फोन का जानलेवा एडिक्शन। क्या इसके बिना रह सकते हैं? सोचकर देखिए। नहीं।
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ऐसी महिलाओं की कहानी दिखाती तस्वीर जो सिंगल मदर हैं। वो अपने बच्चे को पालने-पोसने का काम अकेले करती हैं। उन्हें अपने पार्टनर के हिस्से की भूमिका खुद ही निभानी पड़ती है।
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दिन, हफ्ते फिर महीने और फिर साल। आदमी देखता ही रह जाता है और वक्त तेजी से आकर निकल भी जाता है।
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बच्चे का बढ़ना इतना भी आसान नहीं रहा। पढ़ाई, करियर, दोस्ती-यारी हर चीज में उसके पर बंदिशें हैं। और हमारा पागलपन ये कि हम अपने बच्चे से अच्छा इंसान नहीं बल्कि बड़ा होते ही बढ़िया प्रोडक्ट बनने की उम्मीद रखते हैं।
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कभी-कभी ऐसा नहीं लगता कि हमारी हरकतें ऐसी हैं जैसे हम खुद ही अपनी धरती को आग लगाकर तबाह कर रहे हैं?
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हम सब कुछ खाने लगे हैं। पेट की जैसी चिंता ही नहीं। स्वाद के लिए पेट को कुंआ समझ लिया है। कुछ भी भर रहे हैं। इसके पता कुछ वक्त बाद ही पता चलता है।
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सड़कें जैसे जाल हो गईं हैं। वही रोज का ट्रैफिक और भाग-दौड़ से भरी जिंदगी। इसके अलावा बसें भी तो कहां?
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ये वक्त की कैसी दौड़ है? काम के लिए ऐसे फंसे रहते हैं कि बस डेडलाइन मैच करते-करते जिंदगी बसर हो रही है। इसके बीच चैन की जगह कहां बची? क्या ढूंढने पर मिलेगी?
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दिमाग को दिनभर मशीन की तरह इस्तेमाल करने की आदत में ढाल लिया है। हम ये सोच ही नहीं रहे कि दिमाग को भी आराम की जरूरत है। कुछ रचनात्मकता भी जरूरी है। ये अब कहीं खो सी गई है।
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जिम्मेदारियां निभाते हुए ऐसा भी लगने लगा है कि हमारी पीठ पर जिम्मेदारियों का जखीरा पड़ा है। हम इसे ढ़ों रहे हैं आजाद होने की उम्मीद में। है ना?
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कैमरों की भूमिका। अब ये हर जगह है। हर तरफ। सोचकर देखिए जरा।
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दिमाग को दौड़ाने के लिए उसने इस बॉटल भर पानी की तरह ही ज्ञान भरते रहते हैं।