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आज भी सफेद कागज पर अपने जिंदा होने का सबूत छोड़ती है वो, कई साल से चला आ रहा है ये सिलसिला

Fri, 26 Oct 2018 05:23 PM IST
फीचर टीम, अमर उजाला
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कागज
ये सिलसिला लगातार कई साल से चला आ रहा है। रोजाना अपने ही घर की खिड़की पर एक सफेद कागज पर वो अपने जिंदा होने का सबूत छोड़ती है और गांववाले समझ जाते हैं कि वो आज भी जिंदा है। हालांकि अजनबी लोग इसे समझ नहीं पाते। मगर जब उन्हें यह कहानी मालूम पड़ती है तो वे भी आंखें फाड़कर घर की खिड़की पर टंगे उस सफेद कागज को ताकने लगते हैं। 
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दरअसल, यह कहानी नए लोगों को बेहद अनोखी लगती है। इसलिए जिस भी नए शख्स को इसके बारे में पता चलता है वह अगले रोज उस सफेद कागज को देखने जरूर पहुंच जाता है। दरअसल, इस सफेद कागज की कहानी बेहद दर्दनाक है। पूरा गांव इससे वाकिफ है। ये दर्दभरी कहानी शुरू होती है लगभग 8 साल पहले जब कौशल्या के पति की मौत हो जाती है और उसका 47 साल का बेटा बुद्धी सिंह जिसकी मानसिक हालत सही नहीं थी 3 साल बाद घर छोड़कर चला जाता है।

लेकिन वो कहते हैं न कि एक मां की ममता कभी नहीं हारती। इसे भी अपनी ममता की जीत पर पूरा भरोसा है। वो आज भी अपने बेटे के लौटने का इंतजार कर रही है। इस उम्मीद में वो रोजाना अपने ही घर की खिड़की पर अपने जिंदा होने का सुबूत भी छोड़ती है। आप सोच रहे होंगे कि जिंदा होने का सबूत कौन देता है भला..? दरअसल, यह महिला 87 साल की हो चुकी है। ये कागज का टुकड़ा खिड़की पर इसलिए रखती है, ताकि पड़ोसी समझ सकें कि वह जिंदा है।
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हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले शाहपुर मंझग्रां में यह बुजुर्ग महिला अकेले गुरबत के दिन काट रही है। 87 साल की बुजुर्ग महिला कौशल्या पठानिया की हालत ऐसी हो गई है कि अब न तो वो ज्यादा बोल पाती हैं और न हीं इन्हें ठीक से दिखाई देता है। बीते कई साल से वह घर में अकेली ही रहती है। जंगल में एक झौपड़ीनुमा कच्चे मकान में इनका रहना हो रहा है। 

कौशल्या कभी अपने भरे-पूरे परिवार, यानी सास-ससुर, पति एक बेटे और दो बेटियों के साथ यहां रहती थीं। आज सिवाए उनके यहां कोई नहीं रहता। वक्त ने उनकी हंसती खेलती जिंदगी को बिलकुल बदल दिया। फिलहाल, कौशल्या के आंसू पोछने वाला कोई नहीं है। ऐसे में इसके दुख-दर्द के साथी इसकी खुद की पुरानी यादें ही हैं। उम्र के साथ-साथ कौशल्या की याददाश्त भी साथ छोड़ रही है। 

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जिंदगी में इतना बड़ा तूफान आने के बावजूद कौशल्या के इरादे इतने मजबूत हैं कि वह सोने से पहले अपनी खिड़की की खूंटी पर एक कागज टांग देती है और उसे सुबह उठा लेती है। वह ऐसा इसलिए करती हैं ताकि लोग ये जान जाए कि वह अभी जिंदा है। वह गांव वालों के समझाती है कि जिस दिन कागज खिड़की पर रह जाए तो समझ लेना उसकी मौत हो चुकी है। 

वाकई कौशल्या की दिनचर्चा बहुत अनोखी है। कौशल्या अपनी जुबां से ये किसी को भी अपनी बात समझा पाने में असमर्थ है मगर सोच इतनी गहरी है कि आप इसका अंदाजा नहीं लगा सकते। इसलिए इनकी बात हर आम से भी खास है। दरअसल, 87 साल की इस बुजुर्ग महिला के प्रति समाज और सरकार को अवगत कराने के लिए हिमाचल हाईकोर्ट में उसकी जिंदगी से संबंधित एक याचिका भी दायर की गई।
 
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इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा संज्ञान लेते हुए लोअर कोर्ट को कौशल्या के घर जाकर इस मामले की पुष्टि करने के आदेश भी जारी किए थे, जिस पर संज्ञान लिया जा रहा है। ताज्जुब करने वाली बात यह है कि जो सरकार सैकड़ों योजनाएं चला रही है उनमें से किसी भी योजना का लाभ यह महिला नहीं ले पा रही है। उनके पास न तो किसी योजना का कार्ड है और न ही उसे उनका लाभ मिल पाया है। बताया जा रहा है कि एक फिल्ममेकर कौशल्या की जिंदगी पर एक शॉर्ट फिल्म बनाने की सोच रहे हैं। 
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