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71 साल की ये औरत 20 रुपए में ये काम करने को हुई मजबूर, दर्दनाक है इसकी कहानी

Tue, 21 Aug 2018 09:41 AM IST
माजिद जहांगीर, बीबीसी हिंदी
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बीस रुपये महीने की सैलरी पर कोई कैसे काम कर सकता है, और वो भी एक सरकारी स्कूल में? आप शायद यकीन न करें पर एक बार ताजा बेगम से पूछ लीजिए। उनकी उम्र 71 साल हो चुकी है। वो बीते 36 सालों से भारत प्रशासित कश्मीर के कुलगाम जिले के गार्ड हांजी गांव के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में काम कर रही हैं। ताजा बेगम यहां साल 1982 में बतौर स्वीपर बहाल हुई थीं। उनकी बहाली की चिट्ठी में लिखा है कि ताजा बेगम को CPW यानी 'कंटींजेंट पेड वर्कर' के रूप में बहाल किया जा रहा है और हर महीने उन्हें स्कूल लोकल फंड से दस रुपया दिया जाएगा।

 
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किस्मत नहीं बदली
ताजा बेगम हर दिन स्कूल जाकर साफ-सफाई का काम करती हैं। पूरी जिंदगी स्कूल में झाड़ू-पोंछा करने के बाद उन्हें इस बात का इंतजार है कि बुढ़ापे में कुछ तो मुआवजा मिलेगा। वो कहती हैं, "मैंने पूरी  जिंदगी स्कूल की गर्द खाई है। अब बीमार रहने लगी हूं। खांसी की मरीज बन गई हूं। दुनिया बदल गई, लेकिन मेरी किस्मत नहीं बदली। मुझे आज भी वही 20 रुपया मिलता है। जब मैंने स्कूल में स्वीपर के तौर पर काम शुरू किया था तो उस वक्त मुझे एक रुपये की तनख्वाह दी जाती थी।" ताजा बेगम कहती हैं कि जो 20 रुपया उन्हें स्कूल से मिलता है, उस पैसे से तो वो दवाई भी नहीं खरीद पाती हैं।
 
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ताजा बेगम की कहानी
ताजा बेगम बताती हैं, "पहले मुझे यहां एक रुपया मिलता था, फिर पांच रुपये मिलने लगे, फिर दस और अब बीस रुपया मिलता है। मुझे खुद ही स्कूल के लिए झाड़ू भी खरीदना पड़ता है।" उन्होंने कहा, "मैं अपने लिए कपड़े भी नहीं खरीद सकती हूं और न कोई चीज। कभी मेरी भी ख्वाहिश होती है, कोई अच्छी चीज खाऊं, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं होते। कभी दिल ही दिल में सोचती हूं कि मैं अपने लिए गोश्त खरीदूं पर मेरे पास पैसे नहीं होते। जिंदगी इस स्कूल के लिए लगा दी, लेकिन हासिल कुछ भी नहीं हुआ। कई बार अपनी फाइल लेकर शिक्षा विभाग गई, लेकिन वहां सिर्फ एक ही जवाब मिलता है - 'देखते हैं' और 'आपका काम हो जाएगा।"
 

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Payment Record
ताजा बेगम के पति और बेटे का बहुत पहले निधन हो गया था। अब वह बेटी के घर में रहती हैं। ताजा बेगम को जो पैसा मिलता है वह स्कूल में उनको नकदी दिया जाता है। स्कूल की प्रिंसिपल का कहना है कि ताजा बेगम की सैलरी का पैसा स्कूल के लोकल फंड से आता है। जुलाई, 2018 में उन्हें 45 रुपया दिया गया है। प्रिंसिपल मारूफ जान कहती हैं, "बीते बारह सालों से मैं यहां काम कर रही हूं। ताजा बेगम यहां बराबर सफाई का काम करती रही हैं। वो हर दिन स्कूल आती हैं। हम उनको स्कूल के लोकल फंड से पैसे देते हैं। उनकी सैलरी इस बात पर निर्भर करती है कि हमारे स्कूल में कितने बच्चों का दाखिला होगा।" जिला कुलगाम के डिप्टी एजुकेशन ऑफिसर बशीर अहमद कहते हैं कि 'हमारी नोटिस में ये मामला आने के बाद विभाग ने फैसला किया है कि ताजा बेगम की सैलरी बढ़ा दी जाएगी।'
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सैलरी बढ़ी
उप शिक्षा पदाधिकारी बशीर अहमद ने बताया, "दरअसल ताजा बेगम के पैसे बढ़ाने में इतना समय इसलिए लगा क्योंकि हमारे पास उस गांव में स्कूल के लिए कोई प्रॉपर बिल्डिंग नहीं थी। हमने गांव वालों से कई बार कहा कि स्कूल के लिए जमीन मुहैया की जाए, लेकिन किसी ने जमीन नहीं दी। जो स्कूल हमारे पास वहां है, वह एक खस्ताहाल कमरे जैसा है।" वो कहते हैं, "ताजा बेगम हमारे पास आज तक कभी आई भी नहीं। अब हमने उनके पैसे बढ़ा दिए हैं। अब हमने ये रकम 500 रुपये कर दी है।" हालांकि ताजा बेगम को अभी तक ये बढ़ी हुई सैलरी मिलनी शुरू नहीं हुई है।
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'कुछ हासिल नहीं हुआ'
इसी गांव के रहने वाले मोहम्मद यूसुफ कहते हैं कि 'जबसे ये स्कूल बना है तब से ताजा बेगम को हम यहां झाड़ू लगाते देख रहे हैं।' ताजा बेगम की बेटी शहजादी कहती हैं कि अम्मी लंबे समय से स्कूल में सफाई का काम कर रही हैं, लेकिन आज तक उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ। उन्होंने कहा, "मेरी मां का इस दुनिया में कोई सहारा नहीं है। गर्द साफ करने से वो बीमार भी हो गई हैं। कभी-कभी उनके लिए तमाम दवाइयां भी लानी पड़ती है। जो 20 रुपया मिलता है, वह अफसरों के पास जाने के लिए किराये में खर्च हो जाता है। आने के दस और जाने के दस। घर तो खाली हाथ वापस लौटती हैं।"
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अली मोहम्मद लोन की कहानी
जो कहानी ताजा बेगम की है, वही अली मोहम्मद लोन की भी है। उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के चौकीबल के जूणीऋषि प्राइमरी स्कूल में 70 वर्षीय लोन साल 1982 से चपरासी के तौर में काम कर रहे हैं। उन्हें तबसे सिर्फ 55 रुपये सैलरी मिल रही है। शिक्षा विभाग से मिलने वाली ये सैलरी उनके बैंक खाते में आती है। अली का कहना है कि स्कूल के लिए उन्होंने अपनी जमीन भी दी, लेकिन उसके बावजूद उनकी तनख्वाह बढ़ाई नहीं गई। वो कहते हैं, "आप खुद सोच सकते हैं कि इस पैसे का में क्या कर सकता हूं? कोई मेरी फरियाद नहीं सुन रहा है। मैंने अफसरों को कई बार अपनी इस हालत के बारे में कहा, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। मेरी जिंदगी भी जाया हो गई और मेरी जमीन भी। जब कमाने का समय था तब मैं इसी खुशफहमी में रहा कि मेरी तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ।"

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Ali Mohamed Lone
उन्होंने कहा, "मैंने शिक्षा विभाग वालों से कहा था कि या तो इस तनख्वाह पर आपको शर्म आनी चाहिए या मुझे आनी चाहिए।" अली मोहम्मद की तनख्वाह क्यों नहीं बढ़ी?इस सवाल पर कुपवाड़ा के चीफ एजुकेशन अफसर मोहम्मद शफी वार का कहना था, "ये लोग कंटींजेंट पेड वर्कर होते हैं। जो भी पैसा स्कूल में बच्चों के दाखिले और फीस से जमा होता है, उसी पैसे में से इनको भी दिया जाता है।" उन्होंने कहा, "ये सैलरी नहीं होती है। 55 रुपया कोई सैलरी नहीं होती है। ये तो इस बात पर निर्भर करता है कि स्कूल के पास पैसा कितना है। अब इन कंटींजेंट पेड वालों का एक फायदा ये होता है कि सीनियोरिटी की बुनियाद पर हम ऐसे लोगों को कन्फर्म करते हैं।"
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सवाल और भी हैं...
70 साल के व्यक्ति को सरकार ने कैसे नौकरी पर रखा है? इसके जवाब में मोहमद शफी वार कहते हैं, "ये तो सही है कि नहीं रख सकते हैं। हम इसमें देखते हैं कि क्या कर सकते हैं।" अली मोहम्मद की तरफ से स्कूल के लिए दी गई जमीन के बारे उनका कहना था, "स्कूल के लिए जमीन दान देने पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है।" लेकिन मोहम्मद लोन का दावा है कि उन्हें जमीन देने के एवज में नौकरी का वादा किया गया था। इस बात पर मोहम्मद शफी कहते हैं, "हमने ऐसे सभी मामले अपने जोनल एजुकेशन कार्यालयों को भेजे हैं। हम ऐसे सारे मामले देख रहे हैं।" जम्मू और कश्मीर लेबर एंड एम्प्लॉयमेंट विभाग की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक स्किल्ड मजदूरों को एक दिन का 225 रुपया दिया जाता है।
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