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उत्तर कोरिया में किम जोंग उन के दादा किम इल संग ने कैसे रखी तानाशाही की नींव

Thu, 14 Jan 2021 10:16 AM IST
योगेश जोशी फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Kim il Sung - फोटो : social media

चौदह अक्तूबर, 1945 को प्योंगयांग के स्टेडियम में रेड आर्मी का स्वागत करने के लिए एक जनसभा बुलाई गई थी। सोवियत अफसरों से घिरे किम इल संग ने उस दिन अपने जीवन का पहला भाषण दिया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 33 साल की थी। अपने दोनों हाथों में अपने भाषण का आलेख पकड़े वो बहुत नर्वस दिखाई दे रहे थे। उनके बाल बहुत छोटे कटे हुए थे और वो नीले रंग का बहुत ही तंग सूट पहने हुए थे।जाहिर है उन्होंने सूट को उस मौके के लिए किसी से उधार लिया था। वहां मौजूद एक शख्स की नजरों में वो 'किसी चीनी ढाबे के डिलिवरी ब्वॉय जैसे दिख रहे थे। उस पर तुर्रा ये था कि उन्हें कोरियाई ज़ुबान भी ढंग से बोलनी नहीं आती थी, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के 33 सालों में से 26 साल निर्वासन में बिताए थे।

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वैसे भी कोरिया में नेतृत्व के लिए सोवियत प्रशासन की पहली पसंद चो मान सिक थे। किम इल संग का पहला भाषण फ्लॅप साबित हुआ था। लेकिन किम के भाग्य ने उनका साथ नहीं छोड़ा क्योंकि स्टालिन की टीम को जल्द ही पता चल गया कि चो न तो कम्युनिस्ट थे और न ही उन्हें कठपुतली की तरह नचाया जा सकता था। चो ने देश को चलाने के लिए रूसियों से खीज दिलाने वाली मांगे शुरू कर दी थीं।अचानक रूसियों को लगने लगा कि किम इल संग उनके लिए कहीं लाभप्रद और कहना मानने वाले विकल्प हैं। बहरहाल 9 सितंबर, 1948 को डेमोक्रेटिक पीपल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया की स्थापना हुई और किम इल संग को उसका नेता बनाया गया।

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  • दक्षिण कोरिया पर चढ़ाई

उन्होंने तुरंत जापान के खिलाफ संघर्ष में भाग लेने वाले लोगों को शामिल कर कोरियन पीपल्स आर्मी बना डाली। मॉस्को जा कर उन्होंने दक्षिण कोरिया पर हमला करने के लिए स्टालिन की मदद लेने की कोशिश शुरू कर दी। स्टालिन ने उनसे साफ-साफ कह दिया कि उत्तर कोरिया को तभी जवाब देना चाहिए, जब उस पर हमला किया जाए।ब्रैडली मार्टिन अपनी किताब 'अंडर द लविंग केयर ऑफ द फादरली लीडर' में लिखते हैं, "किम की पेशकश के एक साल बाद स्टालिन इस हमले के लिए राजी हुए, बशर्ते माओ भी इसके लिए रजामंद हों।किम ने 1950 में बीजिंग जा कर माओ को हमले के लिए मनाया। 25 जून, 1950 को तड़के उत्तरी कोरिया के सैनिक 150 टी- 34 रूसी टैकों के साथ दक्षिणी कोरिया में घुस गए। कुछ ही दिनों में उत्तरी कोरियाई सैनिकों ने बुसान के पास कुछ इलाके को छोड़ कर पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया।"

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  • अमेरिका की भयानक बमबारी

जापान में अमेरिकी सेना के कमांडर जनरल डगलस मेकार्थर इस हमले से थोड़े आश्चर्यचकित जरूर हुए, लेकिन उन्होंने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए सोल के पश्चिम में इंचियान के पास अमेरिकी सैनिक उतार दिए। छह महीने बाद उत्तरी कोरिया की सेना वापस उसी स्थान तक धकेल दी गई, जहां से उसने शुरुआत की थी। ढाई वर्षों तक दोनों पक्ष एक दूसरे पर हमला करते रहे, लेकिन कोई भी निर्णायक जीत नहीं हासिल कर पाया।

ब्रूस क्यूमिंग्स अपनी किताब 'द कोरियन वॉर: अ हिस्ट्री' में लिखते हैं, "हिरोशिमा और नागासाकी की बर्बादी के पांच साल बाद मेकार्थर ने बहुत गंभीरता से उत्तरी कोरिया पर परमाणु बम गिराने के बारे में विचार किया था, लेकिन जल्द ही इस विकल्प को त्याग दिया गया। लेकिन इसके बदले में अमेरिका ने उत्तरी कोरिया पर 6 लाख 35 हजार टन वजन के बम गिराए। इसमें से दो लाख बम अकेले प्योंगयांग शहर पर गिराए गए, यानी शहर के हर एक नागरिक के लिए एक बम।" इस बर्बादी के बाद जब ये जाहिर हो गया कि न तो उत्तरी कोरिया और न ही दक्षिण कोरिया की स्पष्ट जीत हो सकती है तो दोनों पक्ष 27 जुलाई, 1953 को युद्ध विराम के लिए सहमत हो गए।

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  • लोगों पर निगरानी

लड़ाई समाप्त होने के बाद किम इल संग ने युद्ध से तहस नहस उत्तरी कोरिया में अपनी स्थिति मजबूत कर ली। अगले 10 सालों तक एक पार्टी की सरकार ने अपने लोगों पर इस हद तक नियंत्रण किया कि सरकार तय करने लगी कि लोग क्या पढ़ेंगे, क्या कहेंगे, कहां रहेंगे और कहां की यात्रा करेंगे।आंद्रे लानकोव अपनी किताब 'द रियल नॉर्थ कोरिया: लाइफ एंड पॉलिटिक्स इन फेल्ड स्टालिनिस्ट यूटोपिया' में लिखते हैं, "सुरक्षा जासूसों ने हर एक शख्स को अपनी निगरानी में रखना शुरू कर दिया। जो भी विरोध करता उसे उत्तरी पहाड़ियों के दूरदराज और दुर्गम इलाकों में बने लेबर कैंपों में काम करने के लिए भेज दिया जाता। उत्तरी कोरिया 'घेराबंदी की मानसिकता' वाला देश बन गया, जहां हमेशा इस बात का खतरा बना रहता कि सरकारी सैनिक जब भी चाहें किसी की भी निजता का अतिक्रमण कर सकते थे।"

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  • व्यक्ति पूजा अपने चरम पर

वर्ष 1955 में उत्तरी कोरिया में भयानक सूखा पड़ा। कई बच्चों को गिरती बर्फ के बीच नंगे पांव भीख मांगते देखा गया। हालांकि, उत्तरी कोरिया आर्थिक सहायता के लिए पूरी तरह से चीन और सोवियत संघ पर निर्भर था, लेकिन इसके बावजूद धीरे-धीरे मार्क्स, लेनिन और स्टालिन के चित्र सार्वजनिक स्थानों से हटाए जाने लगे। 15 अगस्त, 1954 को राष्ट्रीय दिवस के मौके पर हुई परेड में इन नेताओं के एक भी चित्र मौजूद नहीं थे, जबकि हर रेलवे स्टेशन, मंत्रालय और होटल में किम इल संग के बड़े-बड़े चित्र लगा दिए गए।उत्तरी कोरिया में सोवियत राजदूत वी इवानोव ने अपनी डायरी में लिखा, "व्यक्ति पूजा का ये आलम था कि उन जगहों पर खास फिल्में बनाई गईं, जहां किम के कभी पैर पड़े थे। यही नहीं उन चट्टानों को भी दर्शनीय स्थल बना दिया गया, जहां कभी किम इल संग ने आराम किया था। उस जमाने के उत्तरी कोरिया में किम हर जगह पाए जाते थे। यहां तक कि वो लोगों को सलाह दे रहे होते थे कि मधुमक्खियां किस तरह पाली जाएं, फलों के बागों की देखभाल कैसे की जाए, सिंचाई की तकनीक में क्या बदलाव किए जाएं या इस्पात के उत्पादन को कैसे बढ़ाया जाए।"

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  • मामूली गलती पर बड़ी सजा

इस प्रोपेगैंडा के साथ-साथ हर जगह डर का माहौल था। महान नेता के प्रति असम्मान की जरा भी भावना को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाता था। कोल्ड वॉर इंटरनेशनल हिस्ट्री प्रोजेक्ट बुलेटिन में छपे लेख 'न्यू एविडेंस ऑन नॉर्थ कोरिया इन 1956' में कहा गया है- 'एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए पांच साल की सजा सुना दी गई, जिसने अपनी किताब पर उस अखबार का कवर चढ़ा दिया था जिस पर किम इल संग की तस्वीर छपी हुई थी। एक किसान ने जब किम की तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए चिल्ला कर कहा कि आप लोगों को यातना दे रहे हैं तो उसे सात सालों के लिए लेबर कैंप में भेज दिया गया।'

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  • लोगों को तीन हिस्सों में बांटा गया

वर्ष 1957 में उत्तरी कोरिया की सारी आबादी को तीन हिस्सों में बांट दिया गया। इस बंटवारे का मापदंड था किम के प्रति वफादारी। पहले हिस्से को मूल वर्ग कहा गया। दूसरे हिस्से को ढ़ुलमुल वर्ग कहा गया। तीसरे हिस्से को विरोधी वर्ग करार कर दिया गया। ये पूरी जनसंख्या का करीब 20 प्रतिशत था।

आंद्रे लानकोव अपनी किताब 'क्राइसेज इन नॉर्थ कोरिया' में लिखते हैं, "इस वर्ग व्यवस्था के आधार पर ही उत्तर कोरिया में सब कुछ तय होता था। एक परिवार को कितना राशन मिले से लेकर बच्चों को कहां तक शिक्षा और रोजगार का अधिकार होने तक। उत्तर कोरिया में ये वर्ग व्यवस्था माता-पिता से बच्चों तक स्थानांतरित होती थी। कुछ लोगों को जिनका सिर्फ ये अपराध होता था कि उनके किसी रिश्तेदार ने दक्षिण कोरिया में शरण ली है, शहर से गांव में रहने के लिए भेज दिया जाता था।"करीब 3 लाख प्योंगयांग वासियों को सिर्फ इसलिए गांवों में रहने के लिए भेज दिया गया क्योंकि वो राजनीतिक रूप से अविश्वसनीय लोग थे। पूरे देश में प्रेम गीतों और प्रेम कथाओं पर रोक लगा दी गई। लोकप्रिय थिएटर एक तरह से पाबंदी के दायरे में आ गए। शास्त्रीय संगीत यहां तक कि बीथोवन सुनने की भी मनाही हो गई। मई, 1968 में देश में मौजूद सारी विदेशी पुस्तकों को जब्त कर लिया गया।

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  • किम इल संग की 20 मीटर ऊंची मूर्ति

वर्ष 1956 में प्योंगयांग में एक क्रांतिकारी म्यूजियम बनाया गया, जिसमें 5000 वर्ग मीटर के क्षेत्र को किम इल संग द्वारा जापान विरोधी गतिविधियों को दिखाने के लिए रखा गया। इस म्यूजियम में किम की 12 आदमकद मूर्तियां लगाई गईं। 15 वर्षों बाद इस क्षेत्र को बढ़ाकर 50000 वर्ग मीटर कर दिया गया। म्यूज़ियम के बाहर किम इल संग की 20 मीटर ऊंची मूर्ति लगाई गई, जिसमें वो कमर पर अपना हाथ रखे दिखाई दे रहे थे। रात में इसमें फ्लड लाइट लगा दी जाती जिससे इसे कुछ किलोमीटर की दूरी से भी देखा जा सकता था।

इस म्यूजियम में किम के इस्तेमाल की हजारों वस्तुओं जैसे उनके दस्तानों, जूतों, बेल्ट, टोपियों, स्वेटर व कलमों को रखा गया। कुछ वर्षों तक किम लोगों के सामने बहुत कम आए। लेकिन, उनके उद्धरण हर समाचारपत्र में होते थे। किसी भी किताब में चाहे वो सिविल इंजीनियरिंग की किताब हो या फिर मोलेकुलर बायॉलॉजी की, किम के कामों का विवरण देना जरूरी था।

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डे सूक सुह ने अपनी किताब 'किम इल संग: द नॉर्थ कोरियन लीडर" में लिखा, "जनवरी 1968 में हद ही हो गई जब किम ने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति पार्क चुंग ही की हत्या करने के लिए एक छापामार दल दक्षिण कोरिया भेजा। वो सफल नहीं हो पाए और कुछ कमांडोज घटनास्थल पर ही मारे गए। कुछ दिनों बाद किम के आदेश पर 'प्येबलो' नाम की एक अमेरिकी खुफ़िया नौका पर कब्जा कर लिया गया। चालक दल के 80 सदस्यों को 11 महीनों तक जेल में रख कर यातनाएं दी गईं।''''सार्वजनिक रूप से किम ने इस अभियान में शामिल लोगों को बधाई दी लेकिन जब लंबी बातचीत के बाद इन बंदियों को रिहा कर दिया गया तो किम ने अपने 12 शीर्ष जनरलों को पद से हटा दिया। कोई भी तानाशाह शक्तिशाली जनरलों से अपने को सुरक्षित नहीं मानता चाहे वो उसके प्रति कितना भी वफादार क्यों न रहे हों।"

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  • किम के चित्र के सामने सिर झुकाने की परंपरा

दिसंबर 1972 में किम को पार्टी के अध्यक्ष के अलावा देश का राष्ट्पति भी घोषित कर दिया गया। उनके सम्मान में बिल्ले निकाले गए ओर देश के हर नागरिक के लिए ये जरूरी कर दिया गया कि वो उन्हें अपने सीने के बांई तरफ पहने। किम की 60वीं वर्षगांठ के बाद टेलीविजन ने दिखाना शुरू कर दिया कि लोग कारखानों में अपनी शिफ्ट शुरू होने से पहले किम के चित्र के सामने अपना सिर झुका रहे हैं। शिफ्ट समाप्त होने के बाद उनसे फिर अपेक्षा की जाती थी कि वो किम के चित्र के सामने अपना सिर झुकाएं। धीरे-धीरे लोगों ने उनके पुत्र किम जोंग इल के प्रति भी अपनी वफादारी दिखानी शुरू कर दी। किम ने ये ऐलान भी कर दिया कि उनके बाद किम जोंग इल उनके उत्तराधिकारी होंगे।

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  • शव को सुरक्षित रखा गया

8 जुलाई 1994 को 82 वर्ष की आयु में किम इल संग का निधन हो गया। 34 घंटे तक उनकी मृत्यु के बारे में देश को सूचना नहीं दी गई। उसके बाद रेडियो प्योंगयांग पर घोषणा की गई, "महान हृदय ने काम करना बंद कर दिया।" उसके बाद उत्तरी कोरिया के हर दफ्तर, स्कूल और कारखाने में उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। कई लोगों को दुख में रोते देखा गया। इन जगहों पर सदमे में बेहोश हुए लोगों की देखभाल के लिए डॉक्टरों की टीम को लगाया गया। अगले कुछ दिनों तक किम की भीमकाय मूर्ति के सामने फूल चढ़ाने वाले लोगों का तांता लगा रहा।

टेलीविजन पर कॉकपिट में जहाज के पायलटों को रोते हुए और पानी के जहाज पर नाविकों को दुख से अपना सिर धुनते हुए दिखाया गया। पूरे देश में 10 दिन के शोक की घोषणा कर दी गई। इस बीच वहां की गुप्त पुलिस लोगों के चेहरों को देख कर लगातार इस बात की जांच करती रही कि उनका दुख नकली तो नहीं है। उनकी जगह सत्ता में आए उनके पुत्र किम जोंग इल की देखरेख में उनके पार्थिव शरीर को एक बड़े मकबरे में ले जा कर एंबाम करके रखा गया, ताकि वो हमेशा सुरक्षित रहे। उत्तरी कोरिया के हर नगर में 'एटरनल लाइफ टावर' बनाए गए और उन पर लिखा गया कि 'महान नेता हमेशा जीवित रहेंगे।' इस समय किम इल संग के पौत्र किम जोंग उन उत्तरी कोरिया के नेता हैं और उनकी तानाशाही के किस्से भी पूरी दुनिया में मशहूर हैं।

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