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देखिए देश के 7 अजीबोगरीब मंदिर, कहीं चूहों की पूजा तो कहीं मोटरसाइकिल की, मान्यताएं दिलचस्प हैं

Tue, 26 Jun 2018 01:41 PM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
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आपने मंदिरों में लोगों को देवी-देवताओं की मूर्तियां पूजते हुए तो देखा होगा लेकिन आज हम आपको घर बैठे ऐसे मंदिरों के दर्शन कराने वाले हैं जहां के भगवान को देखकर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे। दरअसल, यहां देवी-देवताओं की मूर्तियां नहीं बल्कि कुछ ओर ही पूजा जाता है। इन्हें देखकर आपको भी यकीन नहीं होगा। एक बात और... ऐसा किए जाने के पीछे हर मंदिर की अपनी एक खास कहानी है।  
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करणी माता का मंदिर बीकानेर
इस मंदिर में होती है चूहों की पूजा, यहां रहते है 20000 चूहे
यहां 20000 से ज्यादा चूहे रहते हैं। इस मंदिर में चूहों का झूठा प्रशाद ही भक्तो को दिया जाता हैं। सबसे बड़ी चौका देने वाली बात यह है की इतने चूहे होने के बाद भी यहां पर कोई बीमारी नहीं फैलती और न ही मंदिर परिसर में कोई बदबू है। चूहों से प्लेग की बीमारी फैलने का डर होता है लेकिन इस मंदिर में आज तक कोई भी भक्त चूहों का झूठा खाने के बावजूद बीमार नहीं हुआ है। यह मंदिर है करणी माता का मंदिर जो राजस्थान के शहर बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित हैं। इस मंदिर को चूहों वाली माता का मंदिर और चूहों वाला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। करणी माता का मंदिर बीकानेर रिसायत के महाराजा गंगा सिंह ने बीसवीं शताब्दी में बनवाया था। करणी माता को बीकानेर घराने की कुलदेवी के रूप में भी पूजा जाता है।







 
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चाइनीज काली मंदिर, कोलकाता
चाइनीज काली मां का मंदिर जहां प्रसाद में मिलती है नूडल्स
चाइनीज काली मां का मंदिर कोलकाता के 'टैंगरा' में स्थित है जो 60 साल पुराना बताया जाता है। इस जगह को चाइनाटाउन भी कहते हैं। इस मंदिर में स्थानीय चीनी लोग पूजा करते हैं। यहां भक्तों को प्रसाद में नूडल्स और फ्राइड राइस बांटा जाता है। मां को चाइनीज व्यंजन का भोग लगता है और फिर यही प्रसाद के रूप में भक्तों के बीच वितरित किया जाता है। इसी वजह से इस मंदिर का नाम चाइनीज काली मां पड़ गया है। 55 साल के इसोन चेन इस मंदिर की देखभाल करते हैं।

इस मंदिर के पीछे एक कहानी बताई जाती है जिसमें बताया जाता है कि इस मंदिर से एक चीनी बच्चे का जुड़ाव भी रहा है। दरअसल, इस मंदिर में काफी समय से बीमार चल रहे एक चीवी बच्चे को लाया गया था। यहां आते ही उसकी बीमारी खत्म हो गई। इसके बाद चीनी लोगों का विश्वास इस मंदिर के प्रति काफी गहरा हो गया।

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Shani mandir
इस शनि मंदिर में केसरिया रंग की धोती पहनना जरूरी
महाराष्ट्र के शिगंणापुर नामक गांव में शनिदेव का मंदिर स्थित है। यह मंदिर महाराष्ट्र के अहमदनगर से लगभग 35 कि.मी. की दूरी पर है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थित शनिदेव प्रतिमा बगैर किसी गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजमान है।
इसके साथ ही इस गांव की एक खास बात है कि यहां किसी भी घर में ताला नहीं लगाया जाता। माना जाता है कि यहां के सभी घरों की सुरक्षा स्वयं शनिदेव करते हैं। कहा जाता है कि यहां पर शनिदेव की पूजा के लिए सभी भक्तों को शरीर को केसरिया रंग की धोती पहनना जरूरी होता है। इसके साथ ही शनिदेव का अभिषेक गीले वस्त्रों में ही किया जाता है।
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अमरनाथ मंदिर में छिपा अमरत्व का रहस्य 

अमरनाथ मंदिर शिव भगवान के सभी मंदिरों में से सबसे प्रमुख है। इस मंदिर में भगवान शिव की शिवलिंग खुद ही निर्मित हो जाती है और इसका आकार घटता बढ़ता रहता है। मान्यता है कि अमरनाथ गुफा में महादेव शिव का वास है। यह हिंदुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। यह तीर्थ जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 145 किमी दूर, समुद्र तल से 3888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां स्वत: ही हिम शिवलिंग का निर्माण होता है। अमरनाथ मंदिर व यात्रा का इतना महत्व क्यों है, इसके पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख मिलता है।

माना जाता है, कि एक बार माता पर्वती ने भगवान शिव से अमरता के रहस्य के बारे में जानने की उत्सुकता प्रकट की। पहले तो भगवान शिव ने बताने से मना कर दिया, लेकिन माता पर्वती के बार-बार अनुरोध करने पर वे मान गए। लेकिन इसे कोई और न जान पाए, इसलिए भगवान शिव और माता पार्वती एकांत के लिए हिमालय पर्वत श्रेणियों की ओर चल दिए। भगवान शिव ने गोपनीयता बनाएं रखने के लिए सबसे पहले पहनगाम में नंदी (बैल) का त्याग किया, फिर अपनी जटाओं से चंद्रमा को चंदनबाड़ी में मुक्त किया, गले से सर्पों को शेषनाग चोटी पर और गणेश को महागुणस की पहाड़ी पर छोड़ देने का निश्चय किया।

इसके बाद पंचतरणी पर पंच तत्व- धरती, वायु, आकाश, अग्नि व जल का परित्याग कर भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ एक गुफा के अंदर प्रवेश किया है। वहां भगवान शिव ध्यान मुद्रा में लीन हो गए , तथा आस-पास अग्नि को प्रज्वलित कर दिया, ताकि अन्य कोई प्राणी इस रहस्य को न जान पाए और फिर माता पार्वती को अमरता का रहस्य बताना प्रारंभ किया। लेकिन महादेव शिव के आसन के नीचे कबूतर के अंडे इस अग्नि से भस्म नहीं हुए और उनमें से निकलकर कबूतर के जोड़े ने पूरी कथा को सुनकर अमरत्व का मंत्र जान लिया। आज भी तीर्थयात्रियों को गुफा के अंदर कबूतर का जोड़ा दिखाई देता हैं, जिन्हें अमर पक्षी माना जाता है। चूंकि अमरता के रहस्य का वर्णन इस गुफा के अंदर हुआ था, इसलिए इसे अमरनाथ गुफा कहा जाने लगा।
 
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काल भैरव मंदिर, उज्जैन
यहां मूर्ति करती है मदिरापान
क्या मूर्ति मदिरापान कर सकती...आप कहेंगे नहीं, कतई नहीं। भला मूर्ति कैसे मदिरापान कर सकती है। मूर्ति तो बेजान होती है। लेकिन उज्जैन के काल भैरव के मंदिर में ऐसा नहीं होता। वाम मार्गी संप्रदाय के इस मंदिर में काल भैरव की मूर्ति को न सिर्फ मदिरा चढ़ाई जाती है, बल्कि बाबा भी मदिरापान करते हैं । 

उज्जैन...महाकाल के इस नगर को मंदिरों का नगर कहा जाता है। यहां एक विशेष मंदिर है- काल भैरव का मंदिर। यह मंदिर महाकाल से लगभग पांच किलोमीटर की दूरी पर है। काल भैरव का यह मंदिर लगभग छह हजार साल पुराना माना जाता है। यह एक वाम मार्गी तांत्रिक मंदिर है। वाम मार्ग के मंदिरों में मांस, मदिरा, बलि, मुद्रा जैसे प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। प्राचीन समय में यहां सिर्फ तांत्रिकों को ही आने की अनुमति थी। वे ही यहां तांत्रिक क्रियाएं करते थे और कुछ विशेष अवसरों पर काल भैरव को मदिरा का भोग भी चढ़ाया जाता था। कालान्तर में ये मंदिर आम लोगों के लिए खोल दिया गया, लेकिन बाबा ने भोग स्वीकारना यूं ही जारी रखा। 
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ओम बन्ना मंदिर
इस मंदिर में होती है बाइक की पूजा
यह मंदिर राजस्थान के जोधपुर में स्थित है। अन्य मंदिरों की तुलना में ओम बन्ना मंदिर की सबसे अलग बात है क्योंकि इसमें पूजी जाने वाले कोई भगवान की मूर्ति नहीं है बल्कि एक मोटरसाइकिल है। दरअसल, इस मंदिर के पीछे एक कहानी है जो आपको बेशक चौंका देगी। जोधपुर-पाली हाईवे नंबर 65 पर स्थित जोधपुर से 45 किलोमीटर और पाली जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर की दूरी पर चोटिला गांव के पास स्थित है बुलेट वाले बाबा ओम बन्ना का स्थान। ये मंदिर सिर्फ राजस्थान में ही नहीं बल्कि पुरे भारत में मशहूर हो चला है।

ओम बन्ना का जन्म राजस्थान के पाली के चोटिला गांव में 5 मार्च, 1965 में ठाकुर जोगसिंह राठौड़ के घर हुआ। इन बाबा का वास्तविक नाम ओम सिंह राठौड़ था। कहा जाता है बचपन में ही एक पंडित ने इनके बारे में कहा था कि यह बालक एक दिन अपने कुल का नाम सम्पूर्ण देश रोशन करवाएगा। ओम बन्ना के पिता चोटिला के सरपंच थे और वे उनकी इकलौती संतान होने के कारण घर में सभी के लाडले थे। जिस जमाने में लोगों के पास साइकिल भी नहीं हुआ करती थी, उस समय ओम बन्ना के पास रॉयल एनफील्ड बुलेट मोटर साइकिल हुआ करती थी जो ओम बन्ना को बहुत अधिक प्रिय थी।

बताया जाता है 2 दिसम्बर, 1988 को ओम बन्ना अपनी बुलेट RNJ 7773 द्वारा अपने ससुराल बगड़ी सांडेराव से अपने गांव चोटिला लौट रहे थे कि पाली जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर पहले चोटिला के पास ही रात के समय उनकी बुलेट का संतुलन खराब हो गया और वो सड़क किनारे एक पेड़ से टकरा गई और वहीं पर ओम बन्ना की मृत्यु हो गई।

पुलिस ने घटना स्थल पर पहुंच कर बन्ना की बाइक अपने कब्जे में ले ली और उनका शरीर परिवार वालों को सौंप दिया पर सुबह बुलेट मोटर साइकल थाने से गायब मिली। जब खोजा गया तो बुलेट दुर्घटना स्थल पर मिली। थानेदार ने सोचा कि अब की बार बुलेट का सारा पेट्रोल निकाल दिया जाए तो सही रहेगा। उसने ऐसा ही किया और तो और बाइक को चैन से बंधवा दिया ताकि वह फिर से चोरी न हो सके। क्योंकि इसमें पुलिस की ही बदनामी थी। लेकिन इसके बाद अगले दिन बुलेट बाइक फिर से थाने से गायब मिली। तलाशा गया तो वह बाइक उसी स्थान पर मिली जहां ओम बन्ना का एक्सीडेंट हुआ था। 

इस घटना को जानकर पिता जोगसिंह ने पुत्र की आत्मा की इच्छा समझकर दुर्घटना स्थल पर एक चबूतरा बनवाया और बुलेट मोटर साइकिल को वहीं खड़ी करवा दिया और ओम बन्ना का मंदिर बनवा दिया। लोगों का मानना है जिस दिन से ये मंदिर बना है इस मार्ग पर कोई दुर्घटना नहीं हुई है। अब इस मंदिर पर बाबा ओम बन्ना के जन्मतिथि और पुण्यतिथि दोनों दिन मार्गशीष शुक्ला अष्टमी का मेला लगता है। लोग मन्नते मांगते है और जो भी यहां से गुजरता है यहां रूककर जरूर जाता है।
 
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भारत में एकमात्र ब्रह्मा जी का मंदिर
भगवान ब्रह्मा को इस संसार का रचनाकार कहा जाता है लेकिन फिर भी भारत में उनका सिर्फ एक ही मंदिर है। ऐसा इसलिए क्योंकि ब्रह्मा जी की पत्नी सावित्री ने उन्हें श्राप दिया था। यही कारण है कि ब्रह्मा जी का देश में एक ही मंदिर है जो कि राजस्थान के प्रसिद्ध तीर्थ पुष्कर में स्थित है। सावित्री ने अपने पति ब्रह्मा को ऐसा श्राप क्यों दिया था इसका वर्णन पद्म पुराण में मिलता है।

ब्रह्मा जी को क्यों दिया गया श्राप
हिन्दू धर्मग्रन्थ पद्म पुराण के अनुसार धरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने उत्पात मचा रखा था। उसके बढ़ते अत्याचारों से तंग आकर ब्रह्मा जी ने उसका वध कर दिया। लेकिन वध करते समय उनके हाथों से तीन जगहों पर कमल का पुष्प गिरा, इन तीनों जगहों पर तीन झीलें बन गई। इस घटना के बाद इस स्थान का नाम पुष्कर पड़ गया और ब्रह्मा ने संसार की भलाई के लिए यहां एक यज्ञ करने का फैसला किया। ब्रह्मा जी यज्ञ करने के लिए पुष्कर पहुंच गए लेकिन उनकी पत्नी सावित्री जी समय पर नहीं पहुंच सकीं। यज्ञ को पूर्ण करने के लिए उनके साथ उनकी पत्नी का होना जरूरी था, लेकिन सावित्री जी के नहीं पहुंचने की वजह से ब्रह्मा जी ने गुर्जर समुदाय की एक कन्या 'गायत्री' से विवाह कर इस यज्ञ को शुरू किया। उसी दौरान देवी सावित्री वहां पहुंची और ब्रह्मा के बगल में दूसरी कन्या को बैठा देख क्रोधित हो गईं। 

उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि देवता होने के बावजूद कभी भी उनकी पूजा नहीं होगी। सावित्री के इस रुप को देखकर सभी देवता डर गए। सभी ने सावित्री जी से विनती की कि अपना श्राप वापस ले लीजिए, लेकिन उन्होंने किसा की न सुनी। जब गुस्सा ठंडा हुआ तो सावित्री ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में ही आपकी पूजा होगी। कोई भी आपका मंदिर बनाएगा तो उसका विनाश हो जाएगा। भगवान विष्णु ने भी इस काम में ब्रह्मा जी की मदद की थी। इसलिए देवी सरस्वती ने विष्णु जी को भी श्राप दिया था कि उन्हें पत्नी से विरह का कष्ट सहन करना पड़ेगा। इसी कारण भगवान विष्णु ने राम के रुप में मानव अवतार लिया और 14 साल के वनवास के दौरान उन्हें पत्नी से अलग रहना पड़ा था।
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