बचपन में जब पापा के पास पेन देखते तो मन होता था कि हम भी पेन चलाएं लेकिन उस समय हाथ और उम्र इतनी कच्ची होती थी कि उसे थामने तक के लिए पिता जी पेन नहीं देते थे। हम बिना उसका मोल जाने जिद करने लगते थे कि पेन चाहिए और अब हम केवल पेन से ही लिखेंगे वरना नहीं पढ़ेंगे। लेकिन यह तमन्ना बचपन में तो पूरी न हो सकी।
पहले स्लेट पर स्लेटी, फिर तख्ती पर दवात और कलम रगड़ी तब जाकर हर्फ गढ़ना सीखे। इसके बाद ही पेन से लिखने को मिला। हां वह पहला पैन 'स्टिक ईजी' था। याद तो होगा आपको भी। वही पेन जो लाला की दुकान से लेकर नौकरीपेशा लोगों की जेब में सजा नजर आता था। उस दौर में यह पेन सबसे ज्यादा चलन में था।
वजह यह थी कि यह पेन सबसे सस्ते दामों पर मिलता था। महज 2 रुपए इसकी कीमत थी। लोग तो इस पेन के रिफिल के खत्म होने के बाद रिफिल खरीदने से बेहतर 2 रुपए में नया पेन लेना तक ही बेहतर समझते थे। इससे आप समझ सकते हैं कि इस पेन का उस दौर में क्या क्रेज रहा होगा।
ऐसा नहीं है कि मार्केट में और कोई कंपनी नहीं थी। अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो यह गलत होगा। बता दें उस समय कई पेन की कई कंपनियां बाजार में मौजूद थी। इन कंपनियों ने अच्छा खासा मुकाम भी हासिल किया था। चलिए आज ऐसे ही कुछ पेन के बारे में बताते हैं जो धुंधली पड़ चुकी बचपन की यादों को फिर से ताजा कर देंगी...
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पायलेट पेन
पायलेट पेन तो आपको याद होगा ही। इस पेन को रौब झाड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। आलम यह था कि चोरी छुपे कभी भाई का पेन चुरा लिया जाता था। इस बात पर मां की मार मिलती थी लेकिन बचपन का जुनून था। कहां थमने वाला। पिटने के बाद भी दोबारा वही हरकत करते थे।
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रोटोमैक पेन
रोटोमैक की यादें तो कभी धुंधली हो ही नहीं सकती। वो इस लिए क्योंकि हमारा फेवरेट सुपरस्टार जो इसके एड करता था। जी हां, सलमान खान ने एक समय रोटोमैक पेन कंपनी के खूब विज्ञापन किए। इसी का असर स्कूल में देखने को मिला। जब भी कोई दोस्त या क्लासमेट नया रोटोमैक पेन लेकर आता तो सीना चौड़ा कर दिखाते हुए सलमान खान वाला पोज देता था।
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रेनॉल्ड्स
यह पेन भी एक समय इतना खास बना की स्कूल के एग्जाम देने के लिए इसे ही लेकर जाते थे। बेधड़क चलते जाने वाला पेन समझकर इसे खूब यूज किया। सबसे खास बात यह थी कि इसका विज्ञापन दुनिया के महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने किया था। इसलिए यह सचिन की तरह इंडिया फेवरेट पेन बन गया। पेन के प्रति दीवानगी ऐसी आई कि स्कूल के बच्चे उसे चूमते हुए इस्तेमाल किया करता था।
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ग्रिप वाला पेन
पहले की सिंपल और एक ही जैसे दिखने वाले पेन की लीगेसी को तोड़ने वाले पेन भी मार्केट में आए। जी हां, हम बात कर रहे हैं ग्रिप वाले पेन की जो अपने समय में टॉप ट्रेंड बने। इनकी बनावट खास ऐसे तैयार की गई थी कि लिखते-लिखते किसी के हाथ दर्द न करें। इसके लिए पेन पर एक रबड़ की ग्रिप चढ़ी होती थी। ग्रिप पेन में सबसे ज्यादा फेमस होने वाला पेन यूं तो 'एड जेल' रहा लेकिन इसके बाद मोनटेक्स हाइग्रिप, सेलो ग्रिपर जैसे तमाम पेन मार्केट में आएं।
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सुगंध छोड़ने वाले पेन
मार्केट में नामी कंपनियों के बीच कई लोकल ब्रैंड कंपनियां भी थी जो अपना अस्तित्व बचाने के लिए लाजवाब प्रॉडक्टिविटी किया करते थे। इनमें से एक पेन आया था जो काफी पॉपुलर भी हुआ। इसकी इंक से मदहोश कर देने वाली सुंगध आती थी। इस पेन का इस्तेमाल स्पेशल ओकेजन पर ही किया जाता था जैसे क्लास टीचर को इम्प्रैस करने के लिए, या किसी दोस्त के बर्थ डे या फ्रेंडशिप कार्ड पर लिखने के लिए।
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स्पार्कल पेन
फिर जिलेटर युक्त स्पार्कल पेन का जमाना आया। स्पार्कल पेन का इस्तेमाल नोटबुक में सब हेडिंग या वर्ड हाइलाइट करने के लिए किया जाता था। इसके अलावा इस तरह के पेन को लोग शादी-ब्याह के कार्ड पर लिखने के लिए इस्तेमाल करते थे। दरअसल, शादी के कार्ड गहरे रंग के होते है इसलिए उन पर आम पेन की लिखावट उभर कर सामने नहीं आ पाती, इसलिए कार्ड पर लिखने के लिए इन्हीं पेन का चलन शुरू हो गया। इनकी लिखावट चमकदार होने के साथ-साथ आकर्षक भी होती है। ऐसे पेन ब्रैंड कंपनियों के अलावा लोकल कंपनियों ने भी बनाए।
अन्य पेन
इन सबके अलावा बाजार में कई छोटी, मझौली पेन कंपनियां भी आई। लोकल लेवल पर जहां बड़ी कंपनियों की पहुंच नहीं बन पाई वहां ये छोटी-छोटी कंपनियां ही सफल बिजनेस कर पाई।