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दरअसल, इस तकनीक को विकसित करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है। इसमें मौलिक प्रेजेंटर की आवाज, लिप मूवमेंट्स और भाव-भंगिमाओं को कॉपी किया गया है।
लेकिन अगर आप ये सोच रहे हैं कि यह किसी इंसान का 3डी डिजिटल मॉडल है तो ऐसा नहीं है, ये उससे बिल्कुल अलग तकनीक है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मिशेल वूलड्रिज का कहना है कि इन प्रेजेंटर्स के लिए ये काफी मुश्किल है कि वो बिल्कुल नेचुरल नजर आएं। "इन्हें कुछ मिनट से ज्यादा देर तक देख पाना संभव नहीं है। उनके चेहरे पर कोई भाव-भंगिमाएं नहीं नजर आती हैं, न कोई लय।।सबकुछ बेहद सपाट।"