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एयर कंडीशनर 24 डिग्री पर सेट करने का सरकारी फरमान, ये आधा सच है, आधा हमसे सुनिए

Tue, 03 Jul 2018 07:29 PM IST
बीबीसी
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एसी - फोटो : artemp
गर्मी बहुत है यार, एसी चला दे 18 पर!' मई-जून की चिलचिलाती गर्मी हो या फिर बारिश के बाद जुलाई-अगस्त की उमस, दिल्ली समेत उत्तर भारत में एयरकंडिशनर के बिना अब काम नहीं चलता। एक जमाना था जब किसी के घर में एसी लगने पर उसके रईस होने की चर्चा शुरू हो जाती थी लेकिन अब खिड़कियों के बाहर टंगे एसी आम बात है। लेकिन इन दिनों ये एसी दूसरी वजहों से चर्चा में हैं। खबरें उड़ी कि एसी को अब 24 डिग्री सेल्सियस तापमान से नीचे नहीं चलाया जा सकेगा। ये आधा सच है। पूरा ये कि ऊर्जा मंत्रालय ने सलाह दी है कि एसी की डिफॉल्ट सेटिंग 24 डिग्री सेल्सियस रखी जाए ताकि एनर्जी बचाई जा सके। ऊर्जा मंत्रालय का कहना है कि अगले छह महीने तक जागरूकता अभियान चलाया जाएगा और प्रतिक्रिया ली जाएगी। अगर सब ठीक रहा है तो एसी को 24 डिग्री पर सेट करना अनिवार्य बनाया जा सकता है। मंत्रालय का दावा है कि इससे एक साल में 20 अरब यूनिट बिजली बचाई जा सकेगी।
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side effects of air conditioner on health
ऊर्जा राज्य मंत्री आरके सिंह ने पूरा मामला समझाने की कोशिश की। ये बक्सा रेगिस्तान से पानी निचोड़ लेता है। घंटों इंतजार, फिर धक्का-मुक्की और गालियां, तब मिलता है पानी। एसी पर 1 डिग्री सेल्सियस टेम्परेचर बढ़ाने से 6% एनर्जी बचती है। न्यूनतम तापमान को 21 डिग्री के बजाय 24 डिग्री पर सेट करने से 18% एनर्जी बचेगी। ऊर्जा मंत्री ने कहा कि कमरे में तापमान कम रखने के लिए कम्प्रेसर को ज्यादा वक्त तक मेहनत करनी होती है और 24 से 18 डिग्री पर सेट करने के बजाय ऐसा नहीं कि तापमान वाकई इतना कम हो जाता है। लेकिन ये पूरा मामला क्या है? क्या वाकई कोई सरकार ये तय कर सकती है कि हमारा एसी किस तापमान पर चलेगा? और अगर ऐसा हो तो भी क्या फायदा है? क्या एसी का टेम्परेचर ज्यादा रहने से प्रकृति को कुछ फायदा होता है? सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट में प्रोग्राम मैनेजर, (सस्टेनेबल स्टडीज) अविकल सोमवंशी ने बताया कि सरकार ये प्रयोग करके देखना चाहती है।
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ac and cooler
इसमें एसी बनाने वाली कंपनियों से कहा जा सकता है कि वो एसी की डिफॉल्ट सेटिंग 24 डिग्री पर रखें। फिलहाल एसी कंपनियां 18 से 26 डिग्री सेल्सियस के बीच के तापमान रखती हैं। उन्होंने कहा, 'अगर बात बनती है तो आगे बनने वाले एसी में 24 डिग्री सेल्सियस तापमान सेट होगा, जिसे ग्राहक जरूरत पड़ने पर कम या ज्यादा कर सकता है।' सोमवंशी का कहना है कि ऊर्जा संरक्षण और प्रकृति के बचाव के हिसाब से ये काफी अहम फैसला साबित हो सकता है। असल में एसी कमरे का तापमान 18 डिग्री तक ले जाने के लिए बने ही नहीं हैं। होता क्या है कि एसी का तापमान 18-20 डिग्री सेल्सियस सेट होता है और लोग उसे बदलने की जहमत भी नहीं उठाते। ऐसा करने पर वो ज्यादा एफिशिएंट नहीं रहते, ज्यादा बिजली खाते हैं। 

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आपको जानकर हैरानी होगी कि जब एसी का बोर्ड तापमान 18 डिग्री सेल्सियस पर दिखा रहा होता है तो कमरे का तापमान असल में इतना नहीं होता। और एसी का तापमान तय करने की ये कोशिश पहली बार नहीं है। दुनिया के दूसरे देशों में भी ऐसा है। जापान में 28, हॉन्गकॉन्ग में 25.5 और ब्रिटेन में 24 डिग्री सेल्सियस पर इसे तय किया गया है। ये तो बात हुई नए एसी की। उन लाखों पुराने एसी का क्या, जो पहले से घरों में लगे हैं। सोमवंशी ने कहा, ऊर्जा मंत्रालय की तरफ से आया बयान साफ कुछ नहीं कहता लेकिन इशारा इस तरफ भी है कि मौजूदा एसी के तापमान को भी 24 या उससे ज्यादा रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट का कहना है कि सरकार के नए प्रस्ताव को एसी कंपनियों की तरफ से हरी झंडी मिल गई है लेकिन एसी के लिए डिफॉल्ट तापमान सेट करने की जो कोशिश 2016 से जारी है उनका विरोध भी हुआ है।

 
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home decore
सीएसई के मुताबिक बीईई ने इससे पहले ये प्रस्ताव दिया था कि एसी ऑन करने पर तापमान 27 डिग्री सेल्सियस रहे। कंपनियों का कहना था कि अगर ऐसा होता है तो ग्राहक को दिक्कत होगी और उसे हर बार एसी चालू करने पर इसे बदलना होगा। देश में सभी इमारतों के लिए इंडोर कंफर्ट मानक तय करने वाले नेशनल बिल्डिंग कोड (एनबीसी) सेंट्रली एयरकंडिशंड इमारतों में एसी का तापमान 23.5-25.5 डिग्री सेल्सियस रखा जा सकता है जबकि घरों में लगने वाले एसी के मामले में ये 29 डिग्री तक हो सकता है। जापान साल 2005 से इस बारे में अभियान चला रहा है जिसमें कंपनियों और आम घरों को एसी का तापमान 28 डिग्री सेल्सियस पर रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। अमेरिका के कैलिफोर्निया में भी इसके मानक तय हैं जहां गर्मियों में 25.6 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान नहीं रख सकते। दुनिया की जानी-मानी हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इसे 23.3-25.6 डिग्री सेल्सियस रखने को कहा जाता है तो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में 24 डिग्री सेल्सियस के आसपास रखने के निर्देश हैं।
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home
सीएसई के मुताबिक एसी दरअसल किसी परिवार के बिजली के बिल का 80 फीसदी हिस्सा रखते है। स्टडी के मुताबिक दिल्ली में गर्मियों के महीने में जितनी बिजली इस्तेमाल होती है, आधे से ज्यादा घरों को ठंडा रखने के लिए है। दरअसल, एयर कंडिशनर चलाने के लिए बिजली का ज्यादा इस्तेमाल होता है। ये अतिरिक्त बिजली हमारे पर्यावरण को और गर्म बना रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि साल 2001 के बाद के 17 में से 16 साल अधिक गर्म रहे हैं।  ऐसे में एयर कंडिशनर की बढ़ती डिमांड कोई हैरानी का विषय नहीं है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक साल 2050 तक एयर कंडिशनर चलाने के लिए लगने वाली एनर्जी आज के मुकाबले में तीन गुना हो जाएगी। इसका मतलब साल 2050 तक दुनियाभर के एयर कंडिशनर उतनी बिलजी की खपत करेंगे जितनी अमेरिका यूरोपीय संघ और जापान मौजूदा वक्त में मिलकर करते हैं।
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कूलर
सीएसई के एक पुराने अध्ययन में कहा गया था कि जब बाहर का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस पर पहुंचता है तो 5 स्टार रेटिंग वाले एसी 25 फीसदी ज्यादा बिजली खाते हैं और उनकी ठंडा रखने की क्षमता 13-15 फीसदी तक गिर जाती है। अविकल सोमवंशी से जब ये पूछा गया कि क्या एसी से निकलने वाली गर्मी प्रकृति का तापमान भी बढ़ाती है, उन्होंने कहा- ऐसी कोई सटीक स्टडी तो याद नहीं आती लेकिन ऐसी कई रिसर्च हैं जो बताते हैं कि एसी घर की गर्मी निकालकर बाहर कर देता है। वो गर्मी खत्म नहीं करता बल्कि उसकी जगह बदल देता है। दूसरी तरफ डेजर्ट कूलर के मामले में अलग टेक्नोलॉजी काम करती है। कूलर गर्म हवा लेता है उसे भीतर घुमाता है, पानी की मदद से उसी हवा को ठंडा बनाता है और फिर बाहर फेंकता है।
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home
सोमवंशी ने कहा- कूलर को लेकर दिक्कत ये भी है कि भारत में उन्हें लेकर कोई स्टार रेटिंग सिस्टम नहीं है, जैसा कि एसी या पंखों के मामले में होता है। भारत में काफी गर्मी पड़ती है, इसलिए यहां रहने वाले लोग उस गर्मी को झेलने की क्षमता भी रखते हैं। ऐसे में एसी को 18 या 20 पर चलाने को सामान्य जरूरत नहीं बताया जा सकता। उन्होंने कहा, यूरोप के कुछ देश ऐसे हैं, जहां अगर तापमान 28 डिग्री पार कर जाता है तो वहां कहा जाता है कि गर्मी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए जबकि भारत में 40 डिग्री तापमान भी सामान्य है। लेकिन क्या सिर्फ एसी या कूलर के दम पर गर्मी ने निपटा जा सकता है? जानकार बताते हैं कि भारत में बड़ी दिक्कत ये भी है कि इमारतों के बनने में लगने वाला सामान और उनका डिजाइन गर्मी बढ़ाने वाला है। सोमवंशी ने कहा, 'यहां ज्यादातर मकान कंक्रीट के बनते हैं। मकान करीब-करीब होते हैं क्योंकि आबादी का घनत्व ज्यादा है। इसके अलावा इमारत बनाते वक्त वेंटिलेशन का ध्यान भी नहीं दिया जाता। यही वजह है कि रात में भी मकान ठंडे नहीं होते।'
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