खून के रिश्ता इस दुनिया में सारे रिश्तों से बढ़कर समझा जाता है। शायद इसीलिए माता-पिता के लिए उनकी औलाद अहम होती है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे खून के रिश्ते के बारे में बताने जा रहे हैं जिसकी दास्तान सुनकर आपको भी हैरानी होगी। वैसे आज की दुनिया ऐसे लोग भी रहते हैं कई बार यकीन के परे हो जाता है।
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दरअसल ये एक ऐसे खून के रिश्ते की कहानी है जो दो अजनबियों के बीच पिछले तीन साल से चला आ रहा है। जैसे-जैसे दिन बीतते गए ये रिश्ता और भी प्रगाढ़ होता चला गया। इस कहानी में दो मुख्य पात्र हैं। 22 साल का युवा यश रावल और 11 साल की बच्ची सिमर खंज।
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जितनी अनूठी दोनों की दोस्ती है उतनी ही अनूठी है इसकी शुरुआत है। सिमर उस वक्त महज तीन महीने की थी जब उसके माता-पिता गुरप्रीत और गुरबीर कौर खंज को पता चला कि उनकी बेटी थैलेसीमिया रोग है। ऐसे रोगियों की जान बचाने के लिए हर महीने में उन्हें ब्लड की जरूरत पड़ती है। ऐसे में थैलेसीमिया रोगियों की जान बचा पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
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लेकिन सिमर की जिंदगी में वरदान बनकर आए यश रावल जो लगभग तीन साल पहले सिमर के पिता प्रो. गुरबीर से मिले थे। उनकी मुलाकात एक ब्लड कैंप के दौरान हुई थी। 19 साल के यश रावल का ब्लड ग्रुप सिमर से मिलता था। जब यश को उस नन्ही जान के रोग के बारे में पता चला तो उसने मानव धर्म निभाने का फैसला कर लिया और हर तीन महीने में ब्लड अरेंज करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। पिछले तीन सालों से ये सिलसिला बदस्तूर जारी है।
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खास बात ये है कि यश निस्वार्थ भाव से ये काम कर रहे हैं। वो कहता है कि ये रिश्ता अनूठा है। ब्लड डोनेट करते समय कई बार सिमर से मुलाकात होती है। वो थैंक्स कह के मुस्कुरा देती है और मुझे लगता है कि मेरी जिंदगी सफल हो गई क्योंकि ये किसी मासूम के काम आ रही है।
मां गुरबीर बताती हैं कि हम लोग हर दो-तीन महीने में ब्लड की जरूरत को लेकर बेहद परेशान रहते थे लेकिन यश ने हमारी मुश्किलें काफी हद तक आसान कर दी हैं। उसे सिमर में एक बहन, एक नन्हीं दोस्त नजर आई और उसी समय उसने कह दिया कि इसके लिए ब्लड अरेंज करने की जिम्मेदारी मेरी है।