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इस मंदिर में व्हेल मछली की हड्डियों की होती है पूजा, हैरान कर देगी इसके पीछे की कहानी

Tue, 28 May 2019 07:56 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मत्स्य माता मंदिर - फोटो : Social media
भारत में ऐसे कई मंदिर हैं, जो अपने आप में अनोखे हैं। इन मंदिरों से जुड़ी अपनी कहानी भी होती है। आपने भी देवी-देवताओं के अनेक मंदिर देखे होंगे, लेकिन क्या कभी आपने ऐसे किसी मंदिर के बारे में सुना है, जहां व्हेल मछली की हड्डियों की पूजा होती हो। आपको शायद इसपर यकीन न हो, लेकिन गुजरात में वलसाड तहसील के मगोद डुंगरी गांव में ऐसा ही मंदिर मौजूद है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
इस मंदिर को 'मत्स्य माताजी' के नाम से जाना जाता है। 300 साल पुराने इस मंदिर का निर्माण गांव के ही मछुआरों ने करवाया था। आपको जानकर हैरानी होगी कि मछली पकड़ने के लिए समुद्र में जाने से पहले यहां रहने वाले सारे मछुआरे पहले मंदिर में माथा टेकते हैं, तभी वो वहां से जाते हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
कई लोगों का यह भी मानना है कि जब भी किसी मछुआरे ने समुद्र में जाने से पहले इस मंदिर के दर्शन नहीं किए तो उसके साथ कोई न कोई दुर्घटना जरूर हो जाती है। 

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व्हेल मछली - फोटो : File photo
इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक मान्यता है, जिसके अनुसार 300 साल पहले गांव के ही एक निवासी प्रभु टंडेल को एक सपना आया था कि समुद्र तट पर एक विशाल मछली आई हुई है। उसने सपने में यह भी देखा था कि वह मछली एक देवी का रुप धारण तट पर पहुंचती है, लेकिन वहां आने पर उनकी मौत हो जाती है। 
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व्हेल मछली - फोटो : Social media
बाद में जब गांव वाले और प्रभु टंडेल ने वहां जाकर देखा तो सच में वहां एक बड़ी मछली मरी पड़ी थी। उस मछली के विशाल आकार को देखकर गांव वाले हैरान हो गए।  दरअसल, वो एक व्हेल मछली थी। 
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मत्स्य माता मंदिर - फोटो : Social media
प्रभु टंडेल ने जब अपने सपने की पूरी बात लोगों को बताई तो लोगों ने उस व्हेल मछली को देवी का अवतार मान लिया और वहां मत्स्य माता के नाम से एक मंदिर बनवाया गया। 
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व्हेल मछली की हड्डियां - फोटो : Social media
गांव के लोग बताते हैं कि प्रभु टंडेल ने उस मंदिर के निर्माण से पहले व्हेल मछली को समुद्र के तट पर ही जमीन के नीचे दबा दिया था। जब मंदिर निर्माण का काम पूरा हो गया तो उसने व्हेल की हड्डियों को वहां से निकालकर मंदिर में रख दिया। 

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व्हेल - फोटो : File photo
कहते हैं कि प्रभु टंडेल की आस्था का कुछ लोगों ने विरोध किया और उन्होंने मंदिर से संबंधित किसी भी काम में हिस्सा नहीं लिया, क्योंकि उन्हें देवी के मत्स्य रूपी अवतार पर विश्वास नहीं था। कहा जाता है कि उसके बाद सभी गांव वालों को इसका गंभीर परिणाम भुगतना पड़ा था।
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मत्स्य माता मंदिर - फोटो : Social media
दरअसल, गांव में एक भयंकर बीमारी फैल गई। तब टंडेल के कहेनुसार लोगों ने मंदिर में जाकर मत्स्य देवी की प्रार्थना की और उनसे माफी मांगी। कहते हैं कि इसके बाद धीरे-धीरे वो भयंकर बीमारी अपने आप ठीक हो गई। 
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