आपने देवी-देवताओं के मंदिर तो खूब देखें होंगे जहां लोग अपने-अपने भगवान को पूजते हैं लेकिन क्या आपने ऐसे मंदिर देखें हैं जहां देवी-देवताओं की नहीं बल्कि कुत्ते की पूजा होती है? बेशक यह आस्था से जुड़ा मामला है। कुत्तों के ये मंदिर भी लोगों की आस्था के प्रतीक है।इन मंदिरों से लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। यहां हजारों लोग आते हैं और किसी धार्मिक स्थल के जैसे ही शीश नवाते हैं। कुत्तों के इन मंदिरों से जुड़ी कई रोचक किस्से- कहानियां भी प्रचलित हैं। जो शायद आपने भी सुनी होगी। लेकिन अगर आप ऐसे मंदिरों से अब तक अनभिज्ञ रहे हैं तो ये ज्ञान अर्जित करना आपके लिए और भी जरूरी है।
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100 साल पुराना है एक कुत्ते के मंदिर का इतिहास
बुलंदशहर से 15 किमी. दूर औद्योगिक क्षेत्र सिकंदराबाद में करीब 100 साल पुराना एक ऐसा मंदिर है, जहां कुत्ते की कब्र की पूजा होती है। होली, दीपावली को यहां मेला सजता है। सावन और नवरात्रों में भण्डारों का भी आयोजन होता है। ऐसी मान्यता है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। कहावत प्रचलित है कि करीब 100 साल पहले लटूरिया बाबा रहते थे और उनके साथ एक कुत्ता भी रहता था। माना जाता था कि लटूरिया बाबा के पास सिद्धिया थी लेकिन बाबा को आंखों से दिखाई नहीं देता था। बाबा को अगर कोई सामान मंगाना होता तो वह अपने कुत्ते की मदद लेते थे। उनका यह कुत्ता कोई साधारण कुत्ता नहीं था।
वह इतना समझदार था कि जब बाबा उसके गले में में थैला डाल देते थे तो वह बाजार जाता था और उसमें उनके लिए सामान लेकर आ जाता था। तकरीबन 100 साल पहले बाबा ने जब यहां पर समाधि ली तो कुत्ता भी उस ही समाधि में उनके साथ कूद गया। लोगों ने कुत्ते को बाहर निकाल लिया, लेकिन कुत्ता फिर से उसमें कूद गया। लोगों ने बाबा की समाधि से कुत्ते को कई बार निकाला, लेकिन कुत्ते ने खाना-पीना छोड़ दिया। लटूरिया बाबा ने प्राण त्यागने से पहले कहा था कि भविष्य में जब कभी मेरी पूजा हो तो मुझसे पहले इस इस कुत्ते की पूजा होगी। तभी से यहां पर इस कुत्ते की पूजा शुरू हो गई। बताया जाता है कि कुत्ते के पैर में काला धागा बांधने से मांगी गई मुराद पूरी हो जाती है।
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चिपियाना गांव का भैरव मंदिर
गाजियाबाद के नजदीक चिपियाना गांव का भैरव मंदिर आसपास के इलाके में अपनी अलग पहचान रखता है। यहां मंदिर परिसर में बनी कुत्ते की समाधि पर लोग पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। कुत्ते की समाधि के पास एक हौदी बनी हुई है। मान्यता है कि हौदी में नहाने से रैबीज की बीमारी, बंदर के काटने, फोड़े और फुंसी जैसे रोग का असर समाप्त हो जाता है। यहां बनी कुत्ते की प्रतिमा पर लोग प्रसाद चढ़ाते हैं और उसे एक-दूसरे को बांटते हैं। कुत्ते की पूजा को लेकर एक मान्यता ये भी है कि बाबा काल भैरव की सवारी कुत्ता है। इसलिए यहां पर कुत्ते की पूजा-अर्चना की जाती है।
मान्यता है कि यहां भैरव मंदिर में जिस कुत्ते की प्रतिमा बनी है उसकी असल कहानी एक बंजारे से जुड़ी है। कहते हैं कि करीब 100 साल पहले लक्खा नाम के बंजारे ने ही भैरव मंदिर के अंदर ही एक स्थान पर इस कुत्ते की समाधि बनवाई थी। इस समाधि के बारे में प्रचलित है कि बंजारे के पास एक कुत्ता था। बंजारे ने एक सेठ से कुछ कर्ज उधार लिया था। समय पर कर्ज न चुका पाने के कारण उसने अपना कुत्ता सेठ के पास गिरवी रख दिया। कुछ दिन बाद सेठ के घर चोरी हुई। कुत्ता बदमाशों पर न तो भोंका और न ही सेठ को जगाया। सुबह सेठ को जब चोरी होने का पता लगा तो उसे कुत्ते पर गुस्सा आ गया। कुछ देर बाद ही कुत्ता अपने सेठ की धोती पकड़कर उस स्थान पर ले गया, जहां लुटेरों ने चुराया गया सामान दबाया था। चोरी गया माल मिलने पर सेठ खुश हो गया। उसने कुत्ते को इनाम के रूप में मुक्त कर लक्खा के पास वापस भेज दिया।
लेकिन लक्खा बंजारे को लगा कि उसके कुत्ते ने सेठ को दिए वचन को तोड़ दिया है। इस पर उसने गुस्से में अपने ही कुत्ते को गोली मार दी। कुत्ते ने मरते-मरते भी लक्खा के पैरों में गिरकर आखिरी सांस ली। इसके बाद जब लक्खा के पास सेठ ने आकर वास्तविकता बयां की तो उसे बेहद पछतावा हुआ। उसने पश्चाताप के रूप में भैरव बाबा के मंदिर में कुत्ते की समाधि बनवा दी। ऐसी मान्यता है कि आज भी रैबीज के मरीज यहां प्रसाद चढ़ाते ही ठीक हो जाते हैं। वहीं मंदिर के बाहर बने हौदी में नहाने से कुत्ते के काटने का असर समाप्त हो जाता है।
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कुत्ते में होती है विपत्तियों से बचाने की प्राकृतिक शक्ति
कर्नाटक के रामनगर जिले के अंतर्गत आनेवाले गांव चिन्नपटना गांव में कुत्ते का मंदिर बना है। स्थानीय लोगों का मानना है कि कुत्ते में अपने मालिक के परिवार को विपत्तियों से बचाने की प्राकृतिक शक्ति होती है। वह किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा को भी पहले ही भांप लेते हैं, इसलिए इस मंदिर को इस पालतु जानवर को समर्पित किया गया है।
इस मंदिर में सम्मानपूर्वक दो कुत्तों की मूर्तियां स्थापित की गई हैं, जिनकी नितदिन पूजा होती है। इस मंदिर में कुत्तों की दो मूर्तियां रखी हैं। इनमें एक मूर्ति सफेद रंग की है औ दूसरी भूरे रंग की है। इन्हें माला पहनाकर पूजा की जाती है। इस मंदिर का निर्माण 2010 में करवाया गया था। इस मंदिर निर्माण के पीछे कोई खास वजह नहीं थी, बल्कि ऐसा मनुष्य के प्रति कुत्तों की वफादारी का सम्मान करने के लिए किया गया है।
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झांसी में कुतिया महारानी की पूजा
कुतिया महारानी का मंदिर शायद ही आपने देखा या इसके बारे में सुना हो। जी हां, झांसी से 65 किलोमीटर दूर मऊरानीपुर कस्बे के रेवन गांव में सड़क के किनारे बना ये मंदिर किसी के लिए भी चौंकाने का कारण बन सकता है। मंदिर में एक कुतिया की प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा पर स्थानिय लोग रोजाना जल चढ़ाने आते हैं। ऐसा कोई नहीं जो इस प्रतिमा के आगे सिर झुकाए बिना निकल जाए। मंदिर में स्थापित कुतिया महारानी को धैर्य का प्रतीक माना जाता है।
झांसी के मऊरानीपुर इलाके में रेवन और ककवारा गांव हैं। दोनों गांवों के बीच ही ये कुतिया का मंदिर स्थापित है। यह मंदिर एक ऊंचे चबूतरे पर बना है। इसी पर कुतिया की प्रतिमा स्थापित की गयी है। कुतिया की प्रतिमा काले रंग की है। इसे चबूतरे पर छोटा सा स्थान बनाकर ढंका गया है। यहां महिलाएं पूजा करने जाती हैं। यहां कुतिया को पूजने की शुरुआत एक घटना के साथ शुरू हुई थी। काफी समय पहले यह कुतिया इन दो गांवों में रहती थी। गांव के किसी भी कार्यक्रम में यह कुतिया खाना खाने के लिए पहुंचती थी। लोग उसे खाना भी खिलाते थे। एक बार ये कुतिया इन दोनों गांवों के बीच थी।
इसी दौरान रेवन गांव से रमतूला (जो किसी कार्यक्रम में खाना खाने की सूचना दिए जाने के लिए बजाया जाता था) के बजने की आवाज आई। इसकी तेज आवाज दूर-दूर तक पहुंचती थी। आवाज सुन कुतिया खाने के लिए रेवन गांव पहुंची, लेकिन तब तक पंगत उठ गई। इसी बीच ककवारा गांव से रमतूला बजने की आवाज आई। कुतिया रेवन से ककवारा की ओर लपकी, लेकिन पहुंचते-पहुंचते यहां भी पंगत खत्म हो गई। गांव के बुजुर्ग राम बहादुर बताते हैं कि कुतिया बीमार थी। दोनों गांवों के बीच दौड़ने के कारण वह थक गई और थक कर दोनों गांवों के बीच बैठ गई। भूख और बीमारी के कारण यहीं उसकी मौत हो गई।
लोगों ने कुतिया को इसी स्थान पर दफना दिया। लोगों का कहना है कि इस कुतिया को दफनाए जाने वाला स्थान पत्थर में तब्दील हो गया। लोगों ने यह चमत्कार देख कुतिया का एक छोटा सा मंदिर बना दिया। कुछ साल पहले अब यहां कुतिया की प्रमिता भी स्थापित कर दी गई। इस मंदिर को लोग कुतिया देवी के नाम से जानते हैं।
कुकुरदेव मंदिर छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के खपरी गांव में 'कुकुरदेव' का मंदिर किसी देवी-देवता को नहीं बल्कि कुत्ते को समर्पित है। जानकारी के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14 वीं से 15 वीं शताब्दी के बीच कराया गया। हालांकि साथ में शिवलिंग आदि प्रतिमाएं स्तिथ है। मान्यता है कि यहां दर्शन करने से कुत्ता खांसी व कुत्ते के काटने का कोई भय नहीं रहता है।
मंदिर का इतिहास
14 वीं-15 वीं शताब्दी के बीच बना ये मंदिर बेहद अनोखा है। यहां मंदिर के गर्भगृह में कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है और उसके बगल में एक शिवलिंग भी है। बता दें कुकुर देव मंदिर 200 मीटर के दायरे में फैला है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमा लगाई गई है। लोग शिव जी के साथ-साथ कुकुरदेव की भी वैसे ही पूजा करते हैं जैसे आम शिव मंदिरों में नंदी की पूजा होती है। मंदिर में गुंबद के चारों दिशाओं में नागों के चित्र बने हुए हैं। मंदिर के चारों तरफ उसी समय के शिलालेख भी रखे हैं लेकिन स्पष्ट नहीं हैं।