुकर दीक्षित कहते हैं कि, 'ये बात शायद 1960 या 1970 के दशक की होगी, जब पत्या लिखे जाने लगे। पुणे के लोग सीधे-सपाट होते हैं। वो पत्या के जरिए ये बताने से नहीं हिचकते कि कैसा बर्ताव करना चाहिए।'
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पुणेकर सख्तमिजाजी के लिए मशहूर

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- फोटो : social media
मुंबई की तर्ज पर पुणे के बाशिदों को पुणेकर कहा जाता है। वो अपनी सख्तमिजाजी के लिए पूरे इलाके में मशहूर हैं, या यूं कहें कि बदनाम हैं। कई दफे तो उनका बर्ताव बहुत रुखा होता है। पुणे के लोग बहुत कम शब्दों में बात करते हैं। जो भी वो बोलते हैं वो अक्सर सपाट और सख्त लहजे वाली बातें होती हैं। पुणे के लोगों का ये टशन कई फिल्मों जैसे मुंबई-पुणे-मुंबई और टीवी कार्यक्रम जैसे पुनेरी पुनेकर में भी दिखाया गया है।

मूल रूप से नासिक के रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर चेतन चंद्ररात्रे कहते हैं कि 'पुणे के लोगों से दोस्ताना होने के लिए बहुत वक्त देना पड़ता है और कोशिश करनी पड़ती है। पुणे में मेरे रूममेट मेरी मराठी का अक्सर मजाक उड़ाते थे। जब मैं कॉलेज में था तो वो अक्सर मेरी मराठी भाषा में गलतियां ठीक किया करते थे। मुझे उन लोगों का करीबी बनने में कई महीने लग गए थे।'

जब रश्मि जोशी अपने भावी जीवनसाथी से मिलने नासिक से पुणे आईं तो रेस्टोरेंट में मुलाकात के बाद वो उस वक्त हैरान रह गईं, जब उसने उन्हें आधा बिल देने को कहा। रश्मि कहती हैं कि, 'मुझे इसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। मुझे ये लगा था कि पहली मुलाकात में वो मुझे रिझाने की कोशिश करेगा।' किसी भी बाहरी के लिए पुणे के लोगों से घुलना-मिलना एक बड़ी चुनौती होती है।

रूखे स्वभाव का बनता है मजाक

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Ease of living index - फोटो : file photo
पुणे से करीब 150 किलोमीटर दूर स्थित मुंबई के लोगों का पुणे के बाशिंदों से कभी प्यार कभी इनकार का नाता रहा है। मुंबई के लोग अक्सर पुणे के रहने वालों के रूखे स्वभाव का मजाक उड़ाते हैं। इस बारे में एक मशहूर चुटकुला भी है कि, 'अगर आप पुणे में किसी के घर जाएंगे, तो वो आप से पूछेगा कि क्या आप पानी पिएंगे (आम तौर पर हिंदुस्तान में घर आने वाले मेहमान को बिना पूछे ही पानी दिया जाता है। ऐसे में पुणे के लोगों का ये पूछना अशिष्टता माना जाता है।)'

रूखे बर्ताव के क्या हैं कारण?- डॉक्टर दीक्षित इस सपाट और रूखे बर्ताव की वजह पुणे के इतिहास को बताते हैं। वो कहते हैं कि, 'पुणे के लोगों में ये टशन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वजहों से आया है। इसके लिए माहौल जिम्मेदार है।' पुणे शहर एक जमाने में यानी अठारहवीं-उन्नीसवी सदी में पेशवाओं की गद्दी था। यहीं से अंग्रेजों से लोहा लेने वाला मराठा साम्राज्य चलता था।

ये जब अपने उरूज पर था, तो मराठा साम्राज्य पाकिस्तान के पेशावर शहर से ओडिशा और तंजावुर तक फैला हुआ था। सत्ता के केंद्र के रूप में पुणे का दायरा भी उस वक्त खूब बढ़ा। इलाके में इसकी शान बढ़ी। पहले पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट्ट चितपावन ब्राह्मण थे। भारत के समाज में ब्राह्मण सबसे ऊंची पायदान पर माने जाते हैं।
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ब्राह्मणवादी संस्कृति का चलन

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- फोटो : NewsBugz
बालाजी के पुणे में ठिकाना बनाने से कोंकण से बहुत से चितपावन ब्राह्मण बेहतर जिंदगी की तलाश में पुणे आकर बसे थे। पेशवा की गद्दी वंशवादी हो गई। इससे महाराष्ट्र में ब्राह्मणवादी संस्कृति का चलन बढ़ गया। डॉक्टर दीक्षित कहते हैं कि, 'जब किसी एक समुदाय के नेता के पास ताकत आ जाती है, तो उसके इर्द-गिर्द उसी के समुदाय के लोगों का झुंड जमा हो जाता है। पेशवाओं के दौर में बहुत से ब्राह्मण ऊंचे पदों पर पहुंचे। इससे पुणे शहर में ब्राह्मणों का बोलबाला हो गया।'

नतीजा ये हुआ कि समाज पर ब्राह्मणवादी संस्कृति हावी हो गई। निचली जातियां आर्थिक-सामाजिक रूप से हाशिए पर चली गईं। ब्राह्मणों का मुख्य पेशा पूजा-पाठ और अध्ययन-अध्यापन रहा है। वो पेशवाओं के सलाहकार बन गए।पेशवाओं के निजाम में वो अधिकारी, बैंकर और प्रशासक बन गए। असरदार परिवारों के बीच रिश्तेदारियां होने से सत्ता पर ब्राह्मणों की पकड़ और मजबूत हो गई।

इस सत्ताधारी तबके ने ही जातियों के रहन-सहन और पाबंदियों के नियम तय किए। समाज में ऊंच-नीच का बहुत ज्यादा ध्यान रखा जाने लगा। आम तौर पर कानून का पालन कराने की जिम्मेदारी इसी तबके के पास थी। लेकिन आज ये ताकत केवल पत्या यानी बोर्ड लगाकर अपनी हस्ती की नुमाइश करने तक सीमित रह गई है। आज जिस रूखे अंदाज में ये बोर्ड लिखे जा रहे हैं, ये गुजरे जमाने की ऐंठ की ही निशानियां हैं। पेशवाओं के जमाने में मजबूत स्थिति होने के बावजूद, पुणे के ब्राह्मण आम तौर पर सामान्य जिंदगी ही जीते थे। आज भी उनका रहन-सहन वैसा ही है।
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टशन पर अभिमान, बदलना नहीं चाहते

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- फोटो : social media
पुणे की रहने वाली चितपावन ब्राह्मण माया लेले कहती हैं कि, 'कोंकण में हमारे पुरखों की जिंदगी में बहुत सारी मुश्किलात थीं। इलाका पहाड़ी था, भारी बारिश की वजह से खेती करना और जीवन बसर करना दुश्वार था। इसीलिए हमें वक्त, पैसे और कोशिशों की अहमियत अच्छे से पता है। हम किसी भी चीज को हल्के में नहीं लेते।' जोशी इसी बात को दूसरे तरीके से कहते हैं, 'पुणेकर हमेशा हर चीज का अधिकतम इस्तेमाल करना जानते हैं। यहां के लोग आधा पेट खाकर सोना पसंद करते हैं। पेट में खाना ठूंस कर उसे बर्बाद करने में यकीन नहीं रखते।'

अब आप चाहे जिस नजरिए से देखें, पुणे के लोगों का ये बर्ताव सदियों की संस्कृति और माहौल की वजह से है। कोंकण में उनकी उत्पत्ति से लेकर पेशवाओं के राज में पुणे आकर बसने और सत्ता के गलियारों में पैठ बनाने तक उन्होंने लंबा सफर तय किया है। आज उन ब्राह्मणों के ज्यादातर वारिस पुणे के पुराने इलाकों में आबाद हैं। वो उसी सीधे-सपाट रवैये वाला बर्ताव दिखाते हैं। कम से कम में काम चलाना जानते हैं। वो ये सुनिश्चित करते हैं कि बाहर से आने वाले लोग उनके बताए नियम-कायदों पर चलें। इसीलिए वो ऐसे साइनबोर्ड भी लगाते हैं।
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पुनेरी को अपने टशन पर है अभिमान

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- फोटो : bbc
पुनेरी टशन से बाहरी लोग परेशान होते हैं, हैरान होते हैं और कई बार चिढ़ भी जाते हैं। लेखक और व्यंगकार पी एल देशपांडे ने पुनेकरों के बर्ताव को अपने मराठी लेख 'तुम्हाला कोन व्हेचाय?' में बहुत अच्छे से बयां किया है। पुणे के लोगों को अपने टशन पर अभिमान है। वो इसे बदलना नहीं चाहते।

पिछले कुछ दशकों में बाहर से आकर लोगों के बसने की वजह से पुणे का रंग-रूप काफी बदल गया है। दूसरे देशों से आकर भी लोग यहां के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों मे पढ़ते हैं। आज इसे पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाने लगा है। पुणे को महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है। दूसरे राज्यों से लोग यहां रोजगार की तलाश में आते हैं। ये सॉफ्टवेयर का बड़ा गढ़ भी है।

रूखे बर्ताव की टशन में भी झलक

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- फोटो : bbc.com
इसके बावजूद यहां के सांस्कृतिक नियम बहुत सख्त हैं। पुणे के लोगों का रूखा बर्ताव केवल साइन बोर्ड में ही नहीं दिखता, उनके बर्ताव में टशन से भी झलकता है। पुणे के रहने वाले विनय कुलकर्णी कहते हैं कि जब वो पुराने शहर के एक मंदिर में दर्शन के लिए गए, तो उन्हें बताया गया कि, 'ये भगवान के सोने का वक्त है। शाम को आना।' अगर आप पुणे के पुराने इलाके की किसी दुकान में दोपहर एक बजे पहुंचेंगे, तो आप को रुखाई से बताया जाएगा कि 'अभी जाओ, शाम चार बजे आना। अभी आराम का वक्त है।' आप कितनी भी मिन्नतें कर लें, दुकान नहीं खुलेगी, तो नहीं खुलेगी।
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ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स में पुणे टॉप पर

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- फोटो : bbc.com
डॉक्टर मधुकर दीक्षित कहते हैं कि, 'इस टशन की वजह से कई बार कारोबार को नुकसान होता है। लेकिन पुणे के लोग मानते हैं कि वो अच्छी क्वालिटी देते हैं, तो ग्राहक उनके पास जरूर लौटेगा।' बाहरी लोग अक्सर इन नियमों का मजाक उड़ाते हैं। लेकिन, यूं लगता है कि इसमें कोई तो खास बात है। अगस्त में जारी हुई जीवन जीने के पैमाने वाली रिपोर्ट यानी ईज ऑफ लिविंग इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक पुणे भारत में रहने के लिए सब से अच्छा शहर है। यहां के शहरी विकास, सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक कारकों की वजह से ये भारत का सबसे अच्छा शहर माना गया है। बाहरी लोगों को चंद्रात्रे की बात पर गौर करना चाहिए। वो कहते हैं कि, 'आपको माहौल से तालमेल बिठाने में वक्त लगेगा। मगर एक बार आप यहां के माहौल का हिस्सा बन गए, तो आप को यहां रहने में मजा आने लगेगा।'
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