इस आदमी को इंडियाज मेनस्ट्रऐशन मैन कहा जाता। आप इसकी कहानी जानेंगे तो हैरत में पड़ जाएंगे कि इतना कोई शख्स कैसे झेल सकता है। अरूनाचलम मुरूगननथनम राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित एक सोशल ऑनटरप्रेन्योर हैं। वो भारत के राज्य तमिलनाडु के कोयंबटोर के रहने वाले हैं। वो बिल्कुल एक आम आदमी ही थे। लेकिन उनके काम ने उन्हें खास बना दिया।
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- फोटो : oddity central
अरूनाचलम के पिता तब चल बसे थे जब वो 14 साल के थे। इस वजह से घर की आर्थिक जिम्मेदारी उन पर आ गई जिस वजह से उन्हें बचपन में ही स्कूल छोड़ना पड़ा। बड़े होने पर शादी भी हुई। एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी को काफी खराब कपड़े को मासिक चक्र में इस्तेमाल किए जाने वाले पैड की तरह काम में लाते देखा। उन्होंने फौरन अपनी पत्नी से इस तरह के गंदे कपड़े को इस्तेमाल करने से मना किया।
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उन्हें तभी ही इस बात का अहसास हुआ कि उनके गांव में इतनी गरीबी और अज्ञानता है कि हर महिला महंगे पैड्स खरीद नहीं सकती। इसलिए वो खराब कपड़े से लेकर बार-बार तक कपड़े को धोकर उसे मासिक धर्म में इस्तेमाल में लाती थीं। उनका पैड कभी लकड़ियों के चूरे से बनता था तो कभी राख से। इस वजह से कई औरतों की इंफेक्शन के कारण मौत भी होती थी या प्रेंगनेंसी के दौराप दिक्कतें आती हैं।
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उन्होंने तय किया कि वो एक अच्छा और सस्ता पैड तैयार करेंगे। पहले उन्होंने अपने हिसाब से पैड बनाया और अपनी पत्नी को इसे पहनकर बताने को कहा। लेकिन सही परिणामों के लिए वो हर बार एक-एक महीने का इंतजार नहीं कर सकते थे। फिर उन्होंने एक दूसरे तरह के पैड को तैयार किया और पास के एक इंटर कॉलेज में लड़कियों से बड़ी हिम्मत जुटाकर इसे इस्तेमाल करने और परिणाम बताने को कहा।
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पर कॉलेज की लड़कियां सही जवाब देने में काफी शरमा रही थीं। वो उनपर भी निर्भर नहीं रह सकते थे। ऐसे में उन्होंने अपना एक्सपेरिमेंट बंद नहीं किया। गांव के कुंए या खेत के पास ऐसा काम करने से लोगों ने उन्हें पागल कहना भी शुरू कर दिया। लोगों ने उन्हें गांव से निकालने की भी कोशिश की। लेकिन अच्छा पैड बनाने की लगन उन्हें ऐसी चढ़ी कि इसके बाद लगातार इस काम को करते ही रहे।
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तंग आकर उनकी पत्नी भी उन्हें छोड़ कर चली गई। हैरान करने वाली बात थी कि जिस बीवी की दिक्कत को देखकर उन्होंने सभी औरतों के लिए सुरक्षित और सस्ते पैड्स बनाने का तरीका सोचने की ठानी, वो प्रेरणा ही चली गई। पर फिर भी अरूनाचलम ने हार नहीं मानी। वो कई तरह के पैड बनाते और उसको खुद ही पहकनर देखते।
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अब आप सोच रहे होंगे कि बिना मासिक धर्म के वो पैड की गुणत्ता को टेस्ट कैसे करते होंगे। आप यकीन नहीं मानेंगे उन्होंने एक फुटबॉल के अंदर के ब्लैडर को महिलाओं के यूटरस के रूप में तैयार किया। उससे एक ऐसी थैली जोड़ी जिसमें बकरी का खून भरा करते थे। आखिर में इस थैली को पैड से जोड़ा। इसके बाद उसे अपने शर्ट के अंदर बांधते थे और खूब साइकिल चलाते थे। साइकिल चलाते थे ताकि ब्लैडर पर जोर पड़े और प्रेशर से वो खून को थैली से होते हुए पैड तक पहुंचाए।
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इसका हल उन्होंने हर मुमकिन तरीके से निकाला। पर चार सालों बाद भी उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी। उन्होंने फिर भी घुटने नहीं टेके। एक ऐसे टीचर के यहां काम करना शुरू किया जो उनके बनाए गए प्रोडक्ट्स को सीधे कंपनियों से जंचवा सके और उन्हें सही फीडबैक दे सके।
काफी सालों बाद उन्हें सफलता मिली। उन्होंने धीरे-धीरे ही सही पैड बनाने के तरीके और कंपनी खड़ा करने लायक संसाधन मिल सके। उन्होंने लोगों को धीरे-धीरे नौकरियां दीं और सफल हुए। अब वो दिन आ चुके हैं जब उनकी कंपनी कई नाम से तरह-तरह के पैड बनाती है। उनकी पत्नी भी उनके पास वापस लौट चुकी हैं और वो कई आईआईएम जैसे कॉलेजों में जाकर नए टेकीज को अपने काम के आइडिए और सफर को बताते हैं।