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17 साल से बीच सड़क पर हाथों से लिखकर करता है ऐसा काम, देखकर आप भी हो जाएंगे हैरान

Wed, 25 Apr 2018 08:11 AM IST
फीचर डेस्क, अमर उजाला
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man distribute hand written news paper
पत्रकारिता का नाम सुनकर लोगों के दिमाग में चैनल और अखबार के पन्ने घूमने लगते हैं। यह नाम सोचते ही सबसे पहले आपके दिमाग में शोहरत और पैसे वाला एक प्रोफेशन ध्यान में आता है। लेकिन इन सबके पीछे छुपी रह जाती है पत्रकार की मेहनत। दरअसल, वह लोगों को नजर में ही नहीं आती है। 

 
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news paper
यह हकीकत है कि पत्रकार होना केवल एक नौकरी नहीं यह सामाजिक जिम्मेदारी है जो बिना जज्बे और जुनून के नहीं की जा सकती। इस पेशे के साथ सबसे जरूरी है नैतिकता। जरूरी है कि पत्रकार अपने धर्म को समझे और उसे बखूबी निभाएं। लेकिन आज यह चीजें कम ही देखने को मिलती है। आलम यह है कि जिस समाज के लिए पत्रकारिता का जन्म हुआ है उसी का विश्वास उसपर से उठता जा रहा है। आज पत्रकारिता भी गुटों में बंटी नजर आती है। पैसे और टीआरपी के गेम में कोई मर रहा है तो वह है पत्रकारिता। 

 
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news paper
पर गनीमत है कि आज भी कुछ ऐसे पत्रकार जीवित हैं जिन्होंने अपने साथ-साथ असल पत्रकारिता को भी जिंदा रखा है। आज हम ऐसे ही एक शख्स की बात करने जा रहे हैं जो पत्रकारिता पैसों के लिए नहीं बल्कि अपने जुनून के लिए करते हैं। इस स्वतंत्र पत्रकार का नाम है दिनेश कुमार। जी हां, उत्तर प्रदेश के मुज्जफ्फरनगर के गांधी कॉलोनी में रहने वाले दिनेश पत्रकारिता की अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं। 53 साल के दिनेश के पास न तो कोई दफ्तर है और न ही कोई मशीन। न ही इसके लिए उनके मातहत कोई कर्मचारी काम करता है। जो हैं वह अकेले खुद हैं। वो कहते हैं न 'वन मैन आर्मी'। 

 

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news paper
दिनेश 17 साल से समाज के लोगों को अपनी यह सेवाएं दे रहे हैं। जी हां, वह अपना अखबार चला रहे हैं। इनके अखबार का नाम  'विद्या दर्शन' है। दिनेश के इस अखबार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरा अखबार वे खुद अपने हाथों से लिखते हैं। इस हस्तलिखित अखबार की फोटो कॉपियां करवा कर वह लोगों तक पहुंचाते हैं। इस काम में उनका एक मात्र साथी है तो वो उनकी साइकिल है। इसी की मदद से वह जगह-जगह जाकर अपना अखबार सार्वजनिक स्थान पर चिपकाते हैं। दिनेश की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। अपनी आजीविका के लिए वो बच्चों को आइसक्रिम, चॉकलेट और खाने की बाकी चीजें बेचते हैं।
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dinesh with his paper
वो शुरुआत से ही समाज के लिए कुछ करना चाहते थे। उनका सपना था वकालत करने का, लेकिन घर की माली हालत ठीक न होने के कारण वह सिर्फ 8वीं कक्षा तक ही पढ़ पाए। इसके बाद उनके ऊपर पारिवारिक बोझ आ गया। परिवार चलाने के लिए उन्होंने मेहनत मजदूरी करना शुरू कर दिया और उनके सपने कहीं पीछे छूट गए। लेकिन उन्होंने अपने जुनून को मरने नहीं दिया। सुबह से शाम तक आजीविका के लिए कड़ी मेहनत करने वाले दिनेश को अखबार चलाने के लिए किसी भी प्रकार की सरकारी या गैर सरकारी वित्त सहायता प्राप्त नहीं है। अपने गैर विज्ञापन वाले अखबार से दिनेश किसी भी प्रकार की आर्थिक कमाई नहीं कर पाते हैं।
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फिर भी अपने हौंसले और जुनून की बदौलत वह सामाजिक बदलाव के लिए नियमित रूप से इस अखबार को निकाल रहे हैं। दिनेश हर सुबह 10 बजे जिलाधिकारी कार्यालय जाते हैं और 3 घंटे में अपनी खबर लिखते हैं, उसके बाद अपने काम पर निकल जाते हैं। मात्र कोरे कागज के पन्ने और काला स्केच पेन ही उनके पत्रकारिता का शस्त्र है। तमाम शहर की दूरी वे अपनी साइकिल से तय कर लेते हैं। हर रोज घर चलाने के अलावा दिनेश पिछले सत्रह वर्षोंं से अपने हस्तलिखित अखबार विद्या दर्शन को चला रहे हैं, यह बात काबिले तारीफ है। तमाम चुनौतियों के बावजूद दिनेश ने न तो कभी हौंसला हारा न ही कभी पत्रकारिता छोड़ने के बारे में सोचा।

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हर दिन दिनेश अपने अखबार में किसी न किसी विशेष घटना अथवा मुद्दे को उठाते हैं और उस पर वे अपनी निर्भीक राय लिखते हैं। पूरा अखबार उनकी सुन्दर लिखावट से तो सजा ही होता है साथ ही उसमें समाज की प्रमुख समस्याओं और उनके निवारण के बारे में भी लिखा जाता है। बता दें अखबार लिखने के कारण दिनेश ने शादी तक नहीं की। अखबार, खबर और परिवार के कारण कभी उन्हें समय ही नहीं मिला कि शादी के बारे में सोच सकें। मगर उन्हें इस बात का संतोष है कि उनकी खबर आज समाज के लिए उपयोगी साबित हो रही है।  
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