आज हम बात करेंगे एक ऐसे शहर की जहां के मंदिरों के नाम बेहद अजीबोगरीब है। फिर चाहे वह थानेश्वर हो या झगड़ेश्वर महाराज या फिर हो खस्तेश्वर... बहुत से लोग होंगे जिन्हें इनमें से कोई नाम आज से पहले शायद ही सुनने को मिला हो।तो चलिए जानते हैं किस्से इन अजब-गजब नाम वाले मंदिरों के...
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ये मंदिर है स्थित हैं उत्तर भारत के मेनचेस्टर में यानी कि कानपुर नगरी में। उत्तर प्रदेश के इस बड़े शहर के इन अजीबोगरीब मंदिरों को ये अजीबोगरीब नाम भी यहां के लोगों ने ही दिए हैं। लेकिन सबसे दिलचस्प है इनके नामकरण के पीछे छुपी अजब-गजब कहानियां...
सबसे पहले ले चलते हैं आपको कानपुर के सबसे चर्चित स्थान बिठूर में। यहां है 'थानेश्वर महादेव मंदिर', कई साल तक बेनाम रहा ये मंदिर आज अपनी खास पहचान रखता है। तभी तो सुर्खियों में है। अगल-बगल के लोगों का कहना है कि 20 साल पहले ध्रुव टीले से थोड़ी दूर पर बने एक प्राचीन मंदिर में चोरों ने हाथ साफ किया था।
मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारियों को थोड़ी दूर झाड़ियों में शिवलिंग मिला था जिसको अधिकारियों ने बिठूर थाने के कार्यालय के सामने परिसर में बने एक मंदिर में स्थापित करा दिया। तबसे यह अनाम मंदिर था। पूर्व थानाप्रभारी तुलसीराम पांडेय ने पिछले साल दीपावली के दिन इस मंदिर की साफ-सफाई कराई और इसको थानेश्वर महादेव मंदिर नाम दे दिया।
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कानपुर के कालपी रोड पर झगडे़श्वर मंदिर में विराजे हैं झगडे़श्वर महादेव। इसके पीछे की कहानी काफी भी उतनी ही रोचक है जितना कि इनका नाम। महादेव का यह छोटा सा मंदिर तीस साल से भी ज्यादा पुराना है।
इलाके के लोगों की मानें तो जब यह मंदिर बनाया जा रहा था तब इसको लेकर लोगों में काफी वाद-विवाद हुआ था। जिस जगह यह स्थित है वहां मिश्रित आबादी के लोगों के बीच अक्सर झगडे़ होते रहते हैं।
इन झगड़ों से ही इस अजीबोगरीब मंदिर को नाम मिला है। जी हां इस मंदिर का नाम झगड़ेश्वर महादेव मंदिर पड़ गया है।
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नवाबगंज में गंगा किनारे ऐतिहासिक जागेश्वर मंदिर है। मान्यता है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। सुबह भूरा, दोपहर में ग्रे और रात में काले रंग का दिखता है।
मंदिर के पुजारी ने बताया कि सैकड़ों साल पहले यहां घना जंगल था। यहां गांववाले अपने मवेशी चराते थे। सिंहपुर कछार निवासी जग्गा किसान भी अपनी गायें चराने के लिए इसी टीले पर लाया करता था। उसकी एक दुधारू गाय ने दूध देना बंद कर दिया।
जग्गा ने इसकी पड़ताल की तो देखा कि वह गाय टीले पर आकर दूध गिरा देती थी। जग्गा ने गांववालों को बताया। फिर लोगों ने टीले पर खुदाई शुरू की तो एक शिवलिंग मिला। गांववालों ने विधि-विधान से पूजा-पाठ के बाद उसे यहीं पर स्थापित कर जग्गा किसान के नाम से मंदिर का नाम जागेश्वर रख दिया।
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पहले शहर की कोतवाली चौक इलाके में हुआ करती थी। बाद में कोतवाली बड़ा चौराहा के पास शिफ्ट हो गई। यहां चौक में कोतवाली वाले स्थान पर भगवान शिव का मंदिर भी बना दिया गया।
चूंकि यहां पर किसी जमाने में कोतवाली हुआ करती थी इसी वजह से इस मंदिर का नामकरण 'कोतवालेश्वर मंदिर' कर दिया गया। है न गजब...
खस्तेश्वर मंदिर जो करीब 145 साल पुराना बताया जाता है, चावलमंडी में स्थित है। इस मंदिर को नाम मिला एक खस्ते वाले से। दरअसल, इस दुकान के खस्ते इतने ज्यादा फेमस हो गए कि लोगों ने पास में ही स्थित भगवान शिव के मंदिर को खस्तेश्वर मंदिर के नाम से पुकारना शुरू कर दिया। बस फिर इस मंदिर की यही पहचान बन गई। खस्ते वाले का नाम राम नारायण था।