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वो प्रेमिका से 'आई लव यू' बोले, नमाज पढ़ी और लेटते ही दम तोड़ गए, पढ़ें मौत देने के अनोखे तरीके

Wed, 27 Jun 2018 06:28 PM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
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....'आई लव यू' ये उनके आखिरी शब्द थे फिर उन्होंने नमाज पढ़ी। हत्या के दोषी चार्ल्स ब्रूक्स जूनियर ने अपनी गर्लफ्रेंड (प्रेमिका) को दूर से देखा और महसूस किया कि मौत उनकी रगो में रेंग रही है। 80 के दशक के लिबास, सुनहरी पैंट और खुले बटन की शर्ट में सफेद स्ट्रेचर पर पड़े वो डॉक्टरों से घिरे हुए थे और उनके एक हाथ में नस के जरिए जहर का इंजेक्शन लगा था। 1982 की यह घटना, वो पहला मौका था जब अमरीका में किसी अपराधी को मृत्युदंड के लिए इस तरह के घातक इंजेक्शन का इस्तेमाल किया गया। इस तरीके को अमल में लाने से पहले इलेक्ट्रिक कुर्सी पर बैठा कर मौत की सजा दी जाती थी जिसे आज व्यापक रूप से यातना माना जाता है। यह इतना हिंसक था कि कभी कभी अपराधी की आंखें बाहर निकल कर उसके गालों पर झूल जाती थीं। जहर का इंजेक्शन इस मायने में बेहतर था कि इसमें ना तो खून बहता था और ना ही चीख। पर इस तरीके पर भी सवाल उठे कि क्या ये उतना ही शांतिपूर्ण है जितना दिखाई देता है क्योंकि इस पर कोई परीक्षण नहीं किया गया।
 
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पश्चिमी देशों में ये बहस छिड़ी हुई है। मौत की सजा पाने वाले किसी इंसान को किस तरह मौत के घाट उतारा जाए कि उसे तकलीफ न हो। क्या किसी को मौत की नींद सुलाने का ऐसा तरीका है, जो बेरहम न हो? दुनिया में तमाम देश हैं जहां मौत की सजा नहीं दी जाती। भारत, दुनिया के उन देशों की सूची में शामिल है, जहां मौत की सजा दी जाती है। भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मौत की सजा बंद करने पर बहस होती रही है। भारत में सजायाफ्ता मुजरिम को मौत की सजा देने का एक ही तरीका है, फांसी। वहीं, अमरीका जैसे कई देश हैं, जो घातक इंजेक्शन के जरिए मौत की सजा पाए इंसान को मौत की नींद सुलाते हैं। तारीख के पन्ने पलटें तो सभ्यता का हजारों सालों का इतिहास मौत के घाट उतारने के ऐसे तमाम तरीकों के किस्सों से भरा पड़ा है।
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एक दौर था, जब सरेआम जुर्म की सजा दी जाती थी। सऊदी अरब से लेकर ईरान तक कई देशों में, आज भी कई जुर्मों की सजा सरेआम दी जाती है ताकि लोग सबक ले सकें। लेकिन, बात पहले के दौर की। जब मौत की सजा पाने वाले को बोरे में बांधकर खूंखार जानवरों के बीच, पानी में धकेल दिया जाता था। कई देशों में तो पीठ की तरफ से लोगों के फेफड़े निकालकर उन्हें मारा जाता था। सिर कलम करने का तरीका, मौत की सजा देने का सब से आम तरीका था। भारत में नाराज होने पर राजा-महाराजा और बादशाह एक से एक तरीके से मौत की सजा देते थे। कभी हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया जाता था तो कभी जिंदा ही दीवार में चुनवा दिया जाता था और कभी ऊंची इमारत से फेंक कर मौत की सजा दी जाती थी कई बार इंसानों को शेर या बाघ जैसे खूंखार जानवरों के बाड़े में मरने के लिए फेंक दिया जाता था।

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फारस, यानि आज के ईरान में किसी शख्स को दो नावों के बीच में दबाकर उसे शहद और दूध से नहला दिया जाता था। कीड़े उस इंसान को धीरे-धीरे खा जाते थे। अठारहवीं सदी के आखिर में फ्रांस में क्रांति की शुरुआत में फ्रेंच रईसों को बड़ी बेरहमी से मारा गया। किसी का सिर कुल्हाड़ी से काट डाला गया तो किसी का पत्थर से फोड़ कर इसे मौत के घाट उतार दिया गया। फ्रेंच क्रांति के आखिरी दिनों में गिलोटिन से फांसी दी जाने लगी। हुआ यूं था कि फ्रांस के एक डॉक्टर जोसेफ इग्नेस गिलोटिन को महसूस हुआ कि मौत की सजा देने में भी इंसानियत होनी चाहिए। डॉक्टर गिलोटिन ने एलान किया कि अब मौत के घाट उतारे जाने वाले का सिर पलक झपकते ही धड़ से अलग करने का ये तरीका ही इस्तेमाल होगा। वैसे, डॉक्टर ने गिलोटिन ईजाद नहीं किया था, मगर इसकी वकालत के चलते डॉक्टर का नाम मौत देने के इस तरीके को मिल गया।
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लेकिन, गिलोटिन से मौत की सजा कितनी कम दर्दनाक थी, इसका पता लगाने के लिए प्रयोगशाला में कुछ चूहों पर प्रयोग किए गए। कुछ प्रयोगों के लिए चूहों को ऐसे मारा जाता है। 1975 में हुई रिसर्च से पता चला कि मारे गए चूहों को 9 से 18 सेकेंड तक मरने से पहले तड़प झेलनी पड़ी। ये तजुर्बा बाद में कुछ और जानवरों पर रिसर्च में भी सही पाया गया। साफ है कि गिलोटिन से मारे जाने वाले इंसानो को भी ऐसे ही दर्दनाक लम्हों से गुजरना होता होगा। सऊदी अरब जैसे कई देश हैं, जहां अभी भी लोगों को सिर कलम कर के मौत के घाट उतारा जाता है। साल 2017 में ही सऊदी अरब में 146 लोगों का सिर काट कर उन्हें मौत की सजा दी गई। लेकिन, आज की तारीख में मौत की सजा वाले ज्यादातर देशों में लोगों को फांसी पर लटकाया जाता है।
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इसके भी दो तरीके होते हैं। पहला तरीका है कम ऊंचाई से लटकाना। इसे बेहद तकलीफदेह तरीका माना जाता है। इसमें किसी इंसान को कम ऊंचाई से लटकाया जाता है। फिर फंदा गर्दन पर कसने से उसकी दम घुटने से मौत हो जाती है। मौत की सज़ा का ये तरीका दर्दनाक माना जाता है। दूसरा तरीका है, ज्यादा ऊंचाई से झटका देकर सूली पर लटकाना। इसमें रस्सी के झटके से फांसी की सजा पाने वाले इंसान के गले की दूसरी हड्डी टूट जाती है। इससे स्पाइनल कॉर्ड यानी मेरु रज्जु, जो हमारे दिमाग को शरीर के बाकी हिस्सों के तंत्रिका तंत्र से जोड़ती है, वो टूट जाती है। इसमें एक सेकेंड से भी कम वक्त में इंसान का ब्लड प्रेशर जीरो हो जाता है। इंसान फौरन अचेत हो जाता है लेकिन उसके दिल की धड़कन रुकने में करीब 20 मिनट और समय लगता है।
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इस तरीके के साथ सबसे बड़ा मसला ये है कि इंसान की लंबाई के हिसाब से उसे कितनी ऊंचाई से लटकाया जाए, इसका एकदम सटीक गुणा-गणित लगाना होता है। अगर लंबाई ज्यादा है, तो हो सकता है कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूटे ही न और कम है, तो फिर, उसकी मौत दम घुटने से ही होगी। अमेरिका के बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में डेथ पेनाल्टी क्लिनिक चलाने वाली मेगन मैक्क्रैकेन कहती हैं कि अक्सर लंबी ऊंचाई से फांसी के मामले में लोग गलत हिसाब लगाते हैं। मरने वाला बहुत दर्दनाक वक्त से गुजरता है। अमेरिका में साल1996 के बाद से किसी को सूली पर नहीं लटकाया गया है। ज्यादातर अमेरिका राज्यों में मौत की सजा घातक इंजेक्शन के जरिए दी जाती है।

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अमेरिका में इंजेक्शन से सब से पहले मौत की सजा चार्ल्स ब्रुक्स जूनियर नाम के हत्यारे को 1982 में दी गई थी। इससे पहले अमरीका में लोगों को बिजली के झटके वाली कुर्सी पर बैठाकर मौत की सजा दी जाती थी। ये सजा कम और टॉर्चर ज्यादा थी जिसमें कई बार सजा पाने वाले की आंखें लटककर बाहर आ जाती थीं। कभी कभी सजा के वक्त बिजली के झटके से अपराधी के बालों में आग लग जाती थी। इसीलिए जब प्राण लेने वाले इंजेक्शन से मौत की सजा दी जाने लगी, तो अमेरिकी मानवाधिकार संस्थानों ने इसे मानवीय तरीका बताया। लेकिन, अब इस तरीके पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि एक तो मारने वाले घातक इंजेक्शन नहीं मिल रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ ये भी कहा जा रहा है कि इंजेक्शन देने से मरने के बीच के वक्त तक, इंसान को बहुत तकलीफ होती है।

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साल 2005 में अमरीका के इंडियानापोलिस सूबे के लियोनिडास कोनियारिस ने इस पर रिसर्च की। पता ये चला कि मौत की सजा पाने वाले कम से कम 44 फीसद लोगों को मरते वक्त इसका एहसास हो रहा था। वो बेहद तकलीफ में थे। मगर इंजेक्शन के असर से वो कुछ बोल नहीं पाए या चीख नहीं पाए। एक और रिसर्च से पता चला कि ऐसे घातक इंजेक्शन में डाली जाने वाली जिस दवा से ये उम्मीद थी कि वो दिल की धड़कनें रोक देगी, वो काम ही नहीं कर रही थी। आज ज्यादातर अमेरिका जो मौत की सजा के हक में हैं, वो ये भी चाहते हैं कि मारने का तरीका ऐसा हो कि अपराधी को तकलीफ न हो। लेकिन, घातक इंजेक्शन से मौत की सजा के कई मामले ऐसे हुए हैं, जिसमें कई कोशिशों के बाद इंसान की जान ली जा सकी।

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एक अपराधी तो मरने से पहले करीब दो घंटे तक तड़पता रहा। उसे 640 बार हिचकियां आईं। इसीलिए अब मौत की सजा देने के मानवीय तरीके तलाशे जा रहे हैं। जो लोग सैन्य अपराध या युद्ध से जुड़े रहे हैं, उन्हें इस तरीके से मौत की सजा के बारे में पता होगा। हाल ही में अमरीका के यूटा प्रांत ने फायरिंग स्क्वॉड से मौत की नींद सुलाने के तरीके को फिर से अपना लिया है। लेकिन, इसका लंबा चौड़ा इतिहास रहा है। भारत में 1857 की जंग में बागी बने तमाम हिंदुस्तानियों को अंग्रेजों ने मौत के घाट उतार दिया था। फायरिंग स्क्वॉड से मौत की सजा के लिए किसी इंसान को एक कुर्सी से बांध दिया जाता है। उसके सिर पर नकाब पहना दिया जाता है। फिर पांच निशानेबाज उसके सीने पर गोलियां दागते हैं। इनमें से एक की बंदूक खाली होती है।

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डेमो - फोटो : डेमो
अमेरिका के यूटा सूबे में 1938 में 40 साल के एक शख्स जॉन डीरिंग को कत्ल के जुर्म में फायरिंग स्क्वॉड से मौत की सजा दी गई थी। मरने से पहले जॉन डीरिंग के दिल की हरकत को रिकॉर्ड करने के लिए इलेक्ट्रो कार्डियोग्राम से जोड़ने का फैसला किया। पता ये चला कि गोली लगने के ठीक 15 सेकेंड बाद उसके दिल ने धड़कना बंद कर दिया था। हालांकि ये पता लगा पाना नामुमकिन है कि वो कितनी देर दर्द सहता रहा। मगर जानवरों पर हुए तजुर्बे बताते हैं कि इसके बाद करीब 30 सेकेंड तक चूहे तकलीफ में रहे। 1887 में अमरीका के न्यूयॉर्क राज्य में इंसान को मारने के 34 तरीकों पर एक रिसर्च हुई। इसके नतीजे बेहद डरावने थे। इस रिपोर्ट को तैयार करने वालों में से एक दांतों के डॉक्टर ने बिजली के झटके से मौत की सजा देने की सिफारिश की।

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तीन साल बाद यानि साल 1890 को पहली बार एक हत्यारे को बिजली के झटके से मौत की सजा दी गई। उस दौर में इसे मौत की सजा देने का मानवीय तरीका समझा गया था। मगर, जल्द ही इसके खराब नतीजे सामने आए और इसका विरोध होने लगा। हालांकि आज भी 9 अमेरिकी राज्यों ने पहले तरीके यानि इंजेक्शन से मौत न होने पर बिजली के झटके से मौत की सजा के विकल्प कानूनी तौर पर रखा है।ये मौत की सजा देने का सबसे नया तरीका है। हवा में 78 फीसद नाइट्रोजन होती है। हवा में अगर सिर्फ नाइट्रोजन हो तो 17-20 सेकेंड के अंदर मौत हो जाती है। जानवरों में तो 3 सेकेंड के बाद ही सांस रुकने की घटनाएं दर्ज की गई हैं। 

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विज्ञान कहता है कि हमारा शरीर हवा में ऑक्सीजन न होने की बात महसूस ही नहीं कर सकता। वर्जिश के बाद हमारे पैरों में दर्द इसलिए होता है क्योंकि कार्बन डाई ऑक्साइड ज्यादा हो जाती है। यानि हवा में सिर्फ नाइट्रोजन होगी, तो मौत दम घुटने से होगी, मगर दम घुटने का एहसास नहीं होगा। अमेरिका के बोस्टन में रहने वाले पायलट जॉन लेविनसन ने एक बार विमान उड़ाते वक्त कुछ देर के लिए ऑक्सीजन का मास्क हटा दिया। करीब 30 सेकेंड बाद उन्हें अजीब महसूस होने लगा। उन्हें दर्द या झटका तो नहीं लगा। मगर अजीब लगा। ऑक्सीजन की कमी से इंसान अचेत हो सकता है। अच्छी बात ये रही कि लेविंसन के साथ उनके ट्रेनर थे, जो उनके अचेत होने की सूरत में विमान नीचे ला सकते थे। अब 3 अमरीकी राज्यों ने मौत की सजा देने के लिए नाइट्रोजन हाइपोक्सिया को बैकअप के विकल्प पर कानूनी मान्यता दे दी है।
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अमेरिका में जानवरों के अधिकार के लिए लड़ने वाली संस्थाएं भी इसका विरोध कर रही हैं। इस तरीके से मौत की सजा देने की पहली शर्त ये है कि मरने वाला इसमें साझीदार बने। अगर वो देर तक सांस रोके रखता है तो ये तरीका उसे मौत की नींद सुलाने में काफी वक्त ले लेगा। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के डेथ पेनाल्टी इन्फॉर्मेशन सेंटर के रॉबर्ट डनहम कहते हैं कि इसके लिए पहले सजा पाने वाले को एनस्थीसिया देकर अचेत करना होगा। आज की तारीख में कोई दवा कंपनी ये नहीं चाहती कि उसकी दवा से किसी की मौत की बात आम हो। तो, फिर मसला घूम-फिरकर वहीं पहुंचता है। वो एनस्थीसिया कौन देगा, जो मरने वाले को पहले अचेत करेगा? ये कैसी विडंबना है कि लोग मौत की सजा भी देना चाहते हैं और इसे दर्दनाक भी नहीं होने देना चाहते। लेकिन, धीरे-धीरे मौत की सजा को सभ्य तरीके से देने का ख्याल समाज को आने लगा।
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