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स्वामी विवेकानंद ने इस चमत्कारी चट्टान पर ध्यान की मुद्रा में बिताई थी रात, जानिए अब वहां क्या है?

Sat, 12 Jan 2019 01:19 PM IST
गौरव शुक्ला फीचर डेस्क, अमर उजाला
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आज से 156 साल पहले 12 जनवरी 1863 को आज के ही दिन समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद का जन्म कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) में हुआ था। इस तरह आजादी के बाद भारत में 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस (National Youth Day) के रूप में मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद की जयंती के मौके पर हम आपको उनके दिव्य ज्ञान से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं।
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विवेकानंद जी ऐसी महान शख्सियत थे कि युवा पीढ़ी हमेशा उनकी जिंदगी से प्रेरित होती रहेगी और उनसे कुछ न कुछ सीखती रहेगी। विवेकानंद का निधन महज 39 साल की उम्र में हो गया था। युवाओं को संबोधित करते हुए उनके कुछ खास संदेश आज भी समसामयिक और उपयोगी हैं। उनका नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। बेहद कम उम्र में ही उन्होंने वेद और दर्शन शास्त्र का ज्ञान हासिल कर लिया था। 
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उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील थे, जबकि मां भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं। साल 1884 में पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर आ गई। स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) बड़े अतिथि-सेवी थे, वह खुद भूखे रहकर अतिथियों को खाना खिलाते थे और बाहर ठंड में सो जाते थे। 25 साल की उम्र में अपने गुरु से प्रेरित होकर उन्होंने सांसारिक मोह-माया त्याग दी और संन्यासी बन गए। भारतीय आध्यात्मिकता, धर्म और दर्शन का पूरी दुनिया में प्रचार-प्रसार करने वाले स्वामी विवेकानंद की ज्ञान की साधना बेहद गहरी रही है। ऐसा माना जाता है कि 1892 में विवेकानन्द कन्याकुमारी आये और समुद्र के बीच एक चट्टान तक तैर कर गये और गहरी ध्यान की मुद्रा में रात बिताई।

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- फोटो : Wikipedia
इस निर्जन स्थान पर साधना के बाद उन्हें जीवन का लक्ष्य एवं लक्ष्य प्राप्ति हेतु मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ था। आप भी जानिए क्या रहस्य है इस चट्टान का और अब क्या है वहां? दरअसल, हम बात कर रहे हैं कि विवेकानंद रॉक मेमोरियल की। यह तमिलनाडु के कन्याकुमारी में वावाथुरई में स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है।
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- फोटो : Wikipedia
ऐसा कहा जाता है कि 1893 में विश्व धर्म सभा में शामिल होने से पहले विवेकानंद कन्याकुमारी आए थे। एक दिन वे तैरकर इस विशाल शिला पर पहुंच गए। इस निर्जन स्थान पर साधना के बाद उन्हें जीवन का लक्ष्य एवं लक्ष्य प्राप्ति के लिए मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ था।
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- फोटो : Wikipedia
कहा जाता है कि विवेकानंद के उस अनुभव का लाभ पूरे विश्व को हुआ क्योंकि इसके कुछ समय बाद ही वे शिकागो सम्मेलन में भाग लेने गए थे। 1893 में इस सम्मेलन में भाग लेकर उन्होंने भारत का नाम ऊंचा किया था।
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स्वामी विवेकानंद के संदेशों को साकार रूप देने के लिए ही 1970 में उस विशाल शिला पर एक भव्य स्मृति भवन का निर्माण किया गया। भारत ही नहीं पूरी दुनिया से टूरिस्ट समुद्र की लहरों से घिरी इस विरासत को देखने के लिए आते हैं।

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यह विवेकानंद स्मारक भवन बहुत ही सुंदर मंदिर के रूप में बनाया गया है। इसका मुख्य द्वार अत्यंत सुंदर है। इसका वास्तुशिल्प अजंता-एलोरा की गुफाओं के प्रस्तर शिल्पों से लिया गया लगता है। लाल रंग के पत्थर से निर्मित स्मारक पर 70 फुट ऊंचा गुंबद है, जो समुद्र के भीतर दूर से ही दिखाई देता है। सूर्योदय और सूर्यास्त के समय बहुत ही सुंदर दिखाई देता है।

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भवन के अंदर चार फुट से ऊंचे प्लेटफॉर्म पर परिव्राजक संत स्वामी विवेकानंद की प्रभावशाली मूर्ति है। यह मूर्ति कांसे की बनी है, जिसकी ऊंचाई साढ़े आठ फुट है। यह मूर्ति इतनी प्रभावशाली है कि इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव प्रतीत होता है। 

(साभार-भारतकोश)

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- फोटो : Social Media
स्वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897 में कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन और 9 दिसंबर 1898 को गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। स्वामी विवेकानंद का यह मंत्र ‘उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।’ (‘उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाओ।’) काफी प्रचलित है।
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स्वामी विवेकानंद को दमा और शुगर की बीमारी थी। उन्होंने कहा भी था, 'ये बीमारियां मुझे 40 साल भी पार नहीं करने देंगी।' अपनी मृत्यु के बारे में उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई और उन्होंने 39 बरस की बेहद कम उम्र में 4 जुलाई 1902 को बेलूर स्थित रामकृष्ण मठ में ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि लेकर प्राण त्याग दिए। स्वामी विवेकानंद का अंतिम संस्कार बेलूर में गंगा तट पर किया गया। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का अंतिम संस्कार हुआ था। 
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