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पहले ऐसे होता था लाई डिटेक्टर टेस्ट, तरीका जानकर कांप जाएगी रूह, उगलने लगते थे सच

Sun, 25 Nov 2018 03:37 PM IST
फीचर टीम, अमर उजाला
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- फोटो : social media
हम सभी ने लाई डिटेक्टर टेस्ट का नाम मीडिया, अखबार और फिल्मों आदि में सुन रखा है। अक्सर प्रचलित अपराधिक कांडों में यह टेस्ट सच उगलवाने के लिए किया जाता है। लाई डिटेक्टर टेस्ट के संबंध में ज्यादातर लोग जानते हैं कि एक ऐसी मशीन है जो झूठ पकड़ लेती है। लाई डिटेक्टर टेस्ट दो प्रकार से किया जाता है, एक तो पॉलीग्राफ टेस्ट और दूसरा ब्रेन मैपिंग टेस्ट। लाई डिटेक्टर टेस्ट को लेकर आज हम आपको जो बता रहे हैं वह जानकर आप अपना माथा पकड़ लेंगे।





 
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- फोटो : social media
आपको बता दें कि लाई डिटेक्टर टेस्ट का इस्तेमाल इंसान पर सैकड़ों साल पहले से होता आ रहा है। बस फर्क ये है कि आज मशीन से किया जाता है, लेकिन मिस्र में लाई डिटेक्टर टेस्ट की शुरुआत काफी सालों पहले हो चुकी थी। खबरों के मुताबिक मिश्र का 'अयिदाह कबीला' कई सालों से लाई डिटेक्टर टेस्ट से सच का पता लगा लेता है। इस काबिले के सच जानने के तरीके को देखकर आपकी रूह कांप जाएगी।
 
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जी हां, इस टेस्ट को तो दूर अगर आप इस टेस्ट को करते भी देख लो, तो आप फटाफट सच बोल दोगे। इतना ही नहीं यह कबीला आज भी इस भयावह पुराने तरीके से सच उगलवा रहा है।हालांकि आजकल लगभग कबीलों में ये प्रथा बंद हो चुकी है। पर एक कबीला 'अयिदाह' आज भी इस तरीके का उपयोग कर रहा है।

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- फोटो : File Photo
आप अयिदाह काबिले के इस तरीके को देखकर कांप जाओगे। इतना ही नहीं यहां के लोग इस तरीके के बाद झूठ पकड़ने का जो लॉजिक देते हैं, वह इंसान को शर्मसार कर देगा। कहा जाता है कि अयिदाह कबीले के लोग बिशाह परंपरा के तहत झूठ पकड़ते हैं। इस तरीके में एक लोहे की रॉड को गर्म किया जाता है। उस गर्म रॉड को आरोपी की जीभ पर चिपकाया जाता है, जिस आरोपी की जीभ पर फफोले हो जाते हैं, उसे दोषी मान लिया जाता है। यह तरीका मौत से कम नहीं होता है। 
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dem - फोटो : File Photo
यहां के लोगों का मानना है कि झूठ के आरोपी की जीभ पर फफोले पड़ते हैं। इस कबीले के अनुसार जो व्यक्ति झूठ बोलता है, वो नर्वस होता है। जिस कारण उसकी जीभ सूख जाती है, जब सूखी जीभ पर धातु की छड़ चिपकाई जाती है तो फफोले पड़ जाते हैं। वहीं जो व्यक्ति निर्दोष होते हैं उसकी जीभ पर सलाइवा रहता है, जिस कारण उसके फफोले नही पड़ते है। इस कबीले के इस तर्क को वैज्ञानिक ढंग से देखा जाए तो यह कहीं न कहीं सच लगता है। 
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