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सर्दियों में लोग इतने तन्हा क्यों हो जाते हैं, अगर जान लिए ये पांच अजीब कारण तो होगी बड़ी हैरानी

Thu, 18 Oct 2018 12:53 PM IST
बीबीसी हिंदी
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lonely women walk in winter
जब भी आप किसी के अकेलेपन का तसव्वुर करते हैं, तो आम तौर पर किसी बुजुर्ग का विचार आता है, जो अकेले जिंदगी बसर कर रहा है, जिसकी किसी से मेल-मुलाकात नहीं होती। अकेलापन महसूस करने के बारे वास्तविकता वो नहीं है जो कि बहुत से लोग सोचते हैं। क्लाउडिया हैमंड ने 'बीबीसी अकेलापन प्रयोग' नाम से एक सर्वे किया, जिसमें इसके पांच विपरीत परिणाम मिले।

बीबीसी के इस सर्वे के मुताबिक, 75 साल से ज्यादा उम्र के 27 फीसदी लोगों ने माना था कि वो अक्सर अकेलापन महसूस करते हैं। ये किसी और सर्वे के मुकाबले बहुत ज्यादा है, लेकिन, यहां ध्यान रखना चाहिए कि ये सर्वे ऑनलाइन हुआ था तो, शायद ज्यादा ऐसे लोग इस में शामिल हुए, जो तन्हा थे।
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person sitting near sea
1. बुजुर्गों के मुकाबले युवा ज्यादा अकेलापन महसूस करते हैं-

फिर भी, सर्वे के अनुसार सबसे ज्यादा अकेलापन 16-24 साल के युवा कर रहे थे। ऐसे 40 प्रतिशत लोगों का कहना था कि वो अक्सर अकेलापन महसूस करते हैं। सवाल ये उठता है कि इतनी बड़ी तादाद में युवा क्यों अकेलापन महसूस करते हैं। शायद वो अपने तन्हा होने की हकीकत को स्वीकार करने को ज्यादा राजी हैं। बुजुर्गों को अपना अकेलापन स्वीकार कराने के लिए इस बात पर जोर देना पड़ता है।

लेकिन, इन बुज़ुर्गों ने भी सर्वे में यही बताया कि वो तब सब से तन्हा महसूस करते थे, जब युवा थे। यानी हम ये नहीं कर सकते है कि आज की जो जीवनशैली है, वो युवाओं को तन्हाई का अहसास करा रही है। आमतौर पर 16-24 बरस की उम्र को खिलंदड़पन की उम्र माना जाता है।

लोगों को आजादी का एहसास होता है। वो इस दौरान स्कूल की पढ़ाई से फारिग हो कर कॉलेज या यूनिवर्सिटी में जाते हैं। मनमर्जी की जिंदगी जीते हैं, लेकिन, उम्र का ये दौर बदलाव का भी होता है। युवाओं को पढ़ाई के लिए घर से दूर जाना पड़ता है। कई बार नई नौकरी की शुरुआत करनी पड़ती है। नए लोगों से मुलाकात होती है। नए दोस्त बनाने की चुनौती होती है।

ये वो दौर भी होता है जब दुनिया में अपनी हस्ती के बारे में लोग अपने खयाल गढ़ रहे होते हैं। वो ये जान-समझ रहे होते हैं कि आखिर वो कौन हैं। उनकी किसी माहौल में अहमियत और हैसियत क्या है। इस दौरान तन्हाई का जो एहसास होता है, उससे निपटने के तरीके अक्सर युवाओं को नहीं मालूम होते। वो दोस्त बनाने में भी मुश्किल महसूस करते हैं।
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lonely man in room
2. 41 प्रतिशत लोग सोचते हैं कि अकेलापन अच्छी बात है-

मरहूम न्यूरोसाइंटिस्ट जॉन कैचिओप्पो जैसे बहुत से लोग मानते हैं कि अकेलापन भी काम की चीज है। भले ही इसका तजुर्बा खराब हो। इंसान सामाजिक प्राणी है। जब उसे अकेलेपन का एहसास होता है, तो वो नए दोस्त-साथी तलाशता है। पुराने रिश्तों मे नई जान फूंकने की कोशिश करता है।

दिक्कत ये है कि अकेलापन कई बार गंभीर बीमारी का रूप ले लेता है। ये हमारी सेहत पर गहरा असर डालता है। अगर किसी को एक साल या इससे ज्यादा वक्त तक अकेलापन महसूस होता रहा, तो इससे डिप्रेशन भी हो सकता है।

हालांकि हमारे सर्वे में शामिल 41 फीसदी लोगों ने कहा कि अकेलेपन से फायदा भी हो सकता है लेकिन, जो लोग अक्सर तन्हा महसूस करते थे, उन में से केवल 31 प्रतिशत ने माना कि इस के लाभ हैं। असल में तो अकेलापन इतनी बुरी चीज है कि लंबे वक्त तक तन्हाई का एहसास आप का तनाव बढ़ा देता है। इस के बाद इसके किसी फायदे का एहसास खत्म हो जाता है।

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कॉन्सर्ट में जमा भीड़
3. अकेलापन महसूस करने वाले भी समाज के दूसरे लोगों जैसे ही होते हैं-

कई बार ये माना जाता है कि लोग इसलिए अकेलापन महसूस करते हैं कि वो दोस्त नहीं बना पाते। नए रिश्ते कायम करने में नाकाम रहते हैं। पर, ऐसा नहीं है। समाज में लोगों से हेल-मेल की कुंजी ये है कि हम ये बता सकें कि लोग कैसा महसूस कर रहे हैं। इसी आधार पर आप उनसे बात कर पाते हैं। कई बार आप कुछ ऐसी बात जाने-अनजाने में बोल देते हैं, जिससे लोगों को ठेस लगती है। वो कट जाते हैं।

ऐसे लोगों से हाव-भाव के जरिए संवाद बैठाया जा सकता है। जज्बातों का लेन-देन करने के लिए कई बार शब्द काम नहीं आते। हाव-भाव, आंखों के इशारे काम आते हैं। ऐसे मामलों में चाहे वो लोग हों जो आसानी से सब से घुल-मिल जाते हैं, या फिर वो लोग जो तन्हा रह जाते हैं, सब का हाल एक जैसा है। होता असल में ये है कि लोग तन्हाई के हालात का ठीक से सामना नहीं कर पाते और अकेले पड़ते जाते हैं। यानी उनके लिए दूसरों से संवाद करना मुश्किल हो जाता है।

 
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lonely lady
4. दूसरे मौसमों की तरह सर्दियां भी तन्हाई में गुजरती हैं-
सर्दियों के दिनों में लोग ज्यादा तन्हा महसूस करते हैं। कम से कम माना यही जाता है। बुजुर्गों की मदद करने वाली संस्थाएं इस दौरान ज्यादा सक्रिय दिखाई देती हैं। ये छुट्टियों का वक्त होता है। लोग एक-दूसरे के साथ वक्त बिताते हैं। ऐसे में कोई अकेला है, तो उसे तन्हाई ज्यादा सताती है, क्योंकि आस-पास के लोग एक दूसरे के साथ हंसते-बतियाते दिखते हैं।

मगर, हमारे रिसर्च में पता ये चला कि अकेलेपन का एहसास जितनी शिद्दत से सर्दियों में होता है, उतनी ही शिद्दत से बाकी सीजन में भी होता है। सर्दी-गर्मी के मौसम का अकेलापन महसूस होने से कोई खास ताल्लुक नहीं है। हां, कुछ लोगों को जरूर ऐसा एहसास होता है, क्योंकि पश्चिमी देशों में सर्दियों के दिन लंबी छुट्टियों और त्यौहारों वाले होते हैं। जब लोग अपनों से, परिजनों-दोस्तों से मिलते-जुलते हैं। ऐसे में तन्हाई काटने को दौड़ती है। यही हाल गर्मियों की छुट्टियों के दौरान भी होता है। इसलिए अकेलेपन को किसी खास मौसम से जोड़ना ठीक नहीं होगा।
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sitting under the tree
5. जो लोग अकेलापन ज्यादा महसूस करते हैं, उनके दिल में दूसरों के लिए ज्यादा हमदर्दी होती है-
बीबीसी के सर्वे में हमदर्दी को दो पैमानों पर मापा गया था। पहला तो ये कि लोग दूसरों के शारीरिक दर्द को किस तरह से महसूस करते हैं। अगर किसी ने अपनी गलती से खुद को तकलीफ पहुंचा ली। जैसे दरवाजे पर पैर फंसा लिया, या किसी को बर्र ने काट खाया, तो आप कितनी हमदर्दी रखते हैं।

दूसरा पैमाना किसी इंसान की सामाजिक तकलीफ के एहसास को साझा करने का था। जैसे किसी को उसके साथी ने छोड़ दिया। हमारे सर्वे से पता ये चला कि अकेलेपन के शिकार लोगों की हमदर्दी और जो लोग तन्हाई में नहीं थे, उनके जज्बात भी एक जैसे ही थे। हां, जो लोग तन्हाई महसूस कर रहे थे, उन्हें दूसरों के दर्द का अहसास भी ज्यादा हो रहा था। शायद इसकी वजह ये थी कि वो ख़ुद तन्हाई के दर्द के शिकार थे। ऐसे में उन्हें दूसरे की तकलीफ का एहसास भी ज्यादा हुआ। क्योंकि सामने वाला भी उन्हें अपने जैसे हालात का शिकार लगा।
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