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ऐसे देश जहां कैदियों के पास होती है सबसे ज्यादा आजादी, खासियत इतनी कि गिनते रह जाओगे

Sat, 02 Jun 2018 10:30 AM IST
बीबीसी हिंदी
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Jail of Norway
पिछले साल दिसंबर में थाईलैंड में पुदित कित्तित्रादिलोक नाम के एक शख्स को 13 हजार 275 साल कैद की सजा सुनाई गई थी। पुदित का जुर्म ये था कि उसने चिटफंड कंपनी के जरिए 2400 लोगों को करोड़ों का धोखा दिया था। उन्हें भरोसा दिया था कि उन्हें अच्छा रिटर्न मिलेगा। पुदित को इस धोखाधड़ी की जो सजा सुनाई गई, वो तो उसकी उम्र क्या, धरती के नियोलिथिक युग से भी लंबी है, लेकिन, थाईलैंड के कानून के मुताबिक वो सिर्फ 20 साल जेल में रहेगा।

आम तौर पर दुनिया भर में ये माना जाता है कि लंबी और सख्त सजा से अपराध कम होते हैं। वैसे पुदित को जो सजा सुनाई गई वो तो दिखावे के लिए थी। इसी तरह अमरीका के ओक्लाहोमा शहर में 1995 में हुई बमबारी के मुजरिम टेरी निकोलस को 161 साल उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी। उसे कोई पैरोल न दिए जाने की शर्त भी सजा में शामिल थी। यानी टेरी की उम्र जेल में ही बीतनी थी।

सवाल ये है कि ऐसी लंबी और सख्त सजाएं अपराध कम करने में कितनी कारगर होती हैं? इनका असर होता भी है या नहीं?

 
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handcuff
कैद का मकसद
जब जज किसी को सजा सुनाते हैं तो चार बातों की भूमिका अहम होती है। पहली, किसी को उसके किए की सजा देनी है। दूसरा, उसके बर्ताव को सुधारना है।
तीसरा, उसकी सुरक्षा है क्योंकि जिन लोगों के खिलाफ उसने जुर्म किए हैं, वो उससे बदला लेने के लिए नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। चौथी बात बाकी समाज को संदेश देना है कि ऐसे अपराध करने पर सख्त सजा होगी।

बहुत से लोग, खास तौर से अमरीका में सरकारी वकील ये मानते हैं कि लंबी कैद से ये चारों मकसद पूरे होते हैं। अमरीका के एटॉर्नी जनरल जेफ सेशन्स हिंसक अपराधों और ड्रग से जुड़े जुर्म के लिए सख्त सजा की वकालत करते आए हैं। सेशन्स जैसे लोगों का मानना है कि इससे समाज सुरक्षित होगा। लंबी सजा की वकालत करने वाले कहते हैं कि इससे कैदी को अपने जुर्म पर विचार करने और खुद को सुधारने का ज्यादा मौका मिलता है। वो कैद में रहने के नुकसान का तजुर्बा करते हैं। तो वो फिर से कोई जुर्म करके जेल जाने से बचते हैं।

लेकिन, लंबी सजा के प्रावधान से जेलों में कैदियों की भीड़ बढ़ जाती है। इसका सरकारी खजाने यानी आम जनता पर भारी असर पड़ता है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के लॉ स्कूल की 2016 में आई रिपोर्ट कहती है अगर अमरीका अपनी जेलों में कैदियों की तादाद 40 फीसदी तक घटा ले, तो वो दस सालों में 200 अरब डॉलर की बचत कर सकता है।
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American jail
67 फीसदी लोग फिर से पकड़े गए

रिसर्च बताते हैं कि कैद की लंबी मियाद असरदार नहीं होती। फिर 13 हजार 275 साल की सजा सुनाने का कोई तुक है क्या? और सजायाफ्ता लोगों को ये लगता है कि वो पकड़े नहीं जाएंगे। अपराधी भविष्य जेल में बिताने को लेकर डरते भी नहीं। यानी लंबी सजा के बावजूद जेल से छूटते ही लोग जुर्म की दुनिया में लौट जाते हैं।

2009 में अमरीका में हुई स्टडी बताती है कि 3 साल जेल में रहने के बाद रिहा हुए 67 फीसदी लोगों को नए जुर्म के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इनमें से 46.9 फीसदी को नए जुर्म के लिए सजा हो गई। जेल भेज दिया गया। ब्रिटेन में जेल से छूटने वाले 70 फीसदी अपराधियों को साल भर के भीतर दोबारा सजा सुनाई गई। जानकार कहते हैं कि पकड़े जाने के बाद भी अपराधियों को यही लगता है कि वो जुर्म करने पर पकड़े नहीं जाएंगे। ऐसे में उन्हें लंबे वक्त तक कैद में रहने का डर नहीं होता।

तो, हम इस बात पर तो राज़ी हो सकते हैं कि अपराधियों को सबक सिखाना जरूरी है। मगर उन्हें कितने दिनों तक कैद में रखा जाए, इस सवाल पर मतभेद हैं। एक जुर्म के लिए अलग-अलग देशों में सजा भी अलग-अलग होती है। जैसे कि 2006 में डकैती करने वालों को फिनलैंड में 16 महीने कैद की सजा मिली। वहीं ऑस्ट्रेलिया में इसी जुर्म की सजा 72 महीने की कैद थी। इंग्लैंड में डकैती की सजा 15 महीने कैद है, तो अमरीका में इस जुर्म की सजा 60 महीने की जेल।
 

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American jail
लंबी सजा के मामले में अमरीका अव्वल है

यही वजह है कि अमरीका में 1970 के दशक से जेल में कैद लोगों की संख्या में बेतहाशा इजाफा हुआ है। जैसे-जैसे सजा की मियाद बढ़ रही है, कैदियों की तादाद भी बढ़ रही है। आज हिंसक अपराधों और ड्रग से जुड़े जुर्म के लिए कैद लोगों की संख्या काफी बढ़ गई है।

आज की तारीख में अमरीका में सबसे ज्यादा 22 लाख लोग जेलों में कैद हैं। इससे अमरीकी अर्थव्यवस्था पर 57 अरब डॉलर सालाना का बोझ पड़ता है।

 
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american jail
अमरीका के हालात

वॉशिंगटन के अर्बन इंस्टीट्यूट के जस्टिस पॉलिसी सेंटर के रेयान किंग कहते हैं कि हिंसक अपराधों के लिए कोई भी सजा लंबी नहीं लगती। पिछले 40 सालों से अमरीका में यही विचार चल रहा है।

किंग कहते हैं कि अमरीका के लिए 60 का दशक काफी उठा-पटक भरा रहा था। अमरीकी सेनाएं वियतनाम युद्ध में फंसी थीं। वहीं, घर में अमरीकी अश्वेतों के सिविल राइट्स आंदोलन का सामना कर रहे थे। इस दौरान हिंसक घटनाएं और दंगों की तादाद काफी बढ़ गई थी।

रेयान किंग कहते हैं कि राजनेता ऐसे हालात का फायदा उठाते रहे हैं। वो बताते हैं कि 60 के दशक से ही अमरीकी जेलों में बंद लोगों की संख्या बढ़नी शुरू हुई थी। 1974 में जहां अमरीका की जेलों में महज़ 2 लाख लोग कैदी थे। वहीं 2002 में ये संख्या बढ़कर 15 लाख से ज्यादा हो गई थी।

किंग के मुताबिक हर राजनेता को ये बयान देना पसंद है कि वो अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाएगा। जैसे यूपी के सीएम ने अपराधियों के एनकाउंटर की नीति पर अमल शुरू किया है। जुर्म का हाथों-हाथ हिसाब। गैरकानूनी होने के बावजूद इसे लगातार सियासी तौर पर जायज ठहराया जा रहा है।

हमारे देश में हर चुनाव में विरोधी पर अराजकता फैलाने के आरोप लगाए जाते है। फिर वादा किया जाता है कि कानून का राज कायम करेंगे। सामाजिक सोच भी लंबी सजाओं के लिए जिम्मेदार है। जैसे कि अमरीका में कहा जाता है कि अगर आप सजा भुगतने को तैयार नहीं हैं, तो जुर्म मत कीजिए।

फिर लोगों को व्यक्तिवाद के चलते अपने कर्मों का फल भोगने की सोच भी अमरीकी समाज में देखने को मिलती है। धर्म का भी काफी असर होता है, सजा की मियाद तय करने में।
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Jail of Norway
लंबी कैद का विकल्प क्या है?

अपराधियों को अगर जुर्म करने पर लंबे वक्त तक कैद में न रखें तो फिर उनका करें क्या? इस सवाल के जवाब में रास्ता दिखाता है उत्तरी यूरोपीय देश नॉर्वे। वहां खुली जेलों का चलन ज्यादा है। नॉर्वे ने मौत की सजा 1902 में ही खत्म कर दी थी। 1981 में वहां उम्र कैद की सजा भी खत्म हो गई। आज नॉर्वे में जो अधिकतम सजा दी जा सकती है, वो है 21 साल की कैद।

नॉर्वे की हाल्डेन जेल, दुनिया भर के लिए मिसाल बन सकती है। यहां कैदी कोठरियों में कैद नहीं किए जाते। न ही यहां के गार्ड हथियार लिए होते हैं। कैदी और जेल के सुरक्षा गार्ड आपस में घुल-मिल कर रहते हैं।

ये अधिकतम सुरक्षा वाली जेल है, जहां से भागना कमोबेश नामुमकिन है। मगर जेल के भीतर कैदियों को काफी आजादी है। यहां तक कि सुरक्षा के लिए जरूरी कैमरे भी नहीं लगाए गए हैं।

अब हर देश तो नॉर्वे की मिसाल से नहीं सीख सकता। कट्टर अपराधियों को आप खुली जेलों में नहीं रख सकते। मगर, छोटे अपराध करने वालों को सुधारने के लिए ये एक अच्छा विकल्प हो सकता है। ओस्लो यूनिवर्सिटी में अपराध विज्ञान के प्रोफेसर थॉमस यूगेल्विक कहते हैं कि खुली जेलें बनाना आसान है। इनका रख-रखाव भी कम खर्चीला है। कैदियों को एक हद तक आजादी तो है मगर उन्हें सजा पूरी होने तक बंदिश में तो रहना ही पड़ता है।

खुली जेलों की वजह से नॉर्वे में अपराधी जेल से छूटने के बाद जुर्म की दुनिया में भी कम ही लौटते हैं। यहां केवल 20 फीसदी अपराधी जेल से छूटकर दोबारा अपराध की दुनिया में लौटते हैं। अमरीका में ये आंकड़ा 60 फीसद है। नॉर्वे में औसत सजा आठ महीने ही है। खुली जेलों में रहना आसान नहीं। प्रोफेसर थॉमस कहते हैं कि कैदियों को स्कूल जाना पड़ता है। काम करना होता है। अपराधियों को पॉजिटिव रवैया अपनाना पड़ता है।
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jail
मौत की सजा से कम होते हैं अपराध?

भारत की मिसाल ही लीजिए, हाल ही में गैंग रेप की दो घटनाओं के बाद सजा सख्त करने की मांग हुई। सरकार ने अध्यादेश जारी कर के कानून में बदलाव किया। अब नाबालिग से रेप की सजा मौत होगी।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पिछले महीने ही ड्रग डीलर्स को मौत की सजा देने की मांग का समर्थन किया था। क्या किसी जुर्म के लिए मौत की सजा तय होने से अपराध कम होता है?
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jail
इस सवाल का जवाब है नहीं

वॉशिंगटन में क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम सुधारने के लिए काम कर रहीं एश्ले नेलिस कहती हैं कि इससे बस नेताओं को बयानबाजी का मौका मिलता है। वो हर जुर्म में सियासी फायदा लेने की कोशिश करते हैं। नेलिस कहती हैं कि अपराधी यही सोचते हैं कि वो पकड़े ही नहीं जाएंगे। जब वो इस विचार से मजबूत हैं, तो उन्हें सजा का खौफ क्या खाक होगा!

वैसे बलात्कारियों और सीरियल किलर को लंबी सजा देने को एक हद तक ठीक माना जा सकता है। इससे पीड़ित परिवार को बदला पूरा होने का अहसास होता है। समाज में भी सख्त संदेश जाता है। लेकिन, ऐसे अपराध होते बहुत कम हैं। भले ही अखबारों और टीवी चैनलों में बलात्कार और हत्याओं के मामले बढ़ने का शोर मचा हो, मगर ऐसे गंभीर अपराध बहुत कम होते हैं।

ज्यादातर जानकार कहते हैं कि ड्रग जैसे जुर्म से निपटने के लिए हमें सामाजिक तौर पर कदम ज्यादा उठाने चाहिए। सख्त  सजा के बजाय लोगों को इससे बचाने की कोशिश करनी चाहिए। एक बार सजा पाने वाले को पुनर्वास में पूरी मदद करनी चाहिए, क्योंकि ये तो नशा है और नशा सजा से नहीं छूटता।

किसी को कैद करना बहुत सख्त सजा होती है। ज्यादातर अपराधों में तो इसके बगैर ही काम चल सकता है। ड्रग लेने जैसे जुर्म के लिए तो पुनर्वास पर जोर दिया जाना चाहिए क्योंकि ये लत का मामला है।

अपराध से हर देश अपने तरीके से निपटता है। ऐसे में शायद हर मुल्क के लिए नॉर्वे जैसी जेलें बनाना और चलाना मुमकिन न हो। पर एक बात तो तय है कि लंबी सजा से अपराध कम नहीं होते।

इसके बजाय कैदियों को सुधारने और उनको समाज की मुख्यधारा से दोबारा जोड़ने पर जोर होना चाहिए। बहुत कुछ कैदियों पर भी निर्भर करता है कि वो अपनी जिंदगी के साथ क्या करना चाहते हैं।
 
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