उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील थे, जबकि मां भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं। साल 1884 में पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर आ गई। स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) बड़े अतिथि-सेवी थे, वह खुद भूखे रहकर अतिथियों को खाना खिलाते थे और बाहर ठंड में सो जाते थे। 25 साल की उम्र में अपने गुरु से प्रेरित होकर उन्होंने सांसारिक मोह-माया त्याग दी और संन्यासी बन गए। भारतीय आध्यात्मिकता, धर्म और दर्शन का पूरी दुनिया में प्रचार-प्रसार करने वाले स्वामी विवेकानंद की ज्ञान की साधना बेहद गहरी रही है। ऐसा माना जाता है कि 1892 में विवेकानन्द कन्याकुमारी आये और समुद्र के बीच एक चट्टान तक तैर कर गये और गहरी ध्यान की मुद्रा में रात बिताई।